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Monday, 20 July 2026

सख्ती के बिना अनुशासन नहीं आता।

डॉ समित शर्मा ने सहकारिता की बैलगाड़ी की रफ्तार को बुलेट ट्रेन की स्पीड में बदला

देश-प्रदेश के अति प्रतिष्ठित IAS अधिकारी #डॉसमितशर्मा के प्रेरणादायी नेतृत्व में राजस्थान के सहकारिता आंदोलन की गाड़ी (बैलगाड़ी) न केवल पटरी पर लौट आयी है, बल्कि #बुलेटट्रेन की स्पीड से सरपट दौड़ने लगी है। एक साल पहले तक, जिस #सहकारीआंदोलन की गति और रीति-नीति, बैलगाड़ी के बराबर आ गयी थी, अब उसने बुलेट ट्रेन की रफ्तार पकड़ ली है। यह डॉ. समित शर्मा के चमत्कारी नेतृत्व का ही परिणाम है कि एक विभाग, जिसमें कुछ माह पहले तक मार्गदर्शन के नाम पर 'नियमानुसार कार्य किया जाए', अंकित कर चिट्ठियां नीचे भेज दी जाती थी, अब वही विभाग, वही अधिकारी, वही कर्मचारी मनोयोग से कार्य संस्कृति के विकास में अपना सतत योगदान देने लगे हैं। जिनकी नीयत योगदान देने की नहीं थी, या जिन्हें डॉ. समित शर्मा (#DrSamitSharma) भी पूर्ववर्ती रजिस्ट्रार/शासन सचिव की भांति 'लापरवाही' को नजरअंदाज करने वाले आईएएस लगते थे, उनकी गलतफहमी को दूर करने के लिए, कठोर अनुशासनात्मक कार्यवाही करते हुए, उन्हें उनके घर से बाड़मेर, जैसलमेर, उदयपुर जैसे सुदूर क्षेत्रों में भेजा गया। इससे यह बात एक बार पुनः प्रमाणित हुई की सख्ती के बिना अनुशासन नहीं आता। अब सब अनुशासित नजर आ रहे हैं।

अधिकारी हो या कर्मचारी, दिन में दो बार, सबकी उपस्थिति अंकित की जाती है। कुछ माह पहले तक ही बात करें, तो अधिकारी सीटों पर होते थे लेकिन अधिनस्थ स्टाफ का अता-पता नहीं होता था। अधिकारी को यह भी ज्ञात नहीं होता था कि स्टाफ अधिकृत तौर पर अवकाश का उपभोग कर रहा है, अथवा फरलो पर है, कार्यालय में आया भी है या नहीं, और आया है और गायब है, तो सीट पर कब आयेगा। सहकारिता विभाग के कार्यालय हो या सहकारी संस्थाएं, अधिकारी फरियादी की भांति फोन कर-करके अधीनस्थ स्टाफ से पूछा करते थे कि कहां हो, आओगे या नहीं। कुल मिलाकर बड़ी ही दयनीय स्थिति थी। कारण, अधिकांश तबादलों एवं पदस्थापन में राजनीतिक हस्तक्षेप रहता था और शीर्ष स्तर से अंकुश लगाने की प्रवृत्ति का त्याग किया जा चुका था।

अनुभाग अधिकारी तो दूर, रजिस्ट्रार और ज्वाइंट रजिस्ट्रार प्रशासन की हिम्मत नहीं थी कि किसी बाबू को भी सहकार भवन से बाहर भेज सकें या उसकी मर्जी के खिलाफ कार्यालय में बुला सकें। संस्थाओं में हालत कुछ ठीक थी, लेकिन प्रधान कार्यालय और जिला कार्यालयों में खाली कुर्सियों फरियादियों, परिवादियों का मुंह चिढ़ाया करती थी।

