पुराणों में “लज्जा गौरी” नाम से विस्तृत वर्णन प्रत्यक्ष रूप में नहीं मिलता, अपितु मातृशक्ति और आद्यदेवी के रूप में उनका तत्त्व उपस्थित है। देवी भागवत पुराण में आदिशक्ति को समस्त सृष्टि की जननी कहा गया है और मार्कण्डेय पुराण में देवी को सर्वभूतों में मातृरूपेण स्थित बताया गया है। यही मातृतत्त्व लज्जा गौरी के स्वरूप में मूर्त होता है। सातवाहन काल से दक्षिण भारत और दक्कन क्षेत्र में प्राप्त उनकी प्रतिमाएँ प्रमाण देती हैं कि यह स्वरूप अत्यंत प्राचीन लोक-आस्था और तांत्रिक साधना से संबंधित है।
कर्नाटक के महाकूट समूह मंदिर सहित महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र क्षेत्र के कुछ ग्राम-देवता मंदिरों में यह रूप पूजित है। ग्रामीण परंपराओं में उन्हें संतति, भूमि की उर्वरता और गृह-समृद्धि की अधिष्ठात्री माना जाता है।
इनकी साधना मुख्यतः शाक्त साधकों, तांत्रिक परंपरा के उपासकों तथा संतति-प्राप्ति की कामना रखने वाले दम्पत्तियों द्वारा की जाती है। यह साधना बाह्य प्रदर्शन से अधिक आंतरिक ध्यान और मातृतत्त्व के चिंतन पर आधारित होती है। लज्जा गौरी का ध्यान साधक को सृजन-शक्ति, स्थिरता और जीवन की मूल ऊर्जा से जोड़ता है।
शास्त्र में आद्यदेवी के लिए कहा गया है—
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥
लज्जा गौरी स्मरण कराती हैं कि समस्त सृष्टि का मूल स्त्री-तत्त्व है। जहाँ जन्म है, वहीं देवी का स्पंदन है; जहाँ उर्वरता है, वहीं आदिशक्ति का निवास है।
नमामीशमीशान
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