Pages

Wednesday, 18 March 2026

माँ भुवनेश्वरी देवी - एकाक्षरी "ह्रीं मंत्र" साधना विधि!!

माँभुवनेश्वरी!!
एकाक्षरी "ह्रीं मंत्र" साधना विधि!! 
       माँ भुवनेश्वरी की आराधना हेतु आज सर्वोत्तम दिवस है गुत नवरात्री अथवा भुवनेश्वरी महाविद्या की जयंती तिथि। दस महाविद्याओं में से पंचम महाविद्या भगवती भुवनेश्वरी का भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को प्रादुर्भाव हुआ माना जाता है। 

भुवनेश्वरी महाविद्या का स्वरूप सौम्य है और इनकी अंगकान्ति अरुण है। भक्तों को अभय और समस्त सिद्धियाँ प्रदान करना इनका स्वाभाविक गुण है। वास्तव में मूल प्रकृति का ही दूसरा नाम भुवनेश्वरी है। दशमहाविद्याएँ ही दस सोपान हैं। काली तत्व से निर्गत होकर कमला तत्व तक की दस स्थितियाँ हैं, जिनसे अव्यक्त भुवनेश्वरी व्यक्त होकर ब्रह्माण्ड का रूप धारण कर सकती हैं तथा प्रलय में कमला से अर्थात् व्यक्त जगत से क्रमशः लय होकर कालीरूप में मूलप्रकृति बन जाती हैं। इसीलिये भगवती भुवनेश्वरी को काल की जन्मदात्री भी कहा जाता है।

ईश्वररात्रि में जब ईश्वर के जगद्रूप व्यवहार का लोप हो जाता है, उस समय केवल ब्रह्म अपनी अव्यक्त प्रकृति के साथ शेष रहता है, तब उस ईश्वररात्रि की अधिष्ठात्री देवी भुवनेश्वरी कहलाती हैं। इनके मुख्य आयुध अंकुश और पाश हैं। अंकुश नियंत्रण का प्रतीक है और पाश राग अथवा आसक्ति का प्रतीक है। इस प्रकार सर्वस्वरूपा मूल प्रकृति ही भुवनेश्वरी हैं, जो विश्व को वमन करने के कारण वामा, शिवमयी होने से ज्येष्ठा और कर्म-नियंत्रण, फलदान करने व जीवों को दण्डित करने के कारण रौद्री कही जाती हैं। भगवान् शिव का वाम भाग ही भुवनेश्वरी कहलाता है।

भुवनेश्वरी के संग से ही भुवनेश्वर सदाशिव को सर्वेश होने की योग्यता प्राप्त होती है। महानिर्वाणतन्त्र के अनुसार समस्त महाविद्याएँ भगवती भुवनेश्वरी की सेवा में सदा संलग्न रहती है। सात करोड़ महामन्त्र इनकी सदा ही आराधना किया करते हैं। बृहन्नीलतन्त्र व पुराणों के अनुसार प्रकारान्तर से काली और भुवनेशी दोनों में अभेद है अर्थात् कोई अन्तर नहीं है। अव्यक्त प्रकृति भुवनेश्वरी ही रक्तवर्णा काली है।

देवीभागवत के अनुसार दुर्गम नामक दैत्य के अत्याचार से संतप्त होकर देवताओं और ब्राह्मणों ने हिमालय पर सर्वकारणस्वरूपा भगवती भुवनेश्वरी की ही आराधना की थी। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवती भुवनेश्वरी तत्काल प्रकट हुईं। वे भुवनेश्वरी महाविद्या अपने हाथों में बाण, कमल-पुष्प तथा शाक-मूल लिये हुए थीं। तब भुवनेश्वरी माँ ने अपने नेत्रों से अश्रुजल की सहस्रों धाराएँ प्रकट कीं। इस जल से भूमण्डल के सभी प्राणी तृप्त हो गये। समुद्रों तथा सरिताओं में अगाध जल भर गया और समस्त औषधियाँ सिंच गयीं। अपने हाथ में लिये गये शाकों और फल-मूल से प्राणियों का पोषण करने के कारण भगवती भुवनेश्वरी ही 'शताक्षी' तथा 'शाकम्भरी' नाम से विख्यात हुईं। इन्होंने ही दुर्गमासुर को युद्ध में मारकर उसके द्वारा अपहृत वेदों को देवताओं को पुनः सौंपा था। उसके बाद इन भगवती भुवनेश्वरी का एक नाम दुर्गा प्रसिद्ध हुआ।

भुवनेश्वरी मन्त्र
〰️〰️〰️〰️〰️
इन देवी के कई मंत्र हैं जो क्लिष्ट होने के साथ गुरुगम्य भी हैं पर एक सरल सा एकाक्षरी बीज मंत्र है माँ भुवनेश्वरी का

