इसका जला हुआ
वैद्य भी नहीं बचा पाता-
किसी भी वर्णके पुरुषको कभी भी पराई स्त्रियोंसे संसर्ग नहीं करना चाहिये। परस्त्री-सेवनसे मनुष्य के पुण्य कर्म भी जल्दी ही समाप्त हो जाते हैं। संसारमें परस्त्री- समागमके समान पुरुषकी आयुको नष्ट करने वाला दूसरा कोई कार्य नहीं है। स्त्रियोंके शरीरमें जितने रोमकूप होते हैं, उतने ही हजार वर्षोंतक व्यभिचारी पुरुषोंको नरकमें रहना पड़ता है। और भी अनेक प्रकार के दण्ड हैं । तथा जो स्त्री या पुरुष दो या तीन स्त्रियों के साथ रमण कर चुके या चार पाँच से उनका फल भी ब्रह्म वैवर्त पुराण में तथा श्रीमद्देवीभागवत महापुराण में है। अतः हे कामकर्मियों! अपनी ही पत्नि से संतुष्ट रहो , और दृढ़तापूर्वक परस्त्री गमन की इच्छा है ही और अपने आप पर नियंत्रण नहीं कर सकते ( किसी की बहिन बेटी को दूषित करने का जुनून ही सवार है ) तो नरक , पीड़ा , दुख , पुनर्जन्म में दरिद्र कोख से जन्म... आदि सहने के लिए तैयार रहो।
ईश्वर ने आपको मनुष्य-योनी दी है तो इस योनी कि एक महत्वपूर्ण शर्त यही है कि परयोनी से यौनाचार न किया जाए अन्यथा इस परयोनीभोग के कारण कभी भी नर योनी नहीं पा पाओगे। कुछ बाते लिखने की नहीं होती पर इन दुष्टों को देखकर एक किसी सज्जन की पूर्व पोस्ट के ये 28 शब्द , 64 अक्षर लिखने पड़ रहे हैं। -
" जैसे कुत्ता खुले में परायी कुतिया के साथ सहवास करता है बस वैसे ही आप भी इज्जत-नष्ट करते हुए कूकर-सूकर बनकर गली मौहल्ले में घूमते रहोगे"
यह एक चेतावनी भरा कटु सच है जो अति मजबूरी में काॅपी करना पड़ा।
आज चारों वर्णों के लोग इस परनारी-गमन रूपी वासना
की आग में जल रहे हैं।
हाँ सच है क्षत्रिय, ब्राह्मण , वैश्य और दास वर्ग भी।
आजकल हर वर्ण और हर जाति में महान से महान देव पुरुष और नीच से भी नीच पापी ( पर-योनीभोगी परस्त्रीगमन वाले स्त्रीलम्पट) घूम रहे हैं।
जो दूध के धुले हैं वे तो इस पोस्ट को सराहेंगे पर जो पत्नि के अलावा भी चोरी चोरी छिप- छिपकर होटलो में रंगरलियाँ मना रहे हैं वे मात्र यही कहेंगे कि -
जिनको मिल रही है वे तो खुशनसीब हैं जिनको मिल ही नहीं रही वे किस प्रकार किसी परायी को भोगें-
...... " हे हरि बस यही देखना और सुनना शेष रह गया था आज 2025 में ----- घोर आश्चर्य है।
उत्तम शिक्षा देना भी आजकल पाप है। खेर जो शास्त्र-अर्थ या शास्त्रों के दण्ड विधान को न मानें वह मरकर तो मानेगा ही।
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गीत — “नारी परायी से दूर रहो रे”
(1)
नारी परायी से दूर रहो रे,
ये पथ अँधियारा गहरा है।
तेज हरै, आयु हरै,
ये पाप भयंकर पहरा है।।
(2)
घर की नारी ही लक्ष्मी है रे,
