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Saturday, 31 January 2026

भैरवी क्रिया - तांत्रिक प्राण-संयम .. उच्च कोटि के साधकों के लिए कुंडलिनी जागरण का गूढ़ रहस्य

🔥केवल उच्च कोटि के साधकों के लिए — भैरवी क्रिया और कुंडलिनी जागरण का गूढ़ संबंध 🔥

(बिना दीक्षा के सिर्फ पढ़े। कुछ भी करना जोखिम भरा हो सकता है... सावधान) ॐ ह्रीं भैरव्यै नमः।

प्रिय साधको,
तंत्र के गहनतम रहस्यों में से एक है — भैरवी क्रिया।
यह कोई साधारण प्राणायाम या ध्यान नहीं। यह वह अग्नि-क्रिया है जो मूलाधार की सुप्त सर्पिणी को उग्र रूप से जगाती है, उसे सुषुम्ना में प्रज्वलित करती है और सहस्रार तक जल्दी, तेज़ और अनियंत्रित रूप से ले जाती है।

भैरवी क्रिया क्या है?

यह तांत्रिक प्राण-संयम है जिसमें:
कूहू नाड़ी (गुप्त नाड़ी) का प्रयोग होता है।
ऊर्ध्व-गामी श्वास द्वारा ऊर्जा का अमृत-रूपांतरण किया जाता है।

यौन ऊर्जा (ओजस/बीज) को बिना शारीरिक रति के ही ऊपर की ओर मोड़ा जाता है।

माँ त्रिपुर-भैरवी (दस महाविद्याओं में से एक रूप ) की शक्ति को आमंत्रित किया जाता है।

💥 कुंडलिनी जागरण से तुलना:

➡️ सामान्य कुंडलिनी जागरण (हठ/कुंडलिनी योग)
धीमी, क्रमिक (वर्षों लग सकते हैं)

भैरवी क्रिया में कुंडलिनी जागरण
उग्र, तेज़, कभी-कभी क्षणिक

➡️ कुंडलिनी में ऊर्जा का स्वरूप
सौम्य, अमृत-प्रवाह जैसी

 भैरवी क्रिया में 
अग्नि-प्रवाह, ज्वाला जैसी, भस्म करने वाली

➡️ कुंडलिनी जागरण में मुख्य देवी/शक्ति
कुंडलिनी शक्ति (आद्या काली रूप)

भैरवी क्रिया में मुख्य देवी/ शक्ति
भैरवी (उग्र रूप वाली काली/छिन्नमस्ता ऊर्जा)

➡️ कुंडलिनी जागरण में खतरा स्तर
मध्यम (असंतुलन से कुंडलिनी सिंड्रोम)

भैरव क्रिया में खतरा स्तर 
अत्यधिक उच्च (अग्नि से जलना या पागलपन)

➡️ कुंडलिनी जागरण में आवश्यक तैयारी
शुद्धि, आसन, प्राणायाम

भैरवी क्रिया में आवश्यक तैयारी 
पूर्ण दीक्षा, भैरव-भैरवी साधना, गुरु-संरक्षण

कुंडलीनी जागरण में अंतिम लक्ष्य
सहस्रार में शिव-शक्ति मिलन

भैरवी क्रिया में अंतिम लक्ष्य
भस्मीभूत अहंकार के बाद पूर्ण विलय (महासमाधि)

💥 संयुक्त प्रयोग का सूक्ष्म तरीका (केवल दीक्षित साधक के लिए):

पहले भैरव-भैरवी दीक्षा लें (किसी सच्चे अघोरी साधक या पूर्ण गुरु से)।

रोज़ भैरवी बीज का या भैरवी मूल मंत्र का 21 माला जप (जप के दौरान मूलाधार पर अग्नि-कल्पना)।

विशेष भैरवी क्रिया जो अंतिम लक्ष्य तक नित्य करना है। 

दीक्षित साधकों हेतु साधारण वर्णन ( केवल सहाय हेतु ) 

पद्मासन/सिद्धासन में बैठें।
कपाल-भाति जैसी तेज़ श्वास, लेकिन कुंभक में ऊर्जा को कूहू नाड़ी से सुषुम्ना में धकेलें।
प्रत्येक श्वास के साथ ह्रीं बीज का उच्चारण, मूलाधार से आज्ञा तक अग्नि-प्रवाह कल्पना।
सहस्रार में अमृत-वर्षण होने पर ॐ परमहंस जप कर स्थिरीकरण।

भैरवी मंडल और भैरवी के साथ साधना केवल गुरु आज्ञा से ही करे। 

💥 सबसे बड़ा खतरा — जो ९९% साधक नहीं समझ पाते:

"अग्नि-ज्वाला से स्वयं का भस्म होना"

