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Friday, 13 March 2026

कवि डॉ गजराज चारण ( राजस्थानी कविताएं )

क्यूं राखै करड़ाण अणूती
छोड परी आ बाण अणूती
धड़ो करंतां ध्यान राखजे
निजर-ताकड़ी काण अणूती

कुळपतराई कारण काया
खाली ओगण खाण अणूती

चाव-चूंटियो काढ़ माट सूं
छाछ मती ना छाण अणूती

मोटां पाण मती मोदीजे
प्रीत-विहूण पिछाण अणूती

काम पड्यां जो करै किनारो
जकी मतलबी-जाण अणूती

उडगण चांद आगियां चेतो
भुरक्यां न्हाखै भाण अणूती

पौधां रै पनपण में पंगा
बरगद पाळी बाण अणूती

रखवाळा ल्याळी रेवड़ रा
*ठणकै गाडर ठाण अणूती

चूक्यां चाल मलाल मिलेला
चढतां ऊंटां ढाण अणूती

सुर नैं साध धीर रख सावळ
तणी थकी मत ताण अणूती

बणै काम अपणै बळबूतै
पोल-ढोल री पाण अणूती

आँख मीच मत करे अँधारो
होवै नितप्रत हाण अणूती

पत राख्यां 'गजराज' रहै पत
कोई न राखै काण अणूती
©️डॉ. गजादान चारण 'शक्तिसुत'

**क्यूं राखै करड़ाण अणूती
छोड़ परी आ बाण अणूती**

**भावार्थ :**
मनुष्य को निरर्थक हठ, अकड़ या अहंकार को पकड़े नहीं रहना चाहिए। स्वाभिमान अलग बात है, पर बेतुकी जिद और अकड़ अंततः हानि ही पहुँचाती है। इसलिए ऐसी अनुचित जिद को समय रहते छोड़ देना ही बुद्धिमानी है।

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**धड़ो करंतां ध्यान राखजे
निजर-ताकड़ी काण अणूती**

**भावार्थ :**
संसार में किसी भी वस्तु या परिस्थिति का मोल-तोल करते समय अत्यंत सावधान रहना चाहिए। जैसे तराजू के दोनों पलड़ों का संतुलन आवश्यक होता है, वैसे ही लोगों की नजर रूपी तराजू में छिपे बाँकपन या खोट को समझना जरूरी है, अन्यथा मनुष्य धोखा खा सकता है।

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**कुळपतराई कारण काया
खाली ओगण खाण अणूती**

**भावार्थ :**
मनुष्य जब अपनी डेढ़ होशियारी, खुरापात और कुटिल चालाकियों में पड़ जाता है, तब उसका यह जीवन और शरीर गुणों का स्थान बनने के बजाय अवगुणों की खान बन जाता है।

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**चाव-चूंटियो काढ़ माट सूं
छाछ मती ना छाण अणूती**

**भावार्थ :**
जैसे दही को मथकर बिलौने में से खरा मख्खन निकाल लिया जाता है, वैसे ही जीवन में भी सार्थक और मूल्यवान तत्वों को पहचानकर ग्रहण करना चाहिए। जो वस्तु सारहीन है, उसमें व्यर्थ श्रम करना उतना ही निरर्थक है, जितना छाछ को छानना।

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**मोटां पाण मती मोदीजे
प्रीत-विहूण पिछाण अणूती**

**भावार्थ :**
केवल नाम या पद से बड़े दिखाई देने वाले लोगों के कारण कभी इतराना नहीं चाहिए। कई बार ऐसे लोग ‘नाम बड़े और दर्शन खोटे’ होते हैं, जिनकी पहचान और संबंध प्रेम से नहीं बल्कि स्वार्थ से बने होते हैं; इसलिए ऐसी प्रीत-विहीन जान-पहचान किसी के लिए भी उपयोगी नहीं होती।

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**काम पड़्यां जो करै किनारो
जकी मतलबी-जाण अणूती**

