स्वामी करपात्रीजी मेरे पिताजी से परिचित थे, श्रीविद्या को लेकर उनसे बातें करते थे, पिताजी की पुस्तक की भूमिका भी स्वामीजी ने लिखी थी, इस नाते उनका वात्सल्य मुझे भी प्राप्त होता था, ऐसे ही एक अवसर पर उनसे भेंटवार्ता की, जो अमरउजाला में प्रकाशित हुई थी।
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वयं राष्ट्रे जागृयाम
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