भैरवी क्रिया कुंडलिनी को जोर से धकेलती है। अगर साधक का शरीर-मन-नाड़ियाँ तैयार नहीं, तो भयंकर गर्मी, जलन, पसीना, अनिद्रा हो जाते है। 
मानसिक उन्माद, क्रोध, भ्रम (कुंडलिनी सिंड्रोम का उग्र रूप)।

शारीरिक क्षय — हृदय, मस्तिष्क पर दबाव, अचानक मृत्यु का खतरा।

आत्मा स्तर पर: अहंकार जलने की बजाय फूट जाता है → स्थायी भ्रम या पिशाच-भाव।

इसलिए भैरवी क्रिया केवल वे साधक कर सकते हैं जिनकी:
पहले से कुंडलिनी जागृत हो चुकी हो (या कम से कम मूलाधार-सहस्रार मार्ग खुला हो)।

पूर्ण गुरु-संरक्षण हो।

काम-क्रोध-लोभ से पूर्ण मुक्ति हो।

सिद्धि की बजाय पूर्ण विलय का भाव हो।

💥 चेतावनी:
अगर आपको अभी तक गुरु नहीं मिला, या मन में कोई कामना बाकी है — तो दूर रहो।

जय माँ त्रिपुर-भैरवी। श्री सीताराम विजयते।

(यह पोस्ट केवल जागरूकता हेतु है। बिना योग्य गुरु दीक्षा के कभी प्रयोग न करें।) 🚩🔥🚩

➡️ अघोर दीक्षा हेतु एवं मंत्र दीक्षा हेतु संपर्क कर सकते हैं 

( केवल वही संपर्क करे जो हमारी पोस्ट का नित्य अभ्यास करते है या हमे जानते समझते है। ) 
संपर्क सूत्र।
पूजा जी 9111610710
संजील जी 7665650133

खांसी नजला जुकाम कफ फेफड़ों की कमजोरी रोग चिकित्सा

॥ॐ॥
(१) पीने का सिरप 
खांसी बलगम कफ और कमजोर फेफड़ों का उपचार करने के लिए -
   दो शकरकंद दो पहाड़ी आलू एक चुकंदर तीन को एक घंटे जगरे में भूनकर।
उनको छील कर मिक्सी में दूध डालकर घोट ले 
इसमें कास-अमृत भस्म एक दो चुटकी डालकर पी लें।

बच्चे बूढे को भी आवश्यक हो तो यह औषधि पिला सकते हैं ‌।
साभार - Pramod Asaudhiya
https://www.facebook.com/share/v/176JbSvhuL/


(२) होम ( हवन - धूनी ) चिकित्सा 
(सर्दियों में नजला जुकाम खांसी और छाती में जमें कफ के लिए )
एक सिल्वर फॉइल में दो चम्मच कॉफी, आधा चम्मच दालचीनी और चार-पांच लौंग डालकर आग पर गरम करें.. धूनी आने लगे तो सावधानी से धूनी पूरे घर में घुमायें ।
     ( गर्म पात्र हैं यह ध्यान रखते हुए आपको या अन्य किसी सदस्य को नुक्सान न पहुंचे ) 
 जब यह धुआं नाक से होता हुआ आपके शरीर में जायेगा तो भांति भांति के रोग दूर करेगा 
सप्ताह में दो बार यह उपचार करें ।

✍️ _निशांत गुप्ता_
https://www.facebook.com/share/r/1Dee4HogSr/

_वयं राष्ट्रे जागृयाम_

Friday, 30 January 2026

साइबर-जगत में सुरक्षा

"Facebook अकाउंट को सर्वाधिक सुरक्षित बनाने तथा हैकिंग से बचाव की समग्र एवं वैज्ञानिक रणनीति" 

✓•प्रस्तावना: डिजिटल युग में सोशल मीडिया केवल संवाद का माध्यम नहीं रहा, बल्कि यह व्यक्तिगत पहचान, सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक गतिविधि और सूचनात्मक शक्ति का केंद्र बन चुका है। फेसबुक जैसे प्लेटफ़ॉर्म पर अकाउंट हैक होना केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि गोपनीयता-भंग, आर्थिक हानि, मान-हानि और मानसिक उत्पीड़न का कारण भी बन सकता है।
यह शोधप्रबंध फेसबुक अकाउंट की सुरक्षा को तकनीकी (Technical), मानव-व्यवहारिक (Human Behavioral) तथा प्रणालीगत (Systemic) तीनों स्तरों पर विश्लेषित करता है और हैकिंग से बचाव हेतु सम्पूर्ण सुरक्षा-ढाँचा (Holistic Security Framework) प्रस्तुत करता है।

✓• १.फेसबुक अकाउंट हैकिंग का स्वरूप एवं कारण:

✓•१.१ हैकिंग की परिभाषा:
हैकिंग वह प्रक्रिया है जिसमें कोई अनधिकृत व्यक्ति उपयोगकर्ता की आईडी, पासवर्ड, सत्र (Session) या टोकन पर नियंत्रण प्राप्त कर ले।

