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Sunday, 9 November 2025

देहात के लोग

दरवाजे की घंटी बजी तो नेहा ने जल्दी से हाथ पोंछे और दरवाजा खोला। बाहर उसके माता-पिता खड़े थे — धूल से सने जूते, माथे पर पसीने की लकीरें, और आंखों में अपनी बेटी को देखने की चमक।

“अरे माँ, बाबूजी! आप लोग आ गए!” नेहा ने खुश होकर कहा।
उसकी माँ मुस्कुराई, “बस बिटिया, तेरी याद सताई तो सोचा चलो, दो दिन तेरे पास रह आते हैं।”

अंदर जाते ही नेहा के पति रवि ने अखबार नीचे रखा। उसने हल्की सी नजर उठाई और बिना मुस्कुराए बोला,
“आ गए आपके मम्मी-पापा? ठीक है, दोपहर में कुछ अच्छा बना लेना। ये लो—”
उसने जेब से 500 रुपये निकालकर नेहा की ओर बढ़ा दिए —
“इन पैसों से कुछ ले आना, ताकि देहात वालों को अच्छा लगे। वैसे, उनके यहाँ तो इतने में हफ्ता निकल जाता होगा।”

नेहा के चेहरे की मुस्कान हल्की पड़ गई। उसने पैसे ले लिए, मगर दिल में कुछ खटक गया। क्या अपने माँ-बाप के लिए भी खर्च गिनना पड़ता है?

वो बाजार गई, कुछ सब्ज़ियाँ लीं, दाल, पनीर, और थोड़ा फल भी — बस इतना ही। घर आकर उसने रसोई में काम शुरू किया। उसकी माँ उसकी मदद करने लगीं, जबकि पिता जी धीरे-धीरे घर के कोने-कोने को देख रहे थे — शहर की चकाचौंध में कहीं उनकी पुरानी परवरिश खो न जाए।

दोपहर का खाना तैयार हुआ। सब लोग बैठ गए — दाल, चावल, मटर-पनीर, और घर का बना रायता। रवि ने जाते-जाते बस इतना कहा,
“ठीक है, बढ़िया दिख रहा है खाना। मैं निकलता हूँ ऑफिस।”

सब सामान्य लग रहा था — जब तक कि नेहा के पिता ने अपना पुराना कपड़े का थैला नहीं खोला।
वो वही थैला था जो वो हर बार गाँव से लाते थे — जिसमें थोड़ा गुड़, घर का बना अचार, और सूखे लड्डू होते थे।

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “बिटिया, इस बार तेरी माँ ने खुद आम का अचार बनाया है, सोचा तेरे लिए लाऊँ।”
नेहा ने मुस्कुरा कर कहा, “अरे बाबूजी, वो तो बचपन से मेरा सबसे पसंदीदा है।”

लेकिन जैसे ही उन्होंने थैले का मुंह खोला, उनका चेहरा एकदम बदल गया। मुस्कान गायब हो गई, और होंठ कांपने लगे।
“बाबूजी? क्या हुआ?” नेहा ने घबराकर पूछा।

थैले में न गुड़ था, न अचार —
बल्कि एक पुराना लिफाफा रखा था। उस पर मिट्टी जमी थी, और ऊपर मोटे अक्षरों में लिखा था —
“नेहा के ससुराल वालों के लिए — दामाद के हाथ न लगे।”

नेहा और उसकी माँ दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा। पिता जी ने काँपते हाथों से लिफाफा खोला।
अंदर कुछ पुरानी तस्वीरें, कुछ नोट्स, और एक मुड़ी-तुड़ी चिट्ठी थी।

चिट्ठी में लिखा था —

“बिटिया, जब तू शहर चली गई थी, तेरे पापा ने तेरी शादी में अपनी आधी जमीन बेच दी।
हमें लगा, तू सुखी रहेगी तो सब ठीक है।
पर अब गाँव में लोग कहते हैं कि तेरे ससुराल वाले तुझे ताना देते हैं कि तेरे माई-बाप गरीब हैं।
अगर कभी मन टूटे, तो ये चिट्ठी पढ़ लेना।
याद रखना — माँ-बाप कभी गरीब नहीं होते, वो बस अपने बच्चों के लिए अमीर बनना भूल जाते हैं।”

नेहा की आँखों से आँसू गिरने लगे। उसके हाथों में वो 500 रुपये अब जैसे बोझ बन गए थे।
उसे याद आया, कैसे कुछ देर पहले रवि ने कहा था, “देहात वालों को इससे अच्छा खाना लग जाएगा।”