**भावार्थ :**
जो व्यक्ति आवश्यकता या कठिन समय आने पर किनारा कर ले, उसे मतलबी और स्वार्थी ही समझना चाहिए। सच्चा संबंध वही है जो विपत्ति में भी साथ निभाए।

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**उडगण चांद आगियां चेतो
भुरक्यां न्हाखै भाण अणूती**

**भावार्थ :**
कवि चन्द्रमा, तारों और जुगनुओं जैसे छोटे प्रकाशों को सावधान करते हैं कि वे सूर्य के झाँसे में न आएँ। सूर्य अपनी प्रखर किरणों के माध्यम से छोटे प्रकाशों के बीच भ्रम उत्पन्न करना चाहता है; इसलिए छोटे और सरल लोगों को ऐसे प्रभावों से सावधान रहना चाहिए।

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**पौधां रै पनपण में पंगा
बरगद पाळी बाण अणूती**

**भावार्थ :**
बरगद की व्यर्थ की अकड़ और फैलाव के कारण उसके आसपास उगने वाले छोटे पौधों के विकास में अनेक बाधाएँ आती हैं। इसी प्रकार जब कोई बड़ा व्यक्ति अपने अहंकार के कारण दूसरों पर छा जाता है, तो नवोदित लोगों के विकास में अवरोध उत्पन्न हो जाते हैं।

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**रखवाळा ल्याळी रेवड़ रा
ठणकै गाडर ठाण अणूती**

**भावार्थ :**
यदि भेड़ों के झुंड का रखवाला ही भेड़िया बन जाए, अर्थात् जो रक्षक है वही भक्षक हो जाए, तो भेड़ों की रक्षा की कोई आशा नहीं रह जाती। ऐसे में उनकी आशाभरी पुकार भी व्यर्थ सिद्ध होती है।

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**चूक्यां चाल मलाल मिलेला
चढ़तां ऊंटां ढाण अणूती**

**भावार्थ :**
जीवन में यदि सही चाल चूक जाए तो अंत में केवल पछतावा ही मिलता है। जैसे यात्रा शुरू करते ही ऊँट को तेज दौड़ाना उचित नहीं होता; इससे या तो ऊँट को चोट लग सकती है या सवार गिर सकता है। सवार और सवारी के बीच तालमेल बैठाने के लिए धैर्य आवश्यक है।

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**सुर नैं साध धीर रख सावळ
तणी थकी मत ताण अणूती**

**भावार्थ :**
संगीत की साधना में भी धैर्य और संतुलन आवश्यक है। यदि तान को आवश्यकता से अधिक ऊँचा खींच दिया जाए तो रस भंग हो जाता है। इसलिए जो सुर जितना तना हुआ है, उसे उससे अधिक नहीं तानना चाहिए।

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**बणै काम अपणै बळबूतै
पोल-ढोल री पाण अणूती**

**भावार्थ :**
कार्य अपने बल और सामर्थ्य से ही सिद्ध होता है। बाहर से दिखावे का समर्थन करने वाले, केवल पोल के ढोल पीटने वालों का जोश या सहारा कभी नहीं रखना चाहिए, क्योंकि वे वास्तविक काम में सहायक नहीं होते।

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**आँख मीच मत करे अँधारो
होवै नितप्रत हाण अणूती**

**भावार्थ :**
आँखें मूँद लेने से अँधेरा समाप्त नहीं होता। यदि मनुष्य सचाई से आँखें बंद कर ले, तो उसे प्रतिदिन हानि ही उठानी पड़ती है। इसलिए सजग और जागरूक रहना आवश्यक है।

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**पत राख्यां 'गजराज' रहै पत
कोई न राखै काण अणूती**

**भावार्थ :**
कवि ‘गजराज’ कहते हैं कि अपनी प्रतिष्ठा और मर्यादा की रक्षा मनुष्य को स्वयं ही करनी चाहिए। जो अपनी पत को संभालकर रखता है, उसी की पत बनी रहती है; क्योंकि संसार में कोई भी व्यक्ति एक सीमा से अधिक लिहाज़ नहीं रख पाता।


©Gajadan charan 'shaktisut'

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