✓•१.२ फेसबुक अकाउंट हैक होने के प्रमुख कारण:
•कमजोर पासवर्ड
•एक ही पासवर्ड का अनेक वेबसाइटों पर प्रयोग
•फ़िशिंग लिंक पर क्लिक
•नकली लॉग-इन पेज
•असुरक्षित मोबाइल एप्लिकेशन
•पब्लिक वाई-फाई का उपयोग
•टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन का अभाव

✓•२. पासवर्ड सुरक्षा – प्रथम सुरक्षा-स्तम्भ:

✓•२.१ मजबूत पासवर्ड की वैज्ञानिक संरचना:
एक सुरक्षित पासवर्ड में निम्न तत्व अनिवार्य हैं—
•न्यूनतम १६ वर्ण
•बड़े अक्षर (A-Z)
•छोटे अक्षर (a-z)
•अंक (०–९)
•विशेष चिह्न (@ # $ % & *)

∆उदाहरण (सैद्धान्तिक):
Si@शlkk_२०२६#FB!

✓•२.२ पासवर्ड प्रबंधन के नियम:
•प्रत्येक प्लेटफ़ॉर्म हेतु अलग पासवर्ड
•पासवर्ड कभी भी ई-मेल/मैसेज में साझा न करें
•ब्राउज़र में “Save Password” से बचें
•पासवर्ड मैनेजर (Offline Trusted) का प्रयोग

✓• ३.टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन (2FA) – द्वितीय सुरक्षा-स्तम्भ:

✓•३.१ 2FA का सिद्धान्त:
टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन का अर्थ है—

∆ “कुछ जो आप जानते हैं (Password) + कुछ जो आपके पास है (OTP/Device)”

✓•३.२ 2FA के प्रकार:
•SMS आधारित OTP
•Authenticator App (Google / Microsoft)
•Hardware Security Key

✓•३.३ सर्वोत्तम अभ्यास:
•SMS के स्थान पर Authenticator App
•Backup Codes को Offline सुरक्षित रखें
•नया मोबाइल लेने पर 2FA पुनः जाँचें

✓•४. फ़िशिंग अटैक – सबसे बड़ा खतरा:

✓•४.१ फ़िशिंग क्या है:
फ़िशिंग वह तकनीक है जिसमें उपयोगकर्ता को नकली ई-मेल, वेबसाइट या मैसेज द्वारा धोखे से लॉग-इन जानकारी दिलवाई जाती है।

✓•४.२ सामान्य फ़िशिंग संकेत:
•“Your account will be disabled”
•“Copyright violation”
•“Blue tick verification”
•URL में वर्तनी त्रुटि (faceb00k, fb-secure)

✓•४.३ फ़िशिंग से बचाव:
•URL हमेशा मैन्युअली टाइप करें
•ई-मेल/मैसेज के लिंक पर क्लिक न करें
•ब्राउज़र में HTTPS जाँचें

✓• ५.डिवाइस एवं ब्राउज़र सुरक्षा:

✓•५.१ मोबाइल सुरक्षा:
•Screen Lock + Biometric अनिवार्य
•अनजान APK इंस्टॉल न करें
•नियमित OS अपडेट

✓•५.२ कंप्यूटर सुरक्षा:
•Antivirus एवं Firewall
•Keylogger से बचाव
•Public Computer पर Login न करें

✓• फेसबुक की आंतरिक सुरक्षा सेटिंग्स:

✓•६.१ Login Alerts:
•हर नए डिवाइस लॉग-इन पर सूचना

✓•६.२ Trusted Contacts:
•आपात स्थिति में अकाउंट रिकवरी

✓•६.३ Active Sessions Monitoring:
•Unknown Location से Logout
•नियमित सत्र जाँच

✓•७. सोशल इंजीनियरिंग – मानव-मनोविज्ञान का दुरुपयोग:

✓•७.१ सोशल इंजीनियरिंग क्या है:
जब हैकर तकनीक से नहीं, बल्कि मानव भावनाओं से अकाउंट प्राप्त करता है।

✓•७.२ सामान्य तकनीकें:
•Fake Friend Request
•Romance Scam
•Lottery Scam
•Impersonation

✓•७.३ बचाव:
•अनजान Friend Request स्वीकार न करें
•निजी जानकारी सार्वजनिक न रखें
•प्रोफ़ाइल Privacy “Friends Only”

✓८.• थर्ड-पार्टी ऐप्स एवं API खतरे:

✓•८.१ जोखिम:
•Quiz Apps
•Game Apps
•“See who viewed your profile”

✓•८.२ समाधान:
•अनावश्यक Apps Remove
•App Permissions Review
•केवल Verified Apps उपयोग

