Pages

Thursday, 14 May 2026

श्री मयूरेश स्तोत्र का यह चमत्कारी पाठ, माना जाता है कि गणपति जी स्वयं हर विघ्न को दूर करते हैं।

।। ॐ श्री गणेशाय नमः ।।

घर में बार-बार बाधाएँ आ रही हैं? काम बनते-बनते रुक जाते हैं? तो बुधवार से शुरू करें श्री मयूरेश स्तोत्र का यह चमत्कारी पाठ, माना जाता है कि गणपति जी स्वयं हर विघ्न को दूर करते हैं।

मानसिक तनाव, रोग, कोर्ट-कचहरी, नौकरी की बाधा या घर की अशांति… श्री गणपति का यह सिद्ध स्तोत्र बदल सकता है आपके जीवन की दिशा।

।। श्री मयूरेश स्तोत्रम् ।।

“जब जीवन में हर ओर बाधाएँ बढ़ने लगें, कार्य रुकने लगें, मानसिक अशांति और रोग परेशान करने लगें, तब श्री गणपति के मयूरेश स्वरूप की उपासना चमत्कारी फल देने वाली मानी गई है।”

भगवान श्री गणेश सभी विघ्नों का नाश करने वाले, बुद्धि और सिद्धि के दाता हैं। 

श्री मयूरेश स्तोत्र अत्यंत प्रभावशाली, चैतन्य एवं सिद्ध स्तोत्र माना गया है।

 इसका नियमित पाठ जीवन की बाधाओं को दूर करके सुख, शांति, उन्नति और सफलता प्रदान करता है।

॥ प्रारम्भिक प्रार्थना ॥

वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ । निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

अर्थ : हे वक्रतुंड भगवान गणेश! आप करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी हैं। मेरे सभी कार्यों को सदा बिना विघ्न के पूर्ण करें।

॥ गणपति ध्यान ॥

सर्वस्थूलतनुं गजेन्द्रवदनं लम्बोदरं सुन्दरम् । प्रस्यन्दन्मदगन्धलुब्धमधुपव्यालोलगण्डस्थलम् ॥ दन्ताघातविदारितारिरुधिरैः सिन्दूरशोभाकरम् । वन्दे शैलसुतासुतं गणपतिं सिद्धिप्रदं कामदम् ॥

अर्थ : मैं माता पार्वती के पुत्र, गजमुख, सुन्दर स्वरूप वाले, सिद्धि और मनोकामना पूर्ण करने वाले श्री गणपति को प्रणाम करता हूँ।

॥ गणपति द्वादश नाम ॥

सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः । लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः ॥ धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः । द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ॥ विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा । संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥

अर्थ : जो व्यक्ति गणेश जी के इन 12 नामों का स्मरण करता है, उसके जीवन में शिक्षा, विवाह, यात्रा, नए कार्य तथा संकट के समय विघ्न नहीं आते।

।। श्रीमयूरेश स्तोत्रम् ।।

ब्रह्मोवाच

॥ 1 ॥
पुराणपुरुषं देवं नानाक्रीडाकरं मुदा । मायाविनं दुर्विभाव्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥

अर्थ : जो आदिपुरुष, समस्त जगत के स्वामी, अनेक दिव्य लीलाएँ करने वाले तथा मायाशक्ति से युक्त हैं, जिनका स्वरूप समझ पाना अत्यंत कठिन है, उन मयूरेश गणपति को मैं प्रणाम करता हूँ।

॥ 2 ॥
परात्परं चिदानन्दं निर्विकारं हृदि स्थितम् । गुणातीतं गुणमयं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥

अर्थ : जो परात्पर, चिदानंदस्वरूप, निर्विकार तथा सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हैं, जो गुणों से परे होकर भी गुणमय हैं, उन मयूरेश को मैं नमस्कार करता हूँ।

॥ 3 ॥
सृजन्तं पालयन्तं च संहरन्तं निजेच्छया । सर्वविघ्नहरं देवं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥

अर्थ : जो अपनी इच्छा से सृष्टि की रचना, पालन और संहार करते हैं तथा सभी विघ्नों का नाश करते हैं, उन देव मयूरेश को मैं प्रणाम करता हूँ।

॥ 4 ॥
नानादैत्यनिहन्तारं नानारूपाणि बिभ्रतम् । नानायुधधरं भक्त्या मयूरेशं नमाम्यहम् ॥

अर्थ : जो अनेक दैत्यों का संहार करने वाले, अनेक रूप धारण करने वाले तथा विभिन्न अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाले हैं, उन मयूरेश को मैं भक्ति सहित प्रणाम करता हूँ।

॥ 5 ॥
इन्द्रादिदेवतावृन्दैरभिष्टुतमहर्निशम् । सदसद्व्यक्तमव्यक्तं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥

अर्थ : जिनकी इन्द्र आदि देवता दिन-रात स्तुति करते हैं और जो व्यक्त-अव्यक्त, सत्-असत् सभी रूपों में विद्यमान हैं, उन मयूरेश को मैं प्रणाम करता हूँ।

॥ 6 ॥
सर्वशक्तिमयं देवं सर्वरूपधरं विभुम् । सर्वविद्याप्रवक्तारं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥

अर्थ : जो सर्वशक्तिमान, सर्वरूपधारी, सर्वव्यापक तथा समस्त विद्याओं के ज्ञाता और उपदेशक हैं, उन भगवान मयूरेश को मैं नमस्कार करता हूँ।

॥ 7 ॥
पार्वतीनदनं शम्भोरानन्दपरिवर्धनम् । भक्तानन्दकरं नित्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥

अर्थ : जो माता पार्वती के पुत्र और भगवान शिव के आनंद को बढ़ाने वाले हैं तथा अपने भक्तों को आनंद प्रदान करते हैं, उन मयूरेश को मैं नित्य प्रणाम करता हूँ।

॥ 8 ॥
मुनिध्येयं मुनिनुतं मुनिकामप्रपूरकम् । समष्टिव्यष्टिरूपं त्वां मयूरेशं नमाम्यहम् ॥

अर्थ : जिनका मुनिजन ध्यान करते हैं, जिनकी स्तुति करते हैं तथा जो उनकी सभी इच्छाएँ पूर्ण करते हैं, उन समष्टि और व्यष्टि रूप भगवान मयूरेश को मैं प्रणाम करता हूँ।

॥ 9 ॥
सर्वाज्ञाननिहन्तारं सर्वज्ञानकरं शुचिम् । सत्यज्ञानमयं सत्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥

अर्थ : जो समस्त अज्ञान का नाश करने वाले, पूर्ण ज्ञान प्रदान करने वाले, पवित्र तथा सत्य-ज्ञान स्वरूप हैं, उन मयूरेश को मैं नमस्कार करता हूँ।

॥ 10 ॥
अनेककोटिब्रह्माण्डनायकं जगदीश्वरम् । अनन्तविभवं विष्णुं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥

अर्थ : जो करोड़ों ब्रह्मांडों के स्वामी, सम्पूर्ण जगत के ईश्वर, अनंत वैभव से युक्त तथा सर्वव्यापी विष्णुरूप हैं, उन मयूरेश को मैं प्रणाम करता हूँ।

॥ 11 ॥
इदं ब्रह्मकरं स्तोत्रं सर्वपापप्रणाशनम् । सर्वकामप्रदं नृणां सर्वोपद्रवनाशनम् ॥

अर्थ : यह स्तोत्र ब्रह्मभाव को प्राप्त कराने वाला, सभी पापों का नाश करने वाला, मनुष्य की सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाला तथा सभी प्रकार के कष्टों और उपद्रवों का नाश करने वाला है।

॥ 12 ॥
कारागृहगतानां च मोचनं दिनसप्तकात् । आधिव्याधिहरं चैव भुक्तिमुक्तिप्रदं शुभम् ॥

अर्थ : यदि इस स्तोत्र का सात दिनों तक श्रद्धापूर्वक पाठ किया जाए तो यह कारागार जैसे संकटों से भी मुक्ति दिलाने वाला माना गया है। यह मानसिक चिंता, रोग और दुखों को दूर करके सुख, समृद्धि तथा मोक्ष प्रदान करता है।

