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Friday, 6 March 2026

सफेद पलाश प्रतीक है समृद्धि का: कहते हैं कि इसमें माता अन्नपुर्णा का वास है।

सफेद पलाश प्रतीक है समृद्धि का: कहते हैं कि इसमें माता अन्नपुर्णा का वास है। दावा किया जाता है कि इसके नीचे जाने पर दिन में तारे दिखाई देने लगते हैं। 
           सफेद पलाश एक बहुत ही दुर्लभ, चमत्कारिक और रहस्यमई वनस्पति है। इसमें बारे में जितने मुँह उतनी ही बातें सुनाई देती हैं। मेरी दिलचस्पी सफेद पलाश पर इसीलिए भी है कि अब तक कई रहस्यमई पौधों को ढूंढकर उनकी पहचान की है या फिर उनके विषय में कही सुनी बातों के पीछे के तर्क -वितर्क और कारण समझकर विज्ञान से उनका संबंध समझा है। बचपन में ही घाट छिंदवाड़ा - जबलपुर मार्ग पर घाट परासिया के समीप सफेद पलाश देख चुका हूँ तो इसके अस्तित्व को नकारने की गलती भी नहीं कर सकता। अभी तक सामान्य केसरिया, गहरा केसरिया, हल्का पीला, गहरा पीला, क्रीम (पीला-केसरिया) रंग के पलाश खोज चुका हूँ तो हौसला और भी बढ़ गया कि अभी भी घने जंगलों के बीच कहीं न कहीं सफेद पलाश के वृक्ष अवश्य बचे हैं। आइए जानते हैं कि सफेद पलाश आखिर इतना रहस्यमई क्यों है...?

सभी पलाश की तरह सफेद पलाश भी एक झाड़ीदार वृक्ष है। लेकिन सफेद पलाश की ही बात करूं तो यह भी 4 किस्म का होता है।
1) एक तो अन्य रंगों के पलाश की ही तरह लेकिन इनके पुष्प बाहर से देखने पर रोएंदार आवरण के कारण सफेद दिखाई देते हैं जबकि भीतर से हल्के पीले या नारंगी रंग का होता है।
2) दूसरा हल्के नारंगी रंग की आभा लिए होता है किंतु इनके पेड़ विशाल लताओं के रूप में होते हैं। ये पुष्प झाड़ीदार पलाश से आकार में कुछ छोटे होते हैं। 
3) तीसरा पूरी तरह से सफेद पलाश जो मैने बचपन में देखा था, सड़क निर्माण में अब वह पेड़ समाप्त हो चुका है, बिल्कुल वैसी ही एक फोटो Anjney Sharma जी की पोस्ट से लेकर एल्बम में शामिल की है। 
4) इन सबके अलावा जो चौथा सफेद पलाश है उसके पुष्प काफी छोटे होते हैं, वास्तव में यह पलाश नहीं है, लेकिन हूबहू पलाश की तरह दिखाई देता है। गांव देहात में इसे तिनसा के नाम से जाना जाता है। 
           ऊपर वर्णित 4 में से 3 प्रकार के सफेद पलाश आपके समक्ष प्रस्तुत हैं। चौथे लता पलाश में अभी पुष्प आने शेष हैं जल्द ही उसकी अलग और विस्तृत पोस्ट करूंगा। कोलाज में शामिल केवल एक को छोड़कर सभी फोटो मेरे द्वारा ही संकलित और खींची गई हैं अतः शंका की कोई गुंजाइश नहीं है। केवल एक फोटो जो मैने स्वयं नहीं खींची है, उसकी सत्यता की गारंटी में नहीं दे सकता। आइए अब रंगो और पहचान की दुनिया से दूर सफेद पलाश की रहस्यमई चर्चा वाली दुनिया में कदम रखते हैं। 

कहते हैं पलाश वृक्ष में त्रिदेव की शक्ति होती है। तंत्र शक्ति के जानकारों का तो मानना है कि इससे धन वर्षा तक की सकती है। लेकिन मेरी दादी माँ कहती है- इसमें देवी अन्नपूर्णा का वास है, उन्होंने भी शायद इसे उनकी दादी माँ से सुना होगा। पीढ़ी दर पीढ़ी यह ज्ञान इसी तरह निरंतर आगे बढ़ रहा है। 
               केसरिया पलाश की खूबसूरती से भला कौन परिचित नहीं होगा? ये पलाश पुष्प तो जैसे होली का पर्याय ही बन गए है। पहले गाँव देहात में खुशियों का उत्सव होली पलाश के फूल से ही मनाया जाता था। धीरे धीरे रासायनिक रंगों ने रायता फैला दिया और लोग रंग खेलने से कतराने लगे। लेकिन चर्चाओं के बाजार की बात करें तो सबसे मजेदार है सफेद पलाश की चर्चा, इसके कुछ किस्से रोचक हैं तो कुछ विवादास्पद। लेकिन यकीन मानिये कि जिसे कोई एक सही कहेगा उसे दूसरा गलत ठहरा देगा, और दूसरा जिसे सही समझेगा पहला उसे गलत साबित कर देगा। अब ये तो आपको तय करना है कि आप किसके पक्ष में खड़े हैं...              
                 