✓•९. अकाउंट रिकवरी एवं आपात योजना:

✓•९.१ हैक हो जाने पर तत्काल कदम:
√Password Change
•Active Sessions Logout
•Security Checkup
•Friends को सूचित करें

✓•९.२ दीर्घकालीन रणनीति:
•Recovery Email Update
•Phone Number Verification
•Identity Proof सुरक्षित रखें

✓•१०. भविष्य की साइबर-सुरक्षा दिशा
•AI-Based Behavioral Authentication
•Device Fingerprinting
•Zero Trust Model
•Biometric-Blockchain Integration

✓•निष्कर्ष:
फेसबुक अकाउंट सुरक्षा कोई एक-क्लिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि निरंतर जागरूकता, तकनीकी अनुशासन और व्यवहारिक सतर्कता का समन्वय है।
जो उपयोगकर्ता पासवर्ड, 2FA, फ़िशिंग-सावधानी, डिवाइस सुरक्षा और सोशल इंजीनियरिंग से बचाव को अपनाता है—उसका अकाउंट ९९% तक सुरक्षित रहता है।

 “साइबर-जगत में सुरक्षा कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्य धर्म है।”
#त्रिस्कन्धज्योतिर्विद्

एक समय था जब अग्नि (आग) को घर में हमेशा जीवंत रखा जाता था ।

एक समय था जब अग्नि (आग) को घर में हमेशा जीवंत रखा जाता था मतलब हर समय घर में आग अंगार के रूप में उपस्थित रहती थी। 
   हर घर में मिट्टी की बनी एक बोरसी रहती थी जो अंगीठी से थोड़ी छोटी रहती थी। इसका मुख्य काम अग्नि (आग) को ही जीवित रखना होता था। 
 जब घर में बच्चे का आगमन होता था तब प्रसूतिकक्ष के दरवाजे पर ये बोरसी रखी जाती थी जिसमें रखी आग से पैर सेंक कर ही कोई जच्चा-बच्चा के पास जाता था। 

 हमारे बुजुर्ग कहते थे कि होली से पहले अग्नि माता अपनी ससुराल रहती हैं और होली के दिन मायके आती हैं और जब तक मायके रहती हैं तब तक वो निश्चिन्त होकर उन्मुक्त रहती हैं इसलिए आग के मामले में बहुत सावधानी बरतनी पड़ती थी जरा सी लापरवाही होते ही आग लगने का खतरा हो जाता था। 

  बोरसी में रखी आग को बरकत ( समृद्धि ) की निशानी माना जाता था। 
 मेरी नानी कहती थी कि घर में आग हमेशा जिंदा रखना सुघड़ गृहलक्ष्मी की निशानी है। जो स्त्री रोज रोज दूसरों के घर आग मांगने जाती है वो सुघड़ नहीं फूहड़ होती है। 
  बोरसी में आग को एक उपले के कोने पर रखकर उपले में आग पकड़ा दी जाती थी फिर उसे बोरसी में रखकर उपर से धान का छिलका यानी भूसी रख दिया जाता था। आग बुझने न पाए इसलिए गर्म राख में नया उपला दबा दिया जाता था। 
   अब न आग जलाने के लिए चूल्हे रह गए हैं न ही आग के ये अंगार घर में रखे जाते हैं। इस अग्नि की क़ीमत और अग्नि को माता समझने वाले न वो बुजुर्ग रह गए हैं। 
   अब तो घर घर गैस चूल्हा आ गया है जिसे लाइटर की एक चिंगारी चमक कर जला देती है बल्कि ये कहें कि अब तो नए मॉडल के गैस चूल्हे में लाइटर की भी जरूरत नहीं पड़ती है। 
  समय बहुत बदल गया है बहुत सी सुविधा हो गयी है परन्तु कोई पुरानी चीजें नजर के सामने आ जाती है तो उससे जुड़ी बाते अवश्य याद आ जाती हैं। 

आपको भी यदि पोस्ट पढ़कर तस्वीर देखकर कोई बात याद आयी हो तो कमेंट में अपने अनुभव अवश्य लिखिए पोस्ट अच्छी लगे तो लाइक शेयर अवश्य करें। 
तस्वीर गूगल अंतर्जाल के सौजन्य से धन्यवाद गूगल।
#अरूणिमासिंह

यज्ञ से मानसिक और शारीरिक रोगो की चिकित्सा

।।ओ३ म्।।

(१) मानसिक रोग :: उन्माद रोग -चिकित्सा
1.-गुग्गुल --100ग्राम
2.-हींग -10 ग्राम 
3.पीली सरसों 200 ग्राम 
4.-तुलसी का पौधा -1पंचांगसहित 
5.-अपामार्ग (चिड़चिड़ी -
  -1पौधा )
सामान्य 250 ग्राम हवन -समग्री में उपर्युक्त सामग्रियों को मिला कर सामान्य यज्ञ के पश्चात् आहुतियां दें ।
मंत्र हैं- क-गायत्री मंत्र
          ख-विश्वानि देव o
          ग- त्र्यम्बकं यजामहे o
          घ.-यतो यत:समीहसेo
          ड.--नम:शम्भवाय चo
          च-तच्चक्षुर्देवहितं०
इक्वायन आहुतियां दें। अवश्य लाभ होगा ।

