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Sunday, 8 March 2026

#धर्म_क्या_है? (शुद्ध शास्त्रीय एवं वैयाकरणिक दृष्टि से)

#धर्म_क्या_है? 
(शुद्ध शास्त्रीय एवं वैयाकरणिक दृष्टि से)

आजकल “धर्म” शब्द सुनते ही अधिकांश लोग पूजा-पाठ, मंदिर-मस्जिद, ग्रन्थों के नियम या किसी सम्प्रदाय का चित्र मन में लाते हैं। यह धारणा मुख्यतः औपनिवेशिक काल की अंग्रेजी “religion” के अनुवाद और जनगणना जैसी व्यवस्थाओं की देन है। लेकिन मूल भारतीय शास्त्रों, व्याकरण और प्राचीन कोशों में “धर्म” का अर्थ इससे कहीं अधिक गहरा, सार्वभौमिक और स्वाभाविक है। आइए इसे क्रम से समझें।

व्याकरण से धर्म की व्युत्पत्ति: संस्कृत धातुपाठ (पाणिनीय एवं अन्य परम्पराओं) में मूल धातु है – धृँ विजने धारणे। इसका अर्थ है “धारण करना, धारण कर रखना, वहन करना, सहारा देना”। इस धातु में कर्तृवाचक “मक्” प्रत्यय लगने से शब्द बनता है – धृ + मक्= धर् + म= धर्मः (मक्, म् में बदल जाता है, रेफ-लोप तथा सन्धि आदि व्याकरणिक नियमों के अनुसार)। इस प्रकार पाणिनीय सिद्धान्त के अनुसार “धर्म” का शाब्दिक अर्थ हुआ – “जो धारण करता है या जो धारण किया जाता है – वही धर्म है।”—धारणात् धर्मः

हमारे यहां कुछ प्रसिद्ध शब्दकोश एवं ग्रन्थ हैं, उनमें में भी धर्म की परिभाषा है। प्राचीन कोशकारों ने इस व्युत्पत्ति को ही आधार बनाकर धर्म की परिभाषा दी है:—

अमरकोश:—धर्मः स्याद् गुणवृत्ते च विधौ नियतकर्मणि।
अर्थात् गुण, स्वभाव, नियमित कर्तव्य और विधान में धर्म है।

वैजयन्ती कोश तथा शब्दकल्पद्रुम:—धारणात् धर्मः। “धारण करने से धर्म है।” साथ ही: धारयति लोकान् इति धर्मः – “जो लोकों को धारण करता है, वही धर्म है।”

महाभारत—:
धारणाद् धर्ममित्याहुर्धर्मो धारयति प्रजाः।
यत्स्याद्धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः।
“धारण करने के कारण इसे धर्म कहते हैं; धर्म ही प्रजा को धारण करता है। जिसमें धारण करने की शक्ति हो, वही निश्चय से धर्म है।”

मनुस्मृति: धर्मो धारयति प्रजाः। “धर्म ही प्रजा को धारण करता है।”

मीमांसा-शास्त्र:— चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः – परन्तु चोदना भी तभी धर्म है जब वह प्रजा को धारण करने वाली हो (शबर भाष्य)।

ये सभी प्रमाण एकमत से यही बताते हैं कि धर्म कोई बाहरी नियम या सम्प्रदाय नहीं, बल्कि धारण करने वाली शक्ति है।

उपरोक्त अर्थ के विश्लेषण से धर्म तीन स्तरों पर है— पदार्थों के स्वभाव में, जीवों के कर्तव्य में और समाज एवं श्रृष्टि के रक्षण में—
पदार्थों के स्वभाव में: अग्नि का धर्म तपना और प्रकाश देना है, जल का बहना और शीतलता देना है, पृथ्वी का सबको सहारा देना है। यहाँ न पूजा है, न ग्रन्थ, न सम्प्रदाय – केवल स्वाभाविक गुण है।

जीवों के कर्तव्य में: सत्य, अहिंसा, क्षमा, दम, शौच, इन्द्रिय-निग्रह आदि गुण जो मनुष्य को उसके स्वरूप में स्थिर रखें – यही उसका धर्म है। महाभारत में इन्हें “दशधर्म” या साधारण धर्म कहा गया है।

समाज एवं सृष्टि के लिए: वह शक्ति जो समाज को विघटन से बचाती है, प्रजा को एकसूत्र में बाँधती है और सृष्टि को संकट से धारण करती है – वही धर्म है।

उपर्युक्त व्याकरणिक व्युत्पत्ति, प्रसिद्ध शब्दकोशों (अमरकोश, वैजयन्ती, शब्दकल्पद्रुम आदि) तथा शास्त्रों (महाभारत, मनुस्मृति, मीमांसा आदि) के समस्त प्रमाणों को देखते हुए निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि धर्म का पर्याय न तो “मजहब”, न “पंथ”, न “सम्प्रदाय” और न ही अंग्रेजी “religion” हो सकता है। इसे पूजा-पाठ, कर्मकांड, ग्रन्थ-पालन या किसी विशेष समुदाय का नाम भी नहीं कहा जा सकता। "धर्म वह सार्वभौमिक, शाश्वत और स्वाभाविक शक्ति है जो सृष्टि के प्रत्येक कण को उसके स्वरूप, गुण और कर्तव्य में धारण करती है।" धारणात् धर्मः – यही एकमात्र शास्त्र-सम्मत, व्याकरण-सिद्ध और कोश-प्रमाणित परिभाषा है।

बाकी सब बाद की संकीर्ण व्याख्याएँ हैं – ऐतिहासिक, राजनीतिक या अनुवाद की भूल।

यह परिभाषा किसी एक झंडे तले खड़े होने का हुक्म नहीं देती,
न किसी एक नाम को “एकमात्र सत्य” का ताज पहनाती है।
बल्कि यह धीमे, गहन स्वर में कहती है—
सच्चा धर्म वही है जो धारण करता है।
जो जल को बहने देता है उसकी शीतलता में,
अग्नि को जलाने देता है उसकी लौ में,
पृथ्वी को थामे रखता है हर जीव के चरणों तले।
जो मनुष्य के हृदय में सत्य को स्थिर रखता है,
अहिंसा को उसकी साँसों में बाँधे रखता है,
दया को उसकी आँखों में बरसने देता है,
और न्याय को उसके कदमों की थाप बनाता है।
जो समाज को टुकड़ों में नहीं बाँटता,
बल्कि प्रेम और कर्तव्य के सूत्र से बुनता है,
जो सृष्टि को संकट के झंझावात में भी थामे रहता है,
एक-एक कण को उसके स्वभाव में जीवित रखता है।
यही कारण है कि सनातन दर्शन इसे सनातन कहता है—
न आदि का बंधन, न अंत का भय।
न समय की सीमा में कैद, न स्थान की दीवारों में।
न किसी एक जन्मे हुए के नाम पर,
न किसी एक किताब की स्याही में।
यह तो वही अनंत धारा है जो सृष्टि के साथ बहती आई है,
और अनंत काल तक बहती रहेगी—
जहाँ कहीं भी धारण हो रही हो,
वहाँ धर्म है।
धारणात् धर्मः—
यह एक सूत्र नहीं,
यह सृष्टि का प्राण-मंत्र है।
ॐ तत् सत्
ॐ तत् सत्
रश्मि रति
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