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Monday, 20 July 2026

नारद पुराण का 'मेरु प्रस्तार', जिसे दुनियाने'पास्कल त्रिकोण' मान लिया ..

भाग-2
नारद पुराण का 'मेरु प्रस्तार', जिसे दुनिया
ने'पास्कल त्रिकोण' मान लिया!

जब भी हम गणित की किताबों में संख्याओं के उस सुंदर, त्रिकोणीय पिरामिड को देखते हैं जिसके किनारे हमेशा '१' से घिरे होते हैं और हर भीतर की संख्या अपने ठीक ऊपर की दो संख्याओं का जोड़ होती है, तो हमारे दिमाग में तुरंत फ्रांस के महान गणितज्ञ ब्लेज पास्कल का नाम कौंध जाता है। हमें सिखाया गया कि १७वीं शताब्दी में पास्कल ने इस जादुई त्रिकोण को दुनिया के सामने रखा, जो आज 'पास्कल ट्रायंगल' के नाम से प्रोबेबिलिटी (संभावना सिद्धांत) और कॉम्बिनेटोरिक्स (क्रमचय-संचय) की रीढ़ बना हुआ है।

​लेकिन अपनी गौरवशाली धरोहर के पन्नों को पलटें तो एक अलग ही सत्य मुस्कुराता हुआ सामने आता है। इतिहास की इस यात्रा में जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो पाते हैं कि पास्कल से सदियों पहले हमारे ऋषियों और आचार्यों ने इस त्रिकोणीय रहस्य को पूरी तरह सुलझा लिया था। आचार्य पिंगल के 'छंद शास्त्र' और बाद में 'नारद पुराण' में इसी अद्भुत रचना को 'मेरु प्रस्तार' के नाम से विस्तार से पढ़ाया गया था। 'मेरु' यानी पर्वत की तरह उठती हुई एक विशाल संरचना, जिसे संख्याओं के माध्यम से कागज पर उतारा गया था।

​अक्सर आधुनिक मानस में यह धारणा घर कर गई है कि हमारे प्राचीन ग्रंथ और पुराण केवल पूजा-पाठ, कथा-कहानियों और कर्मकांडों की पोटली हैं। लेकिन यह हमारी सबसे बड़ी भूल है। पुराण केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शक नहीं, बल्कि अपने समय के उन्नत विज्ञान और गणित के जीवंत दस्तावेज हैं। जरा सोचिए, जब पश्चिम बुनियादी गिनती के सामान्य सिद्धांतों को व्यवस्थित करने के लिए संघर्ष कर रहा था, तब भारत के गणितज्ञ छंदों के लघु और गुरु (मात्राओं के संयोजन) को समझने के लिए इस जटिल त्रिकोणीय श्रृंखला का सहजता से उपयोग कर रहे थे। 'मेरु प्रस्तार' की हर पंक्ति में छिपी संख्याएं यह बताती थीं कि किसी भी छंद को कितने अलग-अलग तरीकों से रचा जा सकता है। यह केवल कोरी गणना नहीं थी, बल्कि कला, संगीत और गणित का वह अनुपम संगम था जो हमारी संस्कृति की सूक्ष्म बौद्धिक गहराई को दर्शाता है।

मेरु प्रस्तार और पास्कल त्रिकोण: एक ही सत्य के दो नाम

​जब हम आधुनिक गणित के सूत्रों को प्राचीन मेरु प्रस्तार के साथ रखकर देखते हैं, तो सदियों की दूरी पल भर में मिट जाती है। जिसे आज दुनिया 'पास्कल ट्रायंगल' कहती है, वह असल में आचार्य पिंगल के 'मेरु प्रस्तार' का ही आधुनिक समीकरण रूप है। दोनों की आत्मा, संरचना और सूत्र बिल्कुल एक हैं।

​आइए इसे सीधे गणित के दर्पण में देखते हैं:

​१. त्रिकोण बनाने का नियम
​पास्कल ट्रायंगल बनाने का सबसे बुनियादी नियम यह है कि किसी भी पंक्ति (Row) की संख्या अपने ठीक ऊपर की दो संख्याओं का जोड़ होती है।