(२) तपेदिक ( टी बी) रोग 
 1..समुद्री गुग्गुल अथवा नहीं मिलने पर शुद्ध गुग्गुल 200ग्राम 
2.जटामांसी 50ग्राम 
3.जायफल 5 नग (पीस) 4.जावित्री 10ग्राम
5. गुड़ 200ग्राम 
6. .गुरुच 50 ग्राम 
7. केशर1डिब्बी
8. कस्तूरी -1डिब्बी 
9. नागरमोथा -100ग्राम 
10. तेज पत्र,-10 ग्राम 
11. .मखाना - 50ग्राम 
12. गुलब फूल सूखा -10ग्राम
13. पलाश फूल सूखा -10
14. शहद -100ग्राम
15. पंचमेवा -20ग्राम
 
(३) मोतीझरा (टाइफाइड) रोग -चिकित्सा 
 1.अरवा चावल -250 ग्राम 
  2.गुड 100। ग्राम 
  3 छुहाडा--50ग्राम 
  4मुनक्का --50ग्राम
  5-किशमिश 50 ग्राम 
 उपर्युक्त मंत्रों से 51 आहुतियां दें।
यज्ञाग्नि में गोघृत /शुद्ध देशी घृत का प्रयोग करें।
अग्नि बुझने पर कपूर से प्रज्वलित करें।

पंडित प्रोफसर डॉ व्यास नंदन जी शास्त्री 
आर्यों का महाकुंभ ग्रुप से 

वयं राष्ट्रे जागृयाम 

Thursday, 29 January 2026

बासी रोटी भात के गणित को समझने की कोशिश करें सही विधि से सेवन करने पर यह कितना वैज्ञानिक और स्वास्थ्य वर्धक हैं।

पूर्वजों के ज्ञान पर शंका और चोचलेबाजी का डंका... यकीन न हो तो बासी के गणित को समझने की कोशिश करें, क्योंकि बासी का गणित बड़ा तगड़ा है...
              लेकिन ध्यान रहे कि सही विधि तथा सूक्ष्म जीवो की उपस्थिति से तैयार व्यंजन सामग्री बहुमूल्य हो जाती है और गलत विधि तथा सूक्ष्म जीव इसे विष बना देते हैं। विज्ञान की भाषा में कहूँ तो इथेनॉल कई दवाओं में संरक्षक रसायन है, कुछ मामलों में औषधि भी है किंतु किण्वन से ही बना मेथेनॉल विष है। इसीलिए इस मामले में अनुभव से प्राप्त विशेष विधि और सूक्ष्म जीवो का खास महत्व है। विस्तृत विवरण से पूर्व आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं...

आप सभी ने कभी न कभी भुना हुआ भात और रोटी पोहा जरूर खाया होगा। कुछ ने पारंपरिक रूप से सही विधि द्वारा घर पर माताओं के हाथ निर्मित भोजन के रूप में तो कुछ ने धोखे का शिकार होकर। अगर आपको ऐसा लगता है कि मैं गलत कह रहा हूँ तो आइए समझते हैं - 
              दरसल आप अक्सर इसे खाते रहते हैं। आप जब भी कभी घर से बाहर रेस्टोरेंट वगेरह में भोजन करते हैं तो कोई आपके लिए बिल्कुल ताजा भोजन परोस दे खासकर चावल, तो इसकी संभावना बहुत कम है इस जानकारी के बावजूद भी घर पर माँ की ममता, प्यार और अनुभव से तैयार बासा किंतु प्रोसेस्ड फूड न खाने वाली हमारी मॉडर्न पीढ़ी होटलों और रेस्टोरेंट्स में बड़े चाव से वह सब कुछ डकार जाती है जिसमें न तो शुद्धता की गारंटी होती है और न ही स्वास्थ्य का ध्यान रखा जाता है। और वे ऐसा करें भी क्यों न? आखिर काफी पैसे जो चुकाये जाते हैं इसके लिये और दूसरा कारण यह भी है कि वहाँ आजकल ढेर सारे घोषित और अघोषित सेल्फी पॉइंट होते हैं। 

