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Thursday, 14 May 2026

आखिरी पेन

🍃                             ॥ॐ॥                        🍃

         एक सच्ची घटना कभी मौका मिले तो अवश्य जाईयेगा देखने मदुरै में आज भी एक दुकान मिलेगी पेन की 

           कहानी का नाम है....आखिरी पेन...!!

स्थान का नाम है मदुरै, मीनाक्षी मंदिर का प्रवेश द्वार।

ये कहानी है एक ऐसे साउथ इंडियन ब्राह्मण की जो व्यक्ति विशेष तो नही थे मगर सोच बहुत विशाल था वो व्यक्ति पेरियासामी...आयु 60 वर्ष। 

प्रतिदिन सुबह 6 बजे वह मंदिर के प्रवेश द्वार पर बैठते थे।

 उनके सामने एक छोटा सा कपड़ा बिछा होता, जिस पर पेन, पेंसिल, रबर और कंपास बॉक्स जैसी चीजें सजी होतीं। 

एक फुटपाथ की दुकान। लेकिन खास कोई धंधा नहीं।

पेरियासामी का एक नियम था। जब भी कोई बच्चा पेन मांगने आता, तो वह पहले पूछते:
“बेटा... क्या परीक्षा देने जा रहे हो?”

“हाँ दादा। आज गणित का पेपर है।

 मैं पेन भूल गया हूँ।”

तुरंत पेरियासामी एक अच्छी पेन चुनकर उसे देते।

“ये लो। यह लकी पेन है। जाओ, 100 में से 100 नंबर लाना।”

“कितने पैसे हुए दादा?”

“पैसे बाद में। पहले परीक्षा देकर आओ। फिर वापस आकर अपने नंबर बताना, तब पैसे देना।”

बच्चे हँसते हुए दौड़ जाते। वे कभी वापस नहीं आते, और पेरियासामी ने कभी किसी से पूछा भी नहीं।

उनकी पत्नी थंगम उन्हें डाँटती:
“क्या आप पागल हो गए हैं...? 

एक पेन दस रुपये की आती है। अगर आप ऐसे मुफ्त में देते रहोगे, तो हम क्या खाएँगे? घर का किराया कौन देगा?”

पेरियासामी एक पुरानी डायरी निकालते। उसमें उन्होंने तारीख के अनुसार नोट लिखा था:

“12.03.2010 – रमेश – गणित की परीक्षा – पेन – बाकी”
“05.06.2011 – सुमति – हिंदी की परीक्षा – पेन – बाकी”
“18.09.2013 – मुरुगन – 10वीं बोर्ड परीक्षा – पेन – बाकी”

पूरी डायरी ऐसे ‘बाकी’ हिसाबों से भरी थी। गिनती की तो लगभग 3000 पेन। तीस हजार रुपये।

“देखो थंगम,” वह कहते, “यह कर्ज नहीं है, यह मेरा ‘निवेश’ है। 

एक दिन यह अवश्य वापस आएगा।”

थंगम आह भरती:
“तुम्हारा यह निवेश मिट्टी में मिल जाएगा। 

अब तुम बूढ़े हो गए हो, अब कौन वापस आने वाला है?”

बीस साल बीत गए। पेरियासामी अब 80 वर्ष के हो चुके थे। आँखों से धुंधला दिखता था और सुनाई भी कम देता था।

 फिर भी आज भी वही मंदिर का दरवाजा, वही कपड़ा बिछाकर बैठते थे। लेकिन अब बच्चे जेल पेन और ऑनलाइन चीजें इस्तेमाल करते थे, इसलिए उनका धंधा बिल्कुल बंद था।

एक सुबह मंदिर के दरवाजे पर एक बड़ी गाड़ी आकर रुकी। लगभग 35 साल का एक आदमी बाहर निकला—सूट-बूट पहने, हाथ में फूलों का गुलदस्ता।

वह सीधे पेरियासामी के पास गया और उनके चरण छुए।

“दादा... मुझे पहचाना?”

पेरियासामी ने आँखें सिकोड़कर देखने की कोशिश की।
“बेटा... मैं अब बूढ़ा हो गया हूँ। मुझे ठीक से दिखाई नहीं देता।”

“दादा... 18 साल पहले... 10वीं बोर्ड की परीक्षा थी। गणित का पेपर। उस सुबह मैं रोता हुआ आया था। मेरी पेन टूट गई थी और मेरे पास पैसे नहीं थे। आपने मुझे एक पेन दी थी और कहा था—‘यह लकी पेन है, जाओ 100 नंबर लाना।’ आपने पैसे नहीं लिए थे।”

पेरियासामी को धुंधली याद आई।
“बेटा... तू...”