"ह्रीं"

इसका मन्दिर में भगवान के सम्मुख बैठकर 5 मिनट, 10 या 15 मिनट मन ही मन जप करना शुभ फलों व माता भुवनेशी की कृपा को दिलाने वाला होता है।

ह्रीं को माया बीज भी कहा जाता है, यह अति सरल मन्त्र है। इसमें ह् का अर्थ है शिव, र् का अर्थ है प्रकृति, नाद का अर्थ है विश्वमाता एवं बिंदु का अर्थ दुखहरण है। इस प्रकार इस मायाबीज का अर्थ है शिव सहित विश्वमाता प्रकृति आद्याशक्ति मेरे दुखों को दूर करे।'

भुवनेश्वरी एकाक्षरी मन्त्र जप विधि
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
विनियोग : एकाक्षरी मन्त्र के जप से पूर्व यह श्लोक पढ़कर आचमनी से भूमि पर जल छोड़ दे :

ओऽम् अस्य श्री भुवनेश्वरी एकाक्षर मन्त्रस्य शक्तिऋषिः गायत्रीः छन्दः, भुवनेश्वरी देवताः, हं बीजं, ईं शक्तिः, रं कीलकं, चतुर्वर्गसिद्धयर्थे जपे विनियोगः

(इस एकाक्षर मन्त्र के "शक्ति" ऋषि हैं, छन्द गायत्री, भुवनेश्वरी देवता हैं | हं बीज, ईं शक्ति व कीलक 'रं' है और विनियोग 'चतुर्वर्गसिद्धये' है अर्थात धर्म अर्थ काम मोक्ष चारों पुरुषार्थ इस मन्त्र द्वारा प्राप्त होते हैं।)

ऋष्यादिन्यास : 
ॐ शक्तिऋषये नमः शिरसि ॥(सिर का स्पर्श करे) 
गायत्री छन्दसे नमः मुखे ।।(मुख का स्पर्श करे ) 
भुवनेश्वरी देवतायै नमः हृदिः ।।( हृदय को स्पर्श करे )
ईं शक्तये नमः पादयोः ।।( पैरों को स्पर्श करे )
हं बीजाय नमः गुह्ये ॥(बायें हाथ से नितम्ब स्पर्श करे )
रं कीलकाय नमः नाभौ ।।( नाभि स्पर्श करे )
चतुर्वर्ग-सिद्धयर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ।।(सभी अंगों को छुए)

इसके बाद करन्यास, षडंगन्यास 'ह्रां ह्रीं ह्रूं हैं ह्रौं ह्रः' इत्यादि से करे -

करन्यास :
ॐ ह्रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
(दोनों हाथों की तर्जनी अँगुलियों से दोनों अँगूठों का स्पर्श करे )

ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः । (दोनों हाथों के अँगूठों से दोनों तर्जनी अँगुलियों का स्पर्श करे )

ॐ हूं मध्यमाभ्यां नमः ।
(अँगूठों से मध्यमा अँगुलियों का स्पर्श करे )

ॐ हैं अनामिकाभ्यां नमः ।
(अनामिका अँगुलियों का स्पर्श करे) 

ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः। 
(कनिष्ठिका अँगुलियों का स्पर्श करे )

ॐ ह्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
(हथेलियों और उनके पृष्ठभागों का परस्पर स्पर्श करे )

हृदयादि षडंगन्यास 
ॐ ह्रां हृदयाय नमः ।
(दाहिने हाथ की पाँचों अंगुलियों से हृदय का स्पर्श)

ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा ।
(दाहिने हाथ की चार अंगुलियों से सिर का स्पर्श)

ॐ हूं शिखायै वषट् ।
(दाहिने हाथ के अंगूठे से शिखास्थान का स्पर्श)

ॐ हैं कवचाय हुम्।
(दाहिने हाथ की अँगुलियों से बायें कंधे का और बायें हाथ की अँगुलियों से दाहिने कंधे का एक साथ स्पर्श)

ॐ ह्रौं नेत्र-त्रयाय वौषट् ।
(दाहिने हाथ की अनामिका व तर्जनी अँगुलियों के अग्रभाग से दोनों नेत्रों का और मध्यमा अंगुली के अग्रभाग से ललाट के मध्यभाग का स्पर्श)

ॐ ह्रः अस्त्राय फट् ।
(यह वाक्य पढ़कर दाहिने हाथ को सिर के ऊपर से बायीं ओर से पीछे की ओर ले जाकर दाहिनी ओर से आगे की ओर ले आयें और तर्जनी तथा मध्यमा अँगुलियों से बायें हाथ की हथेली पर ताली बजायें)