॥ इति श्रीमयूरेशस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

॥ पाठ विधि ॥

प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

पूर्व दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें।

अपने सामने श्री गणेश जी की मूर्ति या गणपति यंत्र स्थापित करें।

दीपक, धूप, पुष्प और दूर्वा अर्पित करें।

बुधवार अथवा शुक्ल पक्ष से पाठ प्रारम्भ करना शुभ माना गया है।

पहले गणपति ध्यान एवं द्वादश नाम का स्मरण करें।

इसके बाद श्रद्धा और एकाग्रता से श्री मयूरेश स्तोत्र का पाठ करें।

पाठ के बाद भगवान गणेश से अपनी मनोकामना प्रार्थना करें।

॥ श्री मयूरेश स्तोत्र के लाभ ॥

• जीवन की बाधाएँ और विघ्न दूर होते हैं। 

• मानसिक तनाव और भय में राहत मिलती है।

 • रोग, शारीरिक कष्ट और नकारात्मकता कम होती है।

 • घर में सुख-शांति और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।

 • कार्यों में सफलता और उन्नति प्राप्त होती है। 

• शिक्षा, व्यापार और नौकरी में लाभ मिलता है।

 • कानूनी समस्याओं एवं संकटों से रक्षा होती है। 

• नियमित पाठ से मन को स्थिरता और आत्मबल प्राप्त होता है।

॥ विशेष महत्व ॥

शास्त्रों में कहा गया है कि यह स्तोत्र केवल स्तुति नहीं, बल्कि सिद्ध और चैतन्य शक्ति से युक्त है। 

श्रद्धा और नियमपूर्वक इसका पाठ करने से भगवान गणपति की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन के कठिन से कठिन मार्ग भी सरल होने लगते हैं।

।। श्री गणराज बिहारी आरती ।।

मैं आरती तेरी गाऊँ, मेरे गणराज बिहारी। 

मैं नित-नित शीश झुकाऊँ, मेरे गणराज बिहारी॥

तुम एकदन्त गणराजा, मैं शरण तुम्हारी आया। 

अब राखो लाज हमारी, मेरे गणराज बिहारी॥

तुम रिद्धि-सिद्धि के दाता, भक्तों के भाग्य विधाता।

 मैं आया शरण तिहारी, मेरे गणराज बिहारी॥

तुम माँ गौरी घर आये, और शिव के मन को भाये।

 अब मेरे घर भी आओ, मेरे गणराज बिहारी॥

कोई छप्पन भोग लगाये, कोई मोदक भोग जिमाये।

 मैं हरदिन तुम्हे मनाऊँ, मेरे गणराज बिहारी॥

मैं आरती तेरी गाऊँ, मेरे गणराज बिहारी॥

अर्थ:=
यह आरती भगवान श्री गणेश जी की भक्ति और समर्पण का सुंदर भाव प्रकट करती है। 

भक्त कहता है कि वह प्रतिदिन गणराज के चरणों में शीश झुकाकर उनकी आरती करता है। 

भगवान गणेश को रिद्धि-सिद्धि के दाता और भक्तों के भाग्य को संवारने वाला बताया गया है।

 भक्त उनसे अपनी लाज रखने, जीवन के कष्ट दूर करने और अपने घर में सुख-समृद्धि का वास कराने की प्रार्थना करता है। 

जैसे भगवान गणेश माता गौरी और भगवान शिव के प्रिय हैं, वैसे ही वे भक्तों के जीवन में भी मंगल और आनंद भरते हैं।

अगर आप भी चाहते हैं कि आपके घर में सुख, समृद्धि और विघ्नों का नाश हो, तो श्रद्धा से गाइए श्री गणराज बिहारी की यह दिव्य आरती।

     ॥ गणपति बाप्पा मोरया ॥ ॥ मंगलमूर्ति मोरया ॥
                  पंडित धनंजय पांडेय भारद्वाज 

                       वयं राष्ट्रे जागृयाम 

No comments:

Post a Comment