पिंगल का नियम (ईसा पूर्व दूसरी सदी):

​आचार्य पिंगल ने इसे अत्यंत सरल शब्दों में संस्कृत सूत्र के रूप में लिखा था:

​"परे पूर्णमिति"

(अर्थात् पिछले दो खानों की संख्याओं को जोड़कर अगला पूर्ण करो)

पास्कल का सूत्र (१७वीं शताब्दी):
​इसी प्राचीन नियम को आज आधुनिक बीजगणित (Algebra) में इस सूत्र से दर्शाया जाता है:

{n /k} = {n-1/ k-1} + {n-1 k}
      (देखें चित्र :1)

यहाँ n पंक्ति को और k उसके स्थान को दिखाता है। दोनों ही नियमों का परिणाम बिल्कुल एक समान है—एक ऐसा सुंदर त्रिकोण जिसमें हर संख्या अपने ऊपर के दो कंधों का भार उठाती है:
       (देखें चित्र:2)

२.संयोजनों का गणित (Combinatorics)

​चाहे कविता के छंदों में अक्षरों का उतार-चढ़ाव देखना हो या आधुनिक गणित में 'कॉम्बिनेशंस' (सयोंजन) का पता लगाना हो, दोनों का गणितीय आधार एक ही है।

​आधुनिक सूत्र:
​गणित में n वस्तुओं में से r वस्तुओं को चुनने का सूत्र है:
       (देखें चित्र:3)

मेरु प्रस्तार का सामंजस्य:

​आचार्य पिंगल ने इसका उपयोग छंदों के वर्गीकरण के लिए किया था। यदि हमें 4 अक्षरों के कुल छंद बनाने हों, तो मेरु प्रस्तार की चौथी पंक्ति हमें सीधे कुल संयोजन बता देती है:
       (देखें चित्र:4)

​३. द्विपद प्रमेय (Binomial Expansion) का रहस्य
​जब १०वीं शताब्दी में गणितज्ञ हलायुध ने पिंगल के सूत्रों की व्याख्या की, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि मेरु प्रस्तार का उपयोग समीकरणों के गुणांक (coefficients) निकालने के लिए किया जाता है:
        (देखें चित्र 5)

जब हम इन समीकरणों को खोलते हैं, तो मेरु प्रस्तार की संख्याएं अपने आप बाहर आ जाती हैं:
         (देखें चित्र:6)

पिंगल का 'मेरु प्रस्तार' और पास्कल का 'ट्रायंगल' गणितीय रूप से पूरी तरह समान हैं। पिंगल ने इसे कविता और संगीत की लयबद्धता को मापने के लिए खोजा था, और पास्कल ने इसे शुद्ध गणितीय संभावनाओं के लिए। यह एक ही सत्य के दो छोर हैं, जो हमारी प्राचीन बौद्धिक क्षमता का लोहा मनवाते हैं।

अपनी इस अतुल्य थाती को पहचानना और उस पर गर्व करना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। जब हम 'मेरु प्रस्तार' के इस गणितीय सौंदर्य को देखते हैं, तो हमारा मस्तक गर्व से ऊंचा हो जाता है कि हमारे पूर्वजों ने ज्ञान के उस स्तर को छुआ था जो आज भी आधुनिक विज्ञान को विस्मित करता है। यह धरोहर हमारी है, और इसका गौरव भी हमारा ही है।

​अगले भाग की एक झलक:
मेरु प्रस्तार की इस सुंदर यात्रा के बाद, गणित के अगले भाग में हम चलेंगे उस रहस्यमयी खोज की ओर, जिसके बिना ब्रह्मांड के गोल चक्कर और पहिये अधूरे हैं। क्या सचमुच 'पाई' की खोज और वृत्त के क्षेत्रफल का वह सूक्ष्म गणित केवल पश्चिम की देन है? या फिर हमारे पुराणों में 'चौकोर वेदी' को 'गोल वेदी' में बदलने का वह सटीक रहस्य पहले से दर्ज था, जिसे आज 'Squaring the Circle' कहा जाता है? जानेंगे अगले लेख में!

रश्मि रति
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