** १८ हजार श्लोकों का विस्तृत अद्भुत अपूर्व
षोडश कला परिपूर्ण लीलापुरुष श्री कृष्ण का
चरित कथामृत है भागवत महापुराण l
जीवन में जब भी बीमार पड़ा तब तब हृदय पर
इस ग्रंथ को लेकर रहा l यह ग्रंथ नहीं परम भेषज है l पंद्रह वर्ष की अवस्था में पुरस्कार पाने के लिए गजेन्द्रमोक्ष को याद किया lआज भी याद है l
बहुत तेज बुखार ग्रस्त होने पर आज भी वैष्णव ज्वरमंत्र का तीन पाठ करताहूँ l १९८६ से नारायण
कवच का पाठ करता हूँ l सन् २००० हजार से गीता का नित्य पाठ आरम्भ किया जो २० वर्षों तक चलता रहा l २०१८ में नींद उड़ जाने पर दशम स्कन्ध का पाठ करना आरम्भ किया l १८ वें दिन
पूर्ण स्वस्थ हो गया l २०२० से पूर्ण शाक्त बना बैठा हूँ lसब कुछ उस पार्थ सखा का चमत्कार है l
** आज कल जो भागवत कथा चल रही है वह प्रेत तारक, संतति दायक, मोक्ष दायक नहीं है l यह मनोरंजक, भागवत पथ से बहुत दूर विलास प्रद है l
** आज भी काशी हिन्दू विश्व विद्यालय में पौष मास (दिसंबर) में महामना भारत रत्न मालवीय जी की जयंती पर एक सप्ताह में १८ हजार श्लोकों का किसी एक विद्वान द्वारा वाचन किया जाता है l
मालवीय जी भागवत के बहुत बड़े विद्वान थे l उनको हजारों श्लोक याद थे l
** भागवत महापुराण के मंत्रों के पाठ से सृष्टि में अपूर्व सुख मिलता है l मनोमय जगत पूरी तरह से
सात्विक और कृष्णमय हो जाता है l युगधर्म को बदल देने की क्षमता केवल एक ग्रंथ में है और उसका नाम है भागवत l
** ‘’ विद्यावताँ भागवते परीक्षा ‘’ विद्वानों की परीक्षा भागवत के वाचन में हो जाती है l जो आदि से अंत तक १२ बार भागवत का पारायण कर ले वही उसे शुद्ध रूप में धाराप्रवाह पढ़ने का पाठक हो पाता है l पंचमस्कन्ध का गद्य और वेद मन्त्र से स्पर्धा करती स्तुतियों को पढ़ते समय लगता है शुक जी की जिह्वा पर वाक् तत्त्व के चारो आयाम
परा,पश्यंती,मध्यमाऔर वैखरी उपस्थित रहे हैं l
** भागवत के एक श्लोक अथवा उसका आधा का भी पाठ जो प्रतिदिन करता है उसे परा गति अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति होती है —-
श्लोकार्धं श्लोकपादं वा नित्यं भागवतोउद्भवम्l
पठस्व स्व मुखेनैव यदीच्छसि परां गति: ll
अपने मुख से पढ़िये l कथा के नाम पर ग़ज़ल चुटकुले सुनने से मन की बाह्य वृत्ति को आनंद का शुष्क परिणाम आयेगा जो निरर्थक लगेगा l
जिस दिन भागवत पढ़ने का भीतर से भाव उत्पन्न हो जाएगा समझ लीजिए आगे के हजारों वर्ष के
मधुमास निर्मित हो जायेंगे और पीछे के हजारों वर्षों की दुर्वासना चितायें जल कर भस्म में बदल जायेंगी l
** भागवत पुराण कथा अमृत सुनने की सही प्रक्रिया कौन सी है ?
एक संस्कृत का सधा विद्वान पाठकर्त्ता चुनिए जो ६ घंटा बैठ कर पाठ करने की क्षमता रखता हो l
प्रातः काल पाठ हो सायं काल उस स्कन्ध से संबंधित कथा हो l इस प्रकार एक सप्ताह तक १८ हज़ार श्लोकों का वाचन पूर्ण हो l
दूसरी प्रक्रिया है— एक भागवत पाठी हिंदी अनुवाद पढ़ कर सुनाये और जहाँ कठिन अंश हो उसकी व्याख्या करे l इस प्रकार भागवत का अमृत रस जीवन को आदि से अंत तक मिल जायेगा l
अन्य प्रकार से तो समझ लीजिए की केवल बालू का चबेना चबाया जा रहा है l
** एक और विधि है— किसी विशिष्ट भागवत विद्वान को बुलाइय और उससे एक एक प्रकरण पर गहरी अनुभूति की व्याख्या सुनिये l यदि थोड़ा आनंद ले कर देखना हो तो रासपंचाध्यायी की व्याख्या कुछ विद्वानों की पढ़िए l शुक देव जी कहते हैं विश्व का सर्वश्रेष्ठ आम लिया जाय और उसके रस को पिया जाय तो उसमें और भागवत जी के रस में एक अंतर रह जायेगा l आम का रस स्वादु होगा, पेय होगा, हृदय आह्लादक होगा पर उसमे भागवत रस का अमृतत्त्व नहीं होगा l अनेक जन्मों तक उसका स्वाद स्मरण में नहींबना रहेगा l
** हरिरस्तु हृदंतरे **
हरि हृदय में बने रहें ।
( आचार्य मिथिला प्रसाद त्रिपाठी, आचार्य के बी कृष्णन,आचार्यउपेन्द्र पांडेय,आचार्य हरिप्रियदास इस पोस्टको लाइक किये हैं l आप सभी भागवत के प्रकृष्ट वाचक और भक्त विद्वान हैं l)
✍️कमलेश्वर उपाध्याय
टिप्पणी -
आचार्य मिथिला प्रसाद त्रिपाठी का परिचय
आचार्य मिथिला प्रसाद त्रिपाठी एक प्रसिद्ध संस्कृत साहित्यकार हैं जिन्होंने अपने काम के लिए कई पुरस्कार प्राप्त किए हैं। उनकी व्याख्या और ज्ञान को बहुत सम्मान दिया जाता है, विशेष रूप से भागवत कथा और संस्कृत साहित्य में। आइए उनके बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें जानते हैं ¹ ² ³:
- परिचय: आचार्य मिथिला प्रसाद त्रिपाठी एक संस्कृत विद्वान और साहित्यकार हैं जिन्होंने महर्षि पाणिनि संस्कृत विश्वविद्यालय में कुलपति के रूप में कार्य किया है। उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
- साहित्यिक योगदान: उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति है "भार्गवीयम्", जिसके लिए उन्हें 2010 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
- व्याख्यान: उन्होंने एकलव्य विश्वविद्यालय में एक व्याख्यान दिया, जिसमें उन्होंने विश्वविद्यालय की प्राच्य विद्या और भाषाओं के अध्ययन-अध्यापन की सराहना की।
- विचार: उन्होंने कहा कि श्रीराम लोकमानस के नायक हैं और उनका चरित्र समाज के लिए एक आदर्श है। उन्होंने तुलसीदास की रामचरितमानस की भी प्रशंसा की।
- लेखन: उनकी लेखनी में संस्कृत साहित्य और दर्शन की गहराई और विस्तार से चर्चा की गई है, जैसे कि उनके लेख "आनन्द विमर्शः" में देखा जा सकता है।
आचार्य मिथिला प्रसाद त्रिपाठी की व्याख्या और साहित्यिक योगदान से हमें संस्कृत साहित्य और दर्शन की समृद्धि का पता चलता है।
वयं राष्ट्रे जागृयाम
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