भोजन करना जैसे आवश्यकता नही बल्कि स्टेटस सिम्बोल बन गया है। और यही व्यंजन जब घर पर माँ बनाये तो बासी भोजन के नाम पर न जाने क्या क्या अटरम- शटरम साइंस बताने और गिनाने लग जाते हैं। शायद इन बच्चों को लगता है कि हमारे पूर्वजों ने या बड़े बुजुर्गों ने साइंस नही पढ़ी है। अरे पढ़ी है भई! खूब अच्छी तरह पढ़ी है। यूँ ही नही दुनिया भर के सभी किताबी आविष्कार हमारे देश से संबंध रखते हैं। और यही ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी चलता हुआ आज भी सुरक्षित है। बहुत कुछ छिपा दिया गया, बहुत कुछ मिटा दिया गया। लेकिन भोजन परम्परा का यह मौखिक ज्ञान हमारी, दादी-नानी व माताओं के माध्यम से आज भी सुरक्षित है। तो चलिए आपको बासी भोजन के फायदे बताता हूँ।
                   बासी नामक एक खास पारंपरिक व्यंजन छत्तीसगढ़ में प्रचलित है। लेकिन जनसामान्य के बीच बासी भोजन का शाब्दिक अर्थ भोजन बनने के बाद 6 से लेकर 24 घंटे समयावधि बाद खाया जाने वाला व्यंजन है। जिसकी गुणवत्ता कई मायनों में किण्वन/ fermentation और curing द्वारा पहले की तुलना में अधिक बढ़ जाती है। हमारे देश के अलग अलग हिस्सों में बासी रोटी या #बासी चावल/ भात को खाना प्रचलन में है, माफ़ कीजियेगा प्रचलन में था, छत्तीसगढ़ में खाया जाने वाला #बासी इसका सर्वोत्तम उदाहरण है, जिसमे पके हुए भात/ चावल को रात भर पानी मे डालकर फरमेंट किया जाता है और फिर सुबह खाया जाता है।

यह कोई गरीबी के कारण किया हुआ कार्य नही है, न ही किसी प्रकार की मूर्खता भरा कृत्य बल्कि यह पूरी तरह विज्ञान और तथ्यों पर आधारित है, कि फेरमेंटेशन से न सिर्फ स्वाद में इजाफा होता है बल्कि इसके कारण खाद्य सामग्री / भोजन पचने में आसान बन जाता है। इसमें विटामिन ए सहित कार्बनिक अम्लों का बहु निर्माण हो जाता है, जो शरीर की कई मेटाबोलिक क्रियाओं में आवश्यक होते हैं। यकीन नही हो रहा है, हैना...? चलिये इस तरह से सोचिए कि आप जो अचार, खट्टे पापड़, इडली, दोसा, जलेबी, ब्रेड, केक आदि बनाते हैं, तो क्या करते हैं आटे/ मिश्रण के साथ, और क्यो...? दिमाग हिल गया न? इसीलिये कहता हूँ, पूर्वजो के ज्ञान का सम्मान करें। 
                          ऐसे ही दो खास व्यंजन हैं ) fried chapatis (भुंजी रोटियाँ या रोटी पोहा) और fried rice (भूँजा चावल) जिनकी फ़ोटो पोस्ट में शामिल हैं। अगर आपने इन्हें पहले कभी नही खाया तो चलिए मैं आपको सिखाता हूँ। घर पर ट्राय जरूर कीजियेगा...

1) रोटी पोहा/ fried chapatis 
               ये #रोटिपोहा या fried chapatis / भूंजी हुयी बासी रोटियां कितनी महत्वपूर्ण और #पौष्टिक है ये आपको अंदाजा भी नहीं होगा। प्रचलन के हिसाब से देखें तो यह अब घरों की रसोई से काफी दूर हो गए हैं लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि यह वर्तमान में खाये जाने वाले नाश्तों में सबसे अधिक पौष्टिक और पचने में आसान है। बासी रोटियां लाभदायक बॅक्टीरिया द्वारा आंशिक #फर्मेंटेशन हो जाने के कारन यह ताज़ी रोटी से भी अधिक लाभदायक हो जाती है, और इसमे #विटामिन ए का भी समावेश हो जाता है। जिम जाने वाले लोगो, कठोर परिश्रम करने वालो और #मधुमेह के रोगियो को भी बासी #रोटी खाने की सलाह दी जाती है। अब तो कई तरह की रिसर्च करने के बाद अब बहुत से वैज्ञानिक और शोधकर्ता भी बासी रोटी के फायदों के कायल हो चुके है। गाँव देहात में बासी रोटी का कलेवा तो जैसे उनकी जीवनचर्या का हिस्सा ही बन गया था। 
           इसे बनाने के लिए बासी रोटियों के बारीक टुकड़े कर लें फिर इन्हें हाथों से रगड़ते हुये बारीक पीसते हुये महीन टुकड़े कर लें। उंसके बाद बिल्कुल पोहा बनाने की विधि से इसे फ्राई कर दें।