ध्यान: भगवती भुवनेश्वरी का ध्यान इस प्रकार है बालरवि-द्युतिमिन्दु- किरीटां तुंगकुचां नयनत्रययुक्ताम् ।
स्मेरमुखीं वरदाङ्ङ्कुश-पाशाभीति-करां प्रभजे भुवनेशीम् ॥

इसका भाव है कि "मैं भुवनेश्वरी देवी जी का ध्यान करता हूँ जिनके श्रीअंगों की आभा प्रभातकाल के सूर्य के समान है और मस्तक पर चन्द्रमा का मुकुट है। वे तुंगकुचा और तीन नेत्रों से युक्त देवी हैं। उनके मुख पर मुस्कान की छटा छायी रहती है और हाथों में वरद, अङ्कुश, पाश एवं अभय मुद्रा शोभा पाते हैं।"

पूजन👉 भुवनेश्वरी महाविद्या यन्त्र, भुवनेश्वरी देवी जी के चित्र पर या फिर श्री यन्त्र पर निम्न प्रकार से पूजन करे :

1👉 ॐ ह्रीं भुवनेश्वरी देव्यै नमः लं पृथिव्यात्मकं गंधं परिकल्पयामि | ( देवि भुवनेश्वरी आपको नमस्कार है! मैं पृथ्वीरूप गन्ध (चन्दन) आपको अर्पित करता हूँ)

2👉 ॐ ह्रीं भुवनेश्वरी देव्यै नमः हं आकाशात्मकं पुष्पं परिकल्पयामि |

(देवि भुवनेश्वरी आपको नमस्कार है! मैं आकाशरूप पुष्प आपको अर्पित करता हूँ )

3👉 ॐ ह्रीं भुवनेश्वरी देव्यै नमः यं वाय्वात्मकं धूपं परिकल्पयामि।

( देवि भुवनेश्वरी आपको नमस्कार है! मैं वायु में धूप आपको प्रदान करता हूँ ) के रूप

4👉 ॐ ह्रीं भुवनेश्वरी देव्यै नमः रं वह्न्यात्मकं दीपं दर्शयामि।

( देवि भुवनेश्वरी आपको नमस्कार है। मैं अग्नि के रूप में दीपक आपको प्रदान करता हूँ)

5👉 ॐ ह्रीं भुवनेश्वरी देव्यै नमः वं अमृतात्मकं नैवेद्यं निवेदयामि ।

(देवि भुवनेश्वरी आपको नमस्कार है! मैं अमृत के समान नैवेद्य आपको निवेदन करता हूँ )

6👉 ॐ ह्रीं भुवनेश्वरी देव्यै नमः सौं सर्वात्मकं सर्वोपचारं मनसा परिकल्प्य समर्पयामि।

( हे देवि भुवनेश्वरी आपको नमस्कार है! मैं सर्वात्मक रूप में संसार के सभी उपचारों को आपके चरणों में समर्पित करता हूँ) इसके बाद जप प्रारम्भ करे।

पुरश्चरण विधि👉
〰️〰️〰️〰️〰️ उपरोक्त मन्त्र के पुरश्चरण के लिये 32 लाख बार मन्त्र जप करने का विधान है। साथ ही जप का दशांश हवन (तीन लाख बीस हजार बार) त्रिमधु मिलाकर अष्टद्रव्यों से करे । त्रिमधु होता है : घृत, मधु, शर्करा । अष्ट-द्रव्य आठ हैं : 1. अश्वत्थ (पीपल), 2. यज्ञोदुम्बर (गूलर), 3. पाकड़, 4. वट, 5. तिल, 6. सफ़ेद सरसों, 7. पायस (दूध / खीर), 8. घृत।

एक अन्य मत से अष्ट द्रव्य ये भी हैं : ईख, चावल का आटा, कदली फल (केला), चिउड़ा (कुटा चावल / पोहे वाला चावल), तिल, लड्डू, नारियल, खील इतना अधिक मन्त्र जप तथा हवन एक दिन में सम्भव नहीं। 

अतः इस प्रकार से अपनी सुविधा के अनुसार दिनों में जप व हवन संख्या को बांट लेना चाहिए | प्रतिदिन समान संख्या में जप करे। संख्या घटा बढा नहीं सकते। प्रतिदिन जप करके देवी को समर्पित कर देना चाहिए :

जप समर्पण प्रार्थना
〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 
ॐ गुह्याति गुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत् कृतं जपम्। 
सिद्धिर्भवतु मे देवि! त्वत् प्रसादान्महेश्वरि ॥


भारतीय संस्कृति 
वयं राष्ट्रे जागृयाम 

No comments:

Post a Comment