सिंहपर्णी को डैंडेलियन भी कहते हैं. यह एक जंगली पौधा है. सिंहपर्णी के पत्तों के दाँत आमतौर पर पीछे की ओर होते हैं. सिंहपर्णी के नाम की उत्पत्ति फ़्रेंच शब्द 'डेंट डी लायन' से हुई है जिसका मतलब है 'शेर का दाँत'.
सिंहपर्णी के पत्ते गहरे हरे रंग के और लंबे होते हैं.
इनके पत्तों के किनारे दाँतेदार होते हैं व टूटने पर इनके पत्तों से दूधिया रस निकलता है.
सिंहपर्णी के फूल चमकीले पीले रंग के होते हैं.
इसके फूलों का सिर एकल डंठल पर होता है तथा इसके के फूलों का सिर 15 इंच तक लंबे चिकने डंठल पर बनता है तथा फूलों का सिर अनेक छोटे पुष्पों से बना होता है. पकने पर फूल सफेद रंग के रेशमी बीजों में बदल जाते हैं जो हवा चलने से दूर दूर उड़ जाते हैं
यह एक प्राकृतिक मूत्र वर्धक है, सिंहपर्णी की जड़ें शरीर में उपस्थित अधिक तरल पदार्थ के उपापचय में सहायता कर, शरीर में हो रही सूजन व जलन को समाप्त करती है। विशेष रूप से यह शरीर के निचले भाग जैसे की पैर में सूजन कम करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली है। इसमें अच्छी मात्रा में पोटैशियम निहित है जो शरीर में सोडियम के स्तर को संतुलित कर सूजन एवं जलन से छुटकारा दिलाने में सहायक है।
सूजन व जलन से राहत पाने के लिए रोजाना जब तक सूजन ठीक ना हो जाए, दिन में दो से तीन बार सिंहपर्णी की चाय पिएं। मात्रा सूखा चूर्ण एक चम्मच एक कप पानी में उबालकर ताजा जड़ दो तीन इंच के करीब
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सिंहपर्णी बहुत ही सक्षम मूत्रवर्धक होते हैं जो किडनी एवं मूत्र पथ में उपस्थित एवं एकत्रित विषाक्त प्रदार्थों का नाश कर, मूत्र सम्बंधित विकारों से बचाव करते हैं !सिंहपर्णी की जड़ें मूत्र की मात्रा के उत्पादन को नियमित कर किडनी को स्वच्छ एवं स्वस्थ रखने में मदद करती हैं। यह मूत्र पथ में विकसित हो रहे हानिकारक जीवाणुओं का नाश कर मूत्र-सम्बंधित विकारों को शरीर में आने से रोकती हैं। यह मूत्राशय सम्बंधित विकारों का भी एक सफल उपचार हैं। पेशाब की नली या मूत्राशय में फंसीं पथरी निकालने में बहुत सहायक है
सिंहपर्णी अग्न्याशय की कोशिकाओं को सक्रिय करता है और शरीर में इंसुलिन के उत्पादन को बढाने में मदद करता है। यह ब्लड शुगर की आवश्यक मात्रा को बनाए रखने में भी मदद करता है। दरअसल सिंहपर्णी में मूत्र वर्धक गुण होते हैं, जिसकी वजह से शरीर में मौजूद अतिरिक्त शुगर को बाहर निकालने में सक्षम बनाता है। अगर अग्न्याशय इंसुलिन को प्रभावी ढंग से संसाधित नहीं कर पाता है, तो शरीर में ग्लूकोज का ठीक से उपयोग नहीं हो पाता है और रक्तप्रवाह में जमा हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप मधुमेह होता है। चाय, जूस आदि के रूप में सिंह पर्णी के निरंतर उपयोग से इस बीमारी का इलाज किया जा सकता है।
इसके सेवन से त्वचा में आकर्षक रंग लाया जा सकता है। बता दें कि यदि इसकी टहनी को बीच में से तोड़ा जाए तो इसके अंदर दूधिया सफेद जैसा रस निकलता है जो त्वचा के लिए बहुमूल्य है तथा इसके पीले फूलों का रस भी सौंदर्य प्रसाधनों में बहुतायत में प्रयोग होता है। इस रस का उपयोग अगर त्वचा पर किया जाए तो त्वचा में खुजली और जलन की समस्या दूर हो जाएगी। लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि इसका रस आंखों के स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है।
सिंहपर्णी में विटामिन-सी और ल्यूटोलिन भी प्रचुर मात्रा में मौजूद होता है। विटामिन-सी और ल्यूटोलिन में कैंसर पैदा करने वाले मुक्त कणों को ख़त्म करने के गुण होते है। यही वजह है कि सिंहपर्णी शरीर को डिटॉक्सीफाई तो करता ही है, साथ ही ट्यूमर के विकास और कैंसर कोशिकाओं की प्रगति को भी रोकता है। चूंकि ल्यूटोलिन कैंसर कोशिकाओं को ख़त्म करने में सहायक है इस वजह से सिंहपर्णी के सेवन से कैंसर कोशिकाओं के प्रजनन गुण ख़त्म हो जाते हैं। यह प्रोस्टेट कैंसर के खिलाफ सबसे सफल औषधियों में सिंहपर्णी की गिनती की जाती है।
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