दूसरी अग्नि समान।
जो इसमें हाथ जलाएगा,
फूटेगा उसका ही भाग्य-विधान।।
(3)
पुराणों ने लाख समझाया,
नरक में गिरना तय है रे।
जिस स्त्री के जितने रोमकूप,
उतने वर्ष दुःख सहना है रे।।
(4)
दो-तीन संग करने वाला,
कितने जन्म भटकेगा।
चार-पाँच का पाप जो ढोवे,
जन्म-जन्म दरिद्र रहेगा।।
(5)
वासना का पागल आगन,
सबकुछ पलक में खा लेता।
ज्योत जला दे कुल-मर्यादा की,
घर-घर कलंक लगा देता।।
(6)
आज सभी वर्णों में फैली,
ये रोग बड़ी ही भारी है।
ब्राह्मण, क्षत्र, वैश्य, दास—
सबको इसकी लत सरदारी है।।
(7)
जो पत्नी छोड़ परायी भागे,
वो नरक का अधिकारी है।
कर्म वही कुत्ते का बनकर,
गलियों में फिरता भारी है।।
(8)
सत्य कटु है, भारी है,
पर सत्य ही जीवन-रक्षक है।
जो सुनकर भी न सुधरे,
वो काल का निश्चित पकड़क है।।
(9)
हे मन! संयम का दीप जला,
पत्नी ही परम तारिणी।
पर-नारी में मोह न धर,
वह महा विनाश कारिणी।।
(10)
जो धर्म रचेगा जीवन में,
उसको ईश्वर थामेगा।
पर-नारी से बचेगा जो,
वह कुल-वंश को नामेगा।।
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पर-नारी गमन : शास्त्रीय चेतावनी, सामाजिक सत्य और कठोर परिणाम**
(आपके द्वारा दिए गए भाव, संदर्भ और पुराणोक्त दण्ड-विधान को सुरक्षित रखते हुए अत्यंत सशक्त, साहित्यिक और शास्त्रीय शैली में विस्तृत अध्याय रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है—बिना किसी कटु भाषा के, परंतु आपकी भावना का प्रभाव अक्षुण्ण रखते हुए।)
१. पर-नारी गमन : चारों वर्णों के लिए समान रूप से निषिद्ध
शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि किसी भी वर्ण का पुरुष — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र — किसी भी स्त्री से, जो उसकी पत्नी नहीं है, संसर्ग नहीं करे।
यह नियम किसी एक जाति या समुदाय के लिए नहीं,
बल्कि सारे मानव समाज के लिए समान रूप से लागू है।
पर-नारी-गमन केवल एक पाप नहीं,
बल्कि वह पाप है जो मनुष्य की आयु, बुद्धि, तेज, कुल-मान और भविष्य — सबको एक साथ नष्ट कर देता है।
२. पर-स्त्री-सेवन : आयु-क्षय का महान कारण
पुराणों में अत्यंत कठोर शब्दों में कहा गया है —
परस्त्री-समागम से मनुष्य की आयु शीघ्र नष्ट होती है।
संसार में ऐसा दूसरा कोई कर्म नहीं जो मनुष्य की आयु को इतनी तीव्रता से छीन ले।
पर-नारी गमन मनुष्य को भीतर से खोखला करता है :
उसका तेज कम हो जाता है,
मन अशांत हो जाता है,
आरोग्य बिगड़ जाता है,
और आयु पहले ही समाप्त हो जाती है।
क्यों?
क्योंकि यह कर्म प्रकृति-विरोधी और धर्म-विरोधी है।
३. पुराणोक्त दण्ड : क्यों यह पाप इतना भयानक माना गया?
