✍🏻शास्त्रों में बताया गया है कि -
ॐ अर्यमा न तृप्यताम इदं तिलोदकं तस्मै स्वधा नम:।
ॐ मृर्त्योमा अमृतं गमय।
अर्थात अर्यमा पितरों के देव हैं, जो सबसे श्रेष्ठ है उन अर्यमा देव को प्रणाम करता हूँ हे! पिता, पितामह, और प्रपितामह। हे माता, मातामह और प्रमातामह आपको भी बारम्बार प्रणाम है, आप हमें मृत्यु से अमृत की ओर ले चलें ।
आचार्य पं. नरेन्द्र कृष्ण शास्त्री ने बताया कि इसका अर्थ है कि हम पूरे वर्ष भर अपने देवों को समर्पित अनेकों पर्वों का आयोजन करते हैं, लेकिन हममे से बहुत लोग यह अनुभव करते है की हमारी प्रार्थना देवों तक नही पहुँच पा रही है हमारे पूर्वज देवों और हमारे मध्य एक सेतु का कार्य करते हैं, और जब हमारे पितृ हमारी श्रद्धा, हमारे भाव, हमारे कर्मों से तृप्त हो जाते है, हमसे संतुष्ट हो जाते है तो उनके माध्यम से उनके आशीर्वाद से देवों तक हमारी प्रार्थना बहुत ही आसानी से पहुँच जाती है और हमें मनवांछित फलों की शीघ्रता से प्राप्ति होती है।
✍️आचार्य पं. नरेन्द्र कृष्ण शास्त्री
मो.- 9993652408
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