कोई कानून नहीं बदला, कोई नियम नहीं बदला, कोई सरकार नहीं बदली, विभाग का मंत्री नहीं बदला, लेकिन कमांडर के बदलते ही हालात एकदम से बदल गये हैं, अनुकूल हो गये हैं। कार्य संस्कृति में सुधार के लिए डॉ. समित शर्मा द्वारा एबीएएस (आधार आधारित उपस्थित प्रणाली) लागू करते ही विभाग में प्रातः 9.30 बजे तक और संस्थाओं में प्रातः 10.05 बजे तक प्रायः-प्रायः सभी कुर्सियां फुल हो जाती हैं। विभाग में यह सिलसिला सायंकाल 6 बजे तक चलता है, जबकि संस्थाओं में निर्धारित समयानुसार 5.30 बजे अथवा 5 बजे तक ऐसा ही एकरूप दृश्य देखने को मिलता है, जिसे देखकर बहुत ही सुखद अनुभूति हो रही है। 
इससे सबसे अधिक राहत अनुभाग अधिकारियों, जिला अधिकारियों और संस्था प्रमुखों को मिली हैं। पहले जिनके निर्देश की अधिनस्थ स्टाफ को परवाह नहीं होती थी और काम के लिए बार-बार कहने पर अक्सर नाराजगी देखने को मिलती थी, वहीं अब किसी को कुछ नहीं कहना पड़ता। सब लोग समय पर आते-जाते हैं और कार्यालय पहुंचते ही काम में जुट जाते हैं। कार्य की नियमित समीक्षा और रियल टाइम मॉनिटरिंग का दौर शुरू होने से अधिकारी हो या अधिनस्थ स्टाफ, दोनों ही कार्य में शिथिलता और लापरवाही का अंजाम जानते हैं। 
डॉ. समित शर्मा ने सुविधाओं के दृष्टि से प्रधान कार्यालय के अधिकारियों, कर्मचारियों की पीड़ा को समझते हुए, साल भर से बंद पड़ा वातानुकुलित सिस्टम पुनः शुरू करवा दिया है, जिस पर 70 लाख रुपये से अधिक लागत आयी है। एक साल से वातानुकूलित सिस्टम खराब होने से नेहरू सहकार भवन में संचालित #सहकारिताविभाग के कार्यालयों में अधिकारियों, कर्मचारियों को पूरा ग्रीष्मकाल और चौमासा, भयंकर गर्मी व उसम के विपरीत मौसम में व्यतीत करना पड़ा। इससे कार्यक्षमता भी प्रभावित हुई, और कार्य की गति-प्रगति भी। अब कार्मिकों की सुविधा के लिए सहकार भवन में नई लिफ्ट्स लगाई जा रही हैं। प्रधान कार्यालय सहित जिला कार्यालयों में बेकार और अनुपयोगी रिकार्ड को हटाकर, कार्य लायक माहौल बनाया गया है। सहकार भवन का रंग-पोत कर, खूबसूरती प्रदान की गयी है। अच्छा काम करने वालों का उत्साहवर्धन किया जाता है।
सुविधाओं से परिपूर्ण वातावरण होने एवं एक मजबूत, निष्ठावान, कर्तव्यपरायण एवं साहसी कमांडर की छत्रछाया में, सहकारिता विभाग और सहकारी संस्थाओं के कार्यों को गति मिल रही है, सरकारी योजनाओं की क्रियान्विति गतिमान हो रही है, पेंडेसी समाप्ति की ओर है। "सहकार से समृद्धि" का मार्ग प्रशस्त हो रहा है। इन सकारात्मक परिस्थितियों को साकार करने वाले डॉ. समित शर्मा के लिए हम इतना ही कह सकते हैं कि -         अपना जमाना आप बनाते हैं अहल-ए-दिल, 
     हम वो नहीं जिनको जमाना बना गया ।
साभार ✍️ सहकार गौरव
( फेसबुक पोस्ट दिनांक 20/7/2026 )



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