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Wednesday, 26 November 2025

भारतीय सभ्यता की तुलना में पाश्चात्य देशों में स्त्रीयों की स्थिति ।

विवाह के उपरांत की प्रथम रात्रि के मिलन की मधुर कल्पना के लिए संस्कृत से लेकर हिन्दी साहित्य तक में असंख्य गीत हैं। इस रात्रि को लेकर हर वधू और वर के हृदय में अनगिनत सपने रहते हैं, क्योंकि यही दाम्पत्य जीवन का शुभारंभ होती है। परंतु क्या हो जब यही मधुर मिलन सैकड़ों लोगों के सामने करना पड़े? क्या यह मिलन मधुर रह पाएगा?

कैसा लगेगा जब दुल्हन के वस्त्र दूल्हा नहीं, बल्कि उसके परिवार की महिलाएं उतारेंगी और यह देखा जाएगा कि क्या उसका शरीर दूल्हे की ब्रीड को आगे लेकर जाने में सक्षम है या नहीं? क्या होगा जब सैकड़ों लोग गवाह बनें कि शादी सही से हो गई है या नहीं? शादी का मतलब केवल रिचूअल्स पूरे होने ही नहीं, बल्कि शारीरिक संबंध सही से बने या नहीं और दुल्हन की योनि से रक्त निकला या नहीं, से है। 

यह कहानी है मध्यकालीन यूरोप की। जहां पर wedding ceremony तभी पूरी मानी जाती थी, जब bedding ceremony पूरी हो जाए। सिर चकराया न? मेरा भी चकराया था। मध्यकालीन यूरोप में जहां पर 12 साल के बाद लड़कियों की शादी हो जाती थी और चूंकि शादी कोई जन्मजन्मांतर का संबंध न होकर केवल और केवल कान्ट्रैक्ट होता था, तो कान्ट्रैक्ट पूरा करने के लिए गवाह चाहिए होते थे। 

अब आप कहेंगे कि हिंदुओं मे भी तो विवाह के साक्षी होते हैं तो उसमें बुरा क्या है? ठीक! मगर wedding ceremony के जो गवाह होते थे, वे तब तक घर नहीं जाते थे, जब तक bedding ceremony पूरी नहीं हो जाती थी। bedding ceremony को अपनी आँखों से पूरी होते हुए न देख लें अर्थात लड़की और लड़के को शारीरिक संबंध बनाते हुए अपनी आँखों से न देख लें और लड़की को नग्न होते हुए न देख लें! 

इस bedding ceremony से पहले दुल्हन (फिर चाहे वह 12 वर्ष की हो या अधिक) को सबके सामने एक एक कपड़े उतारकर पूर्णतया नग्न किया जाता था, जिससे कि सभी घरवाले जांच परख लें कि लड़की आखिर ठीक है या नहीं और फिर लड़के के पूरे कपड़े उतारे जाते थे। सभी के सामने! 

उसके बाद उन दोनों को bedding ceremony के लिए ले जाया जाता था, जहां पर कमरे में वकील और प्रीस्ट सहित कुछ लोग उस पूरी कार्यवाही के गवाह होते थे। चूंकि यह शादी किसी न किसी चीज के बदले में हो रही होती थी, तो जो कीमत लड़की की दी जा रही है, वह लड़की उसके काबिल है या नहीं। एक एक गतिविधि आधिकारिक रूप से दर्ज की जाती थी। 

लड़की कैसे आकर बैठी, कैसे कंधे पर हाथ रखा तो क्या हुआ आदि आदि! उस पूरी रात की हर गतिविधि को कानूनी रूप से दर्ज किया जाता था। यदि आप सोच रहे हैं कि यही बस था, तो रुकें! उस पूरी रात प्रीस्ट और वकीलों के सामने शादीशुदा ज़िंदगी की पहली रात बिताने के बाद भी यह गारंटी नहीं होती थी कि लड़की अपने हसबैन्ड के घर जाएगी। 

सुबह उसे दी गई सफेद चादर को जांचा जाता था। यदि उसमें खून के दाग हुए, तभी लड़की को अपनाया जाता था, नहीं तो लड़की के बदले में दिए गए पैसे ही वापस नहीं करने पड़ते थे, बल्कि लड़के और उसके परिवार वालों को मुआवजा भी देना पड़ता था। यदि लड़की की योनि से खून नहीं आया तो लड़की की तो शादी टूटती ही थी, साथ ही उसकी बहनों की भी शादी पर भी खतरा मंडराता था और लड़की को फिर अंतत: कान्वेन्ट में जाना होता था। 

कितनी ही लड़कियां केवल कपड़े उतारने के दौरान ही बेहोश होकर गिर जाती थीं। परंतु बेहोश होकर गिरना भी सही नहीं माना जाता था। कितनी ही लड़कियां पहली रात को ही मर जाती थीं, मगर उनका कोई हिसाब नहीं रखा जाता था। 
और इन लोगों ने हमें आकर कहा कि भारत में स्त्रियों का सम्मान नहीं था? भारत में वर और वधु को स्वयं महादेव और पार्वती के रूप में देखा जाता है और पूजा जाता है। और वहाँ पर दुल्हन को परिवार और दोस्तों के सामने अपनी शारीरिक पवित्रता का सबूत देने के लिए प्रीस्ट और वकील सभी के सामने शारीरिक संबंध बनाने होते थे! और ये लोग हमें महिला अधिकारों पर भाषण देते हैं, जो अपने यहाँ इतने घिनौने कारनामे छुपाए बैठे हुए हैं। 
मैं आदरणीय Kusumlata Kedia कुसुमलता दीदी का आभार व्यक्त करना चाहती हूँ, जिन्होनें मुझे स्त्री विमर्श का यह रूप भी दिखाया।


संदर्भ -
 https://www.facebook.com/share/p/172WUTu7u2/

✍️ Sonaali Mishra 
 
वयं राष्ट्रे जागृयाम 







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