2) बासे भात का पुनर्जन्म: 😍 भुंजा हुआ भात/ चावल
इसे बनाने के लिए रात्रि का बचा हुआ चावल ले लें। कटी हुई मिर्च, प्याज, हरा धनिया, कड़ी पत्ता और सामान्य मशाले नमक आदि के साथ इसे कढ़ाई ओर बघार लगायें और चांद मिनटों में लाजबाब नाश्ता तैयार है। इसे आज भी ज्यादातर घरों में बनाया जाता है। चावल की तुलना में कननिका स्वाद अधिक प्रियकर होता है। 
                   बासी चावल या भुना हुआ भात यह एक ऐसा पौष्टिक नास्ता है जिसे हमारी पीढ़ी के लोगों में।से अधिकांश ने बचपन में अवश्य खाया होगा। किंतु जिनका मानना है कि उन्होंने इसे कभी नहीं खाया तो जरा जरा ध्यान से सुन लें, वे भी आजकल जीरा राइस, मसाला राइस आदि नामों से बड़े बड़े होटल्स में बेवकूफ बनकर खा रहे हैं। 😜

आज आधुनिकता की दौड़ में यह प्रचलित व्यंजन न जाने कहाँ खो गया है। लेकिन मैं अब भी इसे खाता रहता हूँ। जब कभी घर पर रात्रि भोज का चावल बच जाता है, तो हमारे घर में इसे सुबह सुबह इसी तरह नया रूप देकर नास्ते के रूप में परोस दिया जाता है। हालाकि यह कभी किसी मेहमान को नही परोसा जाता क्योंकि मेहमान को बासा खिलाना हमारे संस्कार में नही है। परंतु मुझे इसे ग्रहण करने में कोई परहेज नही होता, क्योंकि एक तो मैं इसके फायदे जनता हूँ और दूसरा यह कि मैं अनाज को फेकने या जूठा छोड़ने के सख्त खिलाफ हूँ। आज भी थाली चाट चाट कर खाने पर अड़ा हुआ हूँ। कुछ आधुनिक मित्र गलती से मुझे भुक्कड़ समझ लेते हैं। 😜 हालाकि थोड़ा बहुत तो हूँ भी। 😁
               लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि यह वर्तमान में खाये जाने वाले नाश्तों से यह कही अधिक स्वादिष्ट, पौष्टिक और पचने में आसान है। इसमें लाभदायक बॅक्टीरिया द्वारा आंशिक फर्मेंटेशन हो जाने के कारन यह ताजे चावल से भी अधिक लाभदायक हो जाते है। हालाकि मधुमेह के रोगी इसे खाने से बचते हैं, लेकिन हल्के फुल्के नास्ते के रूप में यह सभी के लिये अच्छा विकल्प है। अब तो कई तरह की रिसर्च करने के बाद अब बहुत से वैज्ञानिक और शोधकर्ता भी बासी के फायदों के कायल हो चुके है। 😊

 हमारे देश के अलग अलग हिस्सों में बासी रोटी या बासी चावल/ भात को खाना प्रचलन में है, माफ़ कीजियेगा प्रचलन में था। मेरा बासा भुंजा भात, छत्तीसगढ़ की बासी से अलग है, किन्तु फायदेमंद तो है ही। किण्वन विधि से तैयार कई तरह के स्नेक्स, पापड़ जैसे चिकौड़ी, दक्षिण भारतीय व्यंजन जैसे इडली, डोसा, खमण, ढोकला आदि से तो सभी परिचित हैं ही। बगीचे में टहलते हुये या बैठकर भुंजा भात या रोटी पोहा खाने का मजा ही निराला है। अगर आपने भी बासा भुंजा हुआ चावल/ भात या रोटी पोहा खाया हो तो बतायें। साथ ही आपके क्षेत्र में बासी व्यंजन के कौन कौन से रूप प्रचलित हैं, उनके बारे में बतायें... 😊🙏

धन्यवाद 
डॉ विकास शर्मा
वनस्पति शास्त्र विभाग
शासकीय महाविद्यालय चौरई
जिला छिंदवाडा (म.प्र.)
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_वयं राष्ट्रे जागृयाम_

सिंहपर्णी ( डैंडेलियन ) सूजन व शरीर में जलभराव अद्वितीय लाभकारी

👇🏾डैंडेलियन ▪️:- सिंहपर्णी सूजन व शरीर में जलभराव अद्वितीय लाभ 
सिंहपर्णी को डैंडेलियन भी कहते हैं. यह एक जंगली पौधा है. सिंहपर्णी के पत्तों के दाँत आमतौर पर पीछे की ओर होते हैं. सिंहपर्णी के नाम की उत्पत्ति फ़्रेंच शब्द 'डेंट डी लायन' से हुई है जिसका मतलब है 'शेर का दाँत'. 
सिंहपर्णी के पत्ते गहरे हरे रंग के और लंबे होते हैं. 
इनके पत्तों के किनारे दाँतेदार होते हैं व टूटने पर इनके पत्तों से दूधिया रस निकलता है. 
सिंहपर्णी के फूल चमकीले पीले रंग के होते हैं. 
 इसके फूलों का सिर एकल डंठल पर होता है तथा इसके के फूलों का सिर 15 इंच तक लंबे चिकने डंठल पर बनता है तथा फूलों का सिर अनेक छोटे पुष्पों से बना होता है. पकने पर फूल सफेद रंग के रेशमी बीजों में बदल जाते हैं जो हवा चलने से दूर दूर उड़ जाते हैं 