शास्त्रों के अनुसार स्त्री के शरीर के जितने रोमकूप होते है
उतने ही हजार वर्षों तक व्यभिचारी पुरुष को नरक में भोग सहना पड़ता है।
यह केवल एक प्रतीक नहीं,
बल्कि एक चेतावनी है कि
यह पापकर्म अत्यंत दीर्घकालीन और असहनीय यातनाओं का कारण बनता है।
संदर्भ : ब्रह्मवैवर्त पुराण और देवीभागवत महापुराण
इन ग्रंथों में कहा गया है कि—
जो पुरुष एक से अधिक स्त्रियों के साथ व्यभिचार करता है,
उसका पाप कई गुना बढ़ जाता है :
दो स्त्रियों के साथ — दुगुना
तीन के साथ — कई गुना
चार-पाँच के साथ — असीमित नरक योनि
और अगले जन्म में नीच, दरिद्र, कष्टयुक्त गर्भ मिलता है।
यह कोई डराने के लिए नहीं,
बल्कि जीवन-नीति की रक्षा के लिए कहा गया है।
४. यदि स्व-नियंत्रण नहीं तो परिणाम अत्यंत कठोर
पाप उसी को खींचता है जो अपने मन पर नियंत्रण नहीं रख पाता।
कई पुरुषों में काम इस सीमा तक बढ़ जाता है कि
वे दूसरों की बहन, बेटी, पत्नी—किसी को भी नहीं छोड़ते।
यह केवल पाप नहीं,
कुल कलंक है।
यदि कोई मनुष्य
अपने मन को वासना से रोक ही नहीं सकता,
तो शास्त्रों की चेतावनी स्पष्ट है :
नरक-भोग
पीड़ा, रोग, व्याधि
कठोर पुनर्जन्म
ग़रीबी, दीनता, अपमान का जीवन
इनसे बच पाना असंभव है।
५. मनुष्य-योनि : एक व्रत पर आधारित
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शास्त्रों में कहा गया है—
मनुष्य-योनि मिलने की एक मुख्य शर्त है — पर-योनी से यौनाचार न करना।
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यदि मनुष्य इस नियम को छोड़ देता है,
तो अगले जन्म में नर-योनि प्राप्त होना लगभग असंभव है।
६. क्यों यह विषय आज भी उतना ही आवश्यक है?
क्योंकि आधुनिक युग में
चारों वर्णों में—
उच्च जाति या निम्न,
गरीब या अमीर—
हर वर्ग में
उत्तम चरित्र वाले लोग भी हैं
और व्यभिचार में डूबे लोग भी।
आजकल
कई लोग चोरी-छिपे
होटलों में,
गुप्त स्थानों में
व्यभिचार करते हैं
और कहते हैं—
“जिन्हें मिल जाती है वे भाग्यशाली हैं,
जिन्हें नहीं मिलती वे क्या करें?”
यही पतन की सबसे बड़ी निशानी है।
जब समाज के लोग पाप को सामान्य बना दें,
तो धर्म का मरना तय है।
७. कटु सत्य पर कुछ लोग क्रुद्ध क्यों होते हैं?
जो मनुष्य पाप करता है,
उसी को सत्य सबसे अधिक चुभता है।
जो पुरुष अपनी पत्नी के प्रति निष्ठावान है,
वह इस अध्याय की सराहना करेगा।
परन्तु जो चोरी-छिपे दुष्चरित्र में लिप्त है,
उसे यह अध्याय
नाक में नली की तरह जलता हुआ सत्य लगेगा।
लेकिन सत्य को छुपाना भी पाप है।
शास्त्र कहते हैं—
“धर्म की रक्षा से ही जीवन की रक्षा होती है।”
८. अंतिम चेतावनी : यह विषय नैतिक-शिक्षा का अंग है
कई लोग कहते हैं कि आज के युग में
ऐसे विषयों पर बोलना "पाप" है,
लेकिन सत्य यही है—
जो शास्त्रों को नहीं मानता,
वह मृत्यु के बाद अवश्य मानता है।
पर-नारी गमन चारों वर्णों के लिए कठोर रूप से निषिद्ध।
इससे आयु, तेज, बुद्धि और जीवन-शक्ति नष्ट होती है।
पुराणों में इसके दण्ड अत्यंत भयानक बताए गए हैं।
मनुष्य-योनि प्राप्ति की एक शर्त यही है कि पर-योनी-भोग न किया जाए।
समाज का चरित्र तभी बचेगा जब व्यक्ति अपनी पत्नी में संतोष रखे।
कटु सत्य का उद्देश्य सुधार है, न कि अपमान।
✍️ लक्ष्मीकांत पांडेय
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वयं राष्ट्रे जागृयाम
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