वैसे पलाश सिर्फ सुंदर और धार्मिक महत्व वाला पेड़ नही है, बल्कि यह बेशकीमती और उपयोगी भी है। इसके औषधीय गुणों का तो कोई तोड़ ही नही है। इसकी गोंद कमरकश कहलाती है। सफेद पलाश की कमरकश बेशकीमती है। यह प्रसव के बाद ढीली पड़ चुकी मांसपेशियों में पहले जैसी कसावट लाने का कार्य करती है। कमर दर्द और जोड़ों के दर्द की भी यह रामबाण औषधि है।
               पंद्रह से बीस बरस पहले पलाश की छाल मजबूत रस्सियाँ बनाने का बेहतरीन स्त्रोत थी, जिससे कृषि उपयोग के कार्यों में प्रयोग लिया जाता था। अरे भाई #कुची याद है न...? दीवाली के समय चूने और गेरू की पुताई के लिए बनाये जाने वाले हर्बल ब्रश/ कूची इसी पेड़ की जड़ों से बनाये जाते है। और इसकी लकड़ियों से तैयार फावड़े, गैंती के बेंसो का तो कोई तोड़ ही नही था। इतना ही नही ठनका लगने पर यही शांति देता था। अब आप पूछेंगे ये ठनका क्या है, देहाती लब्ज है साहेब, पेशाब में जलन नही बल्कि रुक रुक कर थोड़ी मात्रा में मूत्र विसर्जन को ठनका कहते हैं। बहुत बैचेन कर देने वाली अवस्था होती है। इसकी छाल या पत्तियों का काढ़ा इसकी बेहतरीन औषधी है। इसके पत्तों पर चिकोड़ी पापड़ बनते थे, जो हमारा क्षेत्रीय पारंपरिक व्यंजन है। पापड़ के खौलते हुए मिश्रण में इन पत्तों के रस के रसायन मिलकर जरूर कोई न कोई औषधीय गुण हमारे शरीर मे पहुँचाते रहे होंगे, तभी तो इनके रहते कोई बड़ी बीमारियां गाँव देहात में जाने से परहेज करती रही।
               
जितना यह वृक्ष अपनी खूबसूरती के लिये चर्चा में है, उससे कहीं ज्यादा यह तांत्रिक प्रयोगों के लिए जाना जाता है। हालांकि इसके हजारों औषधीय महत्व भी हैं, किंतु आजकल ये उपयोग में नहीं रह गए हैं। ज्यादातर लोग सफेद पलाश ढूंढते हैं, वो भी इसीलिये कि इसके मिल जाने से वे धनवर्षा करवा लेंगे। इससे मैं सहमत नही हूँ, लेकिन धार्मिक परिवेश में मेरी परवरिश हुयी है, तो बचपन से सुनता आया हूँ। कि इसके पेड़ के नीचे बनाया गया भोजन कभी कम नही पड़ता है, मतलब अन्नपूर्णा देवी का वरदान है इसमें, इसीलिए यह समृद्धि का प्रतीक भी है। घर मे इसे लगाकर नित्य पूजन करने से अच्छा भाग्य, सकारात्मक विचार और मन को शांति मिलती है।
                  इसके विषय में एक और मान्यता है - कहते हैं कि सफेद पलाश के नीचे जाने पर दिन में भी तारे दिखने लगते हैं। असली तारे का तो पता नही, परंतु मेरा आंकलन यह है कि इसकी छाल के बीच के गढ्ढो पर एक विशेष प्रकार की चमचमाते रंग के पंखों वाली मक्खी आराम फरमाती है, जब कोई इसे स्पर्श करता है, तो वे छोटी छोटी मख्खियाँ उड़ने लगती हैं, जिनके पंख बिल्कुल छोटे लाइट या आईने की तरह चमकने लगते हैं। अन्य शब्दो मे कहें तो तारों की तरह चमकते हैं, शायद इसी वजह से भ्रम उत्पन्न हो गया होगा। यह कीट इसके पेड़ में निवास के लिए एक बायोलॉजिकल इंडिकेटर हो, ऐसी भी संभावना है।
                 
पलास की लगभग सभी प्रजातियों में चाहे वह, लाल हो, सफेद हो, पीला हो या क्रीम रंग का, सभी मे पत्तियाँ "ढाक के तीन पात " वाली कहावत को चरितार्थ करती हैं। कबीर दास जी भी पलास के मोह से बच न सके थे, उन्होंने इसे अपने दोनों में प्रयोग किया था। आपसे साझा कर रहा हूँ...
कबीरा गरब न कीजिए, इस जोबन की आस।
टेसू फूले दिवस दस, खांखर भया पलास।।
                ब्रम्हा-विष्णु-महेश त्रिदेवों की शक्तियाँ समेटे यह वृक्ष आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। कभी सड़क के दोनो ओर का क्षेत्र इनका आवास हुआ करता था, किन्तु आजकल कुछ अपरिपक्व हरियाली योद्धा विदेशी मूल के जल्दी विकसित होने वाले ऐसे पौधे रोप रहे हैं जिनमे कई तो विदेशी वनस्पतियाँ भी शामिल हैं। इसीलिए अब देशी वनस्पतियाँ समाप्त हो रही हैं। इन पढ़े लिखे आधुनिक विद्वानों ने सबसे अधिक नुकसान पलास पेड़ का ही किया है। उनकी इन हरकतों का दुष्परिणाम भी अब धीरे धीरे देखने को मिल रहा है। विदेशी पौधे अर्थात एलियन स्पीसीज के पौधे आजकल सड़क के दोनो किनारों पर खूब दिख रहे हैं। स्वर्गीय गुरूदेव डॉ. Deepak Acharya जी ने कई बार इस विषय को उठाया लेकिन लोगों पर आधुनिकता का भूत सवार है, तो फिर भला कौन सीधे? 😥
यह जानकारी आपको कैसी लगी बताइएगा...
फिर मिलेंगे, काले पलाश और लता पलाश के साथ...
धन्यवाद ..!

डॉ विकास शर्मा
प्राध्यापक वनस्पति शास्त्र विभाग
शासकीय महाविद्यालय चौरई 
जिला छिंदवाड़ा (म.प्र.)

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