यह एक प्राकृतिक मूत्र वर्धक है, सिंहपर्णी की जड़ें शरीर में उपस्थित अधिक तरल पदार्थ के उपापचय में सहायता कर, शरीर में हो रही सूजन व जलन को समाप्त करती है। विशेष रूप से यह शरीर के निचले भाग जैसे की पैर में सूजन कम करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली है। इसमें अच्छी मात्रा में पोटैशियम निहित है जो शरीर में सोडियम के स्तर को संतुलित कर सूजन एवं जलन से छुटकारा दिलाने में सहायक है।
सूजन व जलन से राहत पाने के लिए रोजाना जब तक सूजन ठीक ना हो जाए, दिन में दो से तीन बार सिंहपर्णी की चाय पिएं। मात्रा सूखा चूर्ण एक चम्मच एक कप पानी में उबालकर ताजा जड़ दो तीन इंच के करीब 

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सिंहपर्णी बहुत ही सक्षम मूत्रवर्धक होते हैं जो किडनी एवं मूत्र पथ में उपस्थित एवं एकत्रित विषाक्त प्रदार्थों का नाश कर, मूत्र सम्बंधित विकारों से बचाव करते हैं !सिंहपर्णी की जड़ें मूत्र की मात्रा के उत्पादन को नियमित कर किडनी को स्वच्छ एवं स्वस्थ रखने में मदद करती हैं। यह मूत्र पथ में विकसित हो रहे हानिकारक जीवाणुओं का नाश कर मूत्र-सम्बंधित विकारों को शरीर में आने से रोकती हैं। यह मूत्राशय सम्बंधित विकारों का भी एक सफल उपचार हैं। पेशाब की नली या मूत्राशय में फंसीं पथरी निकालने में बहुत सहायक है 
सिंहपर्णी अग्न्याशय की कोशिकाओं को सक्रिय करता है और शरीर में इंसुलिन के उत्पादन को बढाने में मदद करता है। यह ब्लड शुगर की आवश्यक मात्रा को बनाए रखने में भी मदद करता है। दरअसल सिंहपर्णी में मूत्र वर्धक गुण होते हैं, जिसकी वजह से शरीर में मौजूद अतिरिक्त शुगर को बाहर निकालने में सक्षम बनाता है। अगर अग्न्याशय इंसुलिन को प्रभावी ढंग से संसाधित नहीं कर पाता है, तो शरीर में ग्लूकोज का ठीक से उपयोग नहीं हो पाता है और रक्तप्रवाह में जमा हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप मधुमेह होता है। चाय, जूस आदि के रूप में सिंह पर्णी के निरंतर उपयोग से इस बीमारी का इलाज किया जा सकता है।
इसके सेवन से त्वचा में आकर्षक रंग लाया जा सकता है। बता दें कि यदि इसकी टहनी को बीच में से तोड़ा जाए तो इसके अंदर दूधिया सफेद जैसा रस निकलता है जो त्वचा के लिए बहुमूल्य है तथा इसके पीले फूलों का रस भी सौंदर्य प्रसाधनों में बहुतायत में प्रयोग होता है। इस रस का उपयोग अगर त्वचा पर किया जाए तो त्वचा में खुजली और जलन की समस्या दूर हो जाएगी। लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि इसका रस आंखों के स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है।

सिंहपर्णी में विटामिन-सी और ल्यूटोलिन भी प्रचुर मात्रा में मौजूद होता है। विटामिन-सी और ल्यूटोलिन में कैंसर पैदा करने वाले मुक्त कणों को ख़त्म करने के गुण होते है। यही वजह है कि सिंहपर्णी शरीर को डिटॉक्सीफाई तो करता ही है, साथ ही ट्यूमर के विकास और कैंसर कोशिकाओं की प्रगति को भी रोकता है। चूंकि ल्यूटोलिन कैंसर कोशिकाओं को ख़त्म करने में सहायक है इस वजह से सिंहपर्णी के सेवन से कैंसर कोशिकाओं के प्रजनन गुण ख़त्म हो जाते हैं। यह प्रोस्टेट कैंसर के खिलाफ सबसे सफल औषधियों में सिंहपर्णी की गिनती की जाती है।
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