“मैं मुरुगन हूँ, दादा। मैंने उसी पेन से परीक्षा लिखी और 98 नंबर लाया। मैं पास हुआ, कॉलेज गया और आज मेरी अपनी सॉफ्टवेयर कंपनी है—‘पेन्ना टेक्नोलॉजीज़’। मेरी जिंदगी आपकी उस पेन से शुरू हुई थी।”

थंगम दरवाजे पर खड़ी यह सब सुन रही थी, उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

मुरुगन ने एक लिफाफा निकाला।
“दादा... उस दिन मुझे आपको 10 रुपये देने थे। आज मैं ब्याज सहित वापस देता हूँ।”

अंदर दस लाख रुपये का चेक था।

पेरियासामी के हाथ काँपने लगे।
“बेटा... मुझे पैसे नहीं चाहिए। तू सफल हुआ, वही बहुत है।”

“नहीं दादा। यह पैसे नहीं हैं। यह आपका निवेश है—जो मुनाफे के साथ वापस आया है। अब आपको इस फुटपाथ पर बैठने की जरूरत नहीं। मैं आप दोनों की जिम्मेदारी लेता हूँ।”

अगले दिन अखबार में हेडलाइन थी:
“सॉफ्टवेयर उद्योगपति ने फुटपाथ पर बैठने वाले दादा को 10 लाख की गुरुदक्षिणा दी।”

यह खबर पढ़कर दूसरे दिन दूसरी गाड़ी आई।
“दादा, मैं सुमति हूँ। मैंने आपकी दुकान से हिंदी परीक्षा के लिए पेन ली थी। आज मैं हिंदी की शिक्षिका हूँ।”

फिर रमेश आया।
“दादा, मैं आज ऑडिटर हूँ। मेरी जिंदगी की पहली बैलेंस शीट आपकी पेन से लिखी गई थी।”

एक हफ्ते में तो मंदिर के दरवाजे पर जैसे शादी का माहौल बन गया। डॉक्टर, इंजीनियर, कलेक्टर, पुलिस अफसर—सब लाइन में आए, पेरियासामी के पैर छुए और फूल, फल और लिफाफे भेंट में दिए।

थंगम ने पुरानी डायरी निकाली। 3000 एंट्री थीं, 30,000 रुपये बाकी थे। लेकिन आज जो वापस आया था उसकी कीमत 3 करोड़ से भी ज्यादा थी।

पेरियासामी रो पड़े और बोले:
“थंगम... मैंने तुमसे कहा था न। यह कर्ज नहीं था। यह तो बीज थे। मैंने इन्हें बोया था और आज यह एक बड़ा जंगल बन गए हैं।”

आज मीनाक्षी मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक बड़ी दुकान है:
“पेरियासामी पेन स्टोर।”

जिसका कोई किराया नहीं है, क्योंकि मुरुगन ने वह दुकान खरीद ली है।

दुकान में एक बोर्ड लगा है:

“यहाँ परीक्षा देने जाने वाले विद्यार्थियों के लिए पेन मुफ्त है। बस वापस आकर अपने नंबर बता देना। पैसे बाद में दे देना।”

उसके नीचे एक छोटी लाइन लिखी है:

“दस रुपये की एक पेन जिंदगी बदल सकती है। विश्वास रखिए।”

और आपको पता है आज वह दुकान कौन चलाता है?

मुरुगन—वही सॉफ्टवेयर कंपनी का मालिक। हफ्ते में दो बार वह अपना सूट उतारकर दुकान में बैठता है और बच्चों को पेन देता है:

“बेटा... यह लकी पेन है। जाओ, 100 में से 100 नंबर लाना।”

आप जो देते हैं, वह सिर्फ पेन नहीं होती—वह एक आशा होती है।

एक दिन वही आशा लौटकर आपके चरणों में झुकेगी।

उस दिन आपको समझ आएगा कि—
आप कभी गरीब नहीं थे।
आप सच में बहुत धनवान थे। 🌹
                                             
          🌸॥卐॥❀ शुभम् स्वस्ति ❀॥卐॥🌸
                     वंदे मातृसंस्कृतम्

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