उसने धीरे से वो नोट थैले में रख दिया।
“बाबूजी,” उसने कहा, “आज का खाना शहर के पैसों से नहीं, गाँव के अचार से बनेगा।”

माँ ने चुपचाप आँसू पोंछे, और मुस्कुराने की कोशिश की।
खाना चुपचाप खत्म हुआ। उस शाम रवि देर से घर आया।

नेहा ने दरवाजा खोला। वह शांत थी, पर उसकी आँखों में एक नई दृढ़ता थी।
“खाना रखा है,” उसने बस इतना कहा।

रवि ने प्लेट में खाना लिया, और जैसे ही पहला कौर खाया, उसने कहा,
“आज अचार बहुत स्वादिष्ट है, कहाँ से आया?”

नेहा ने बिना उसकी ओर देखे कहा,
“देहात से। वही लोग, जिनके लिए तुमने 500 रुपये दिए थे।”

रवि थोड़ा झेंपा। उसने कुछ कहने की कोशिश की, “मैं तो बस मजाक कर रहा था, इतना बुरा मानने की क्या जरूरत थी?”
नेहा ने उसकी ओर देखा,
“मजाक तब तक अच्छा लगता है, जब तक वो किसी की इज्नजत तोड़े।”

रात को नेहा ने वो लिफाफा मेज‌ पर रख दिया।
अंदर वही 500 रुपये और चिट्ठी थी। नीचे उसने एक पंक्ति लिखी —

“कभी समझ सको तो समझ लेना — देहात वाले दिल से अमीर होते हैं, पैसों से नहीं।”

अगली सुबह रवि ऑफिस जाने लगा तो उसने वो लिफाफा देखा। पहले तो उसने अनदेखा किया, लेकिन फिर खोला।
चिट्ठी पढ़ते ही उसे कुछ समझ नहीं आया, पर कुछ देर बाद उसकी आँखें भी नम हो गईं।
वो सोचने लगा — क्या सच में मैंने नेहा के माँ-बाप को छोटा समझा?

शाम को वो जल्दी घर लौटा।
नेहा रसोई में थी। रवि ने धीरे से पीछे जाकर कहा,
“नेहा, कल रात की बात के लिए सॉरी।”

नेहा ने कुछ नहीं कहा।
वो चुप रही। पर उसके होंठों पर हल्की मुस्कान थी — जैसे भीतर कहीं उसे उम्मीद थी कि शायद कुछ बदलेगा।

रवि ने फिर कहा,
“मैं कल गाँव चलना चाहता हूँ… तुम्हारे माँ-बाप से मिलने। उन्हें ठीक से धन्यवाद नहीं कहा मैंने।”

नेहा ने पहली बार उसकी ओर देखा।
“सच?”

“हाँ,” रवि ने सिर हिलाया, “और इस बार मैं कुछ नहीं दूँगा — सिर्फ खाना खाऊँगा उनके हाथ का, और देखूँगा कि असली सादगी कैसी लगती है।”

नेहा की आँखों से आँसू फिर छलक पड़े — पर इस बार दर्द के नहीं, राहत के।
वो मुस्कुराई, “बाबूजी खुश होंगे ये सुनकर।”

दो दिन बाद, जब वो दोनों गाँव पहुँचे, तो नेहा के पिता खेत के किनारे बैठे थे। रवि ने जाकर उनके पैर छुए।
“माफ कीजिएगा, अंकल… मैं शायद पहले समझ नहीं पाया।”

वो मुस्कुराए, “कोई बात नहीं बेटा, शहर वालों को समझने में थोड़ा वक्त लगता है।”

रवि ने चारों ओर देखा — मिट्टी की खुशबू, पेड़ों के बीच से आती हवा, और सादगी का वो सुकून जो शहर के लाखों में भी नहीं था।
वो बोला, “बाबूजी, अगली बार आप आएँगे तो कोई 500 रुपये नहीं दूँगा… बस आप अपना अचार जरूर लाना।”

सब हँस पड़े।
शाम ढल रही थी, आसमान में हल्की लालिमा थी, और हवा में गुड़ और मिट्टी की गंध।

नेहा ने मन ही मन सोचा —
कभी-कभी एक छोटा-सा थैला भी जिंदगी का सबसे बड़ा सबक दे जाता है।

अंत पंक्ति:

“देहात के लोग भले सादे हों, पर उनकी नीयत में वो अमीरी होती है, जो शहरों के पैसों से कभी नहीं खरीदी जा सकती।🌹

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