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Monday, 24 November 2025

-: भगवान श्रीराम व जगज्जननी श्री सीताजी के विवाहोपरान्त कोहबर का विनोद-प्रकरण :-

                   विवाह पंचमी पे विशेष
       ( मार्गशीर्ष शुक्ल ५ विक्रम संवत २०८२ )
  -: भगवान श्रीराम व जगज्जननी श्री सीताजी
 के विवाहोपरान्त कोहबर का विनोद-प्रकरण :-

भगवान राम को विवाह के पश्चात् कोहबर में ले जाया गया। 
"कोहबर" का अर्थ है-कोह माने क्रोध और बर माने वर ( दूल्हा ) इसका अभिप्राय है कि स्थल, जहाँ पर बर को क्रोध दिलाने की चेष्टा की जा रही है। मानो चिढ़ाने के रूप में उसके क्रोध व संयम की परीक्षा है कि वह सहिष्णु है या नहीं? कोहबर की लीला व्यंग, कटाक्ष तथा चिढ़ाने जैसी होती ही है।

गोस्वामीजी कहते हैं कि विवाह के बाद-

कोहबरन्हिं आने कुँअर कुँअरि सुआसिनिन्ह सुख पाइ के।
अति प्रीति लौकिक रीति लागीं करन मंगल गाइ के॥

यहाँ पर श्रीवशिष्ठजी, शतानंदजी, श्री दशरथजी, श्री जनकजी का प्रवेश नहीं है। यहाँ तो केवल श्रीसीताजी की सखियाँ हैं। जब चारों भाइयों को यहाँ ले जाया गया, तो प्रारंभ हो गया यहाँ का रीति रिवाज।

शाखोच्चार में बताया जाता है कि बर-कन्या के पूर्व-पुरुष ( पुरखे ) कितने उच्च कोटि के थे। पर यहाँ प्रारंभ किया, एक सखी ने यह कहते हुए कि हमारे यहाँ जनकपुर में इतने राजकुमार आये, पर राम के समान घमंडी राजकुमार आज तक नहीं आया।

अब भला सोचिए! यहाँ स्वागत के पहले वाक्य में ही अभिमानी कहकर संबोधित किया जा रहा है।परशुरामजी तो जाते समय प्रसन्नतापूर्वक उपाधि देकर गये थे-

विनय सील करुना गुन सागर।
जयति बचन रचना अति नागर॥

आप विनयशील और करुणा के सागर हैं, पर यहाँ यह सब कुछ नहीं, अपितु उल्टे चेतावनी भी दे दी।
बरवै रामायण में वर्णन आता है कि सखी ने कह दिया कि अभिमान है तो अपने पास रखो, यहाँ बिल्कुल नहीं चलेगा। क्यों? बोली-

गरब करहु रघुनंदन जनि मन माहिं।

आप कल्पना कीजिए कि जिस सुन्दरता को देखकर सारे पुरवासी सम्मोहित हो गये-
कहहु सखी अस को तनु धारी।
जो न मोह यह रूप निहारी॥

उनके लिये सखी कह रही है कि आप सुन्दरता का गर्व न करें। वहाँ की बात और थी पर यहाँ की बात और है।आपके बायें भाग में जो बिराजमान हैं, पहले उनकी ओर देख लो-

गरब करहु रघुनंदन जनि मन माँहिं।
आपन मूरति देखहु सिय की छाँहिं॥

उनकी ओर भी नहीं, अपितु उनकी छाँह की ओर देख लो। जितनी सुन्दर वह छाँह है, तुम भी उतने ही सुन्दर हो। ब्यंग्य यह है कि श्री सीताजी की छाया काली है और तुम भी वैसे ही काले हो। वस्तुतः यह भगवान की श्यामता पर व्यंग था।

छाया कहने का, प्रतिबिम्ब कहने का एक और अर्थ है कि प्रतिबिम्ब समर्थ नहीं है। व्यक्ति जिधर चलेगा, छाया को भी उधर ही चलना होगा।

श्री सीताजी के प्रतिबिम्ब हो अर्थात स्वतंत्र नहीं हो, जिधर वे जायेंगी, उधर ही तुमको जाना होगा।

इस वाक्य को सुनकर भगवान राम को बड़ी प्रसन्नता हुई कि चलो ‘अभिमानी’की एक उपाधि तो मिली।सुशील तथा विनम्र कहने वाले तो बहुत मिले, पर ऐसी नयी बात तो केवल यहीं मिली। यद्यपि प्रभु तो मौन रहे, पर लक्ष्मणजी तेजस्वी स्वभाव के हैं, बोल उठे-

हम लोगों की जानकारी में तो श्रीराम अहंकार युक्त नहीं हैं, पर यहाँ यदि वे अभिमान भी कर बैठे, तो गलत क्या है? आप लोग भूल गयीं उस दिन को, जब धनुष न टूटने पर आप लोगों की क्या दशा हो गयी थी? और हमारे राघवेन्द्र ने ही धनुष तोड़कर आप लोगों का कष्ट दूर किया। आप लोगों के आँसू तो इनके द्वारा ही मिट पाये।

पर सखियाँ क्या उत्तर देने में चूकीं।उन्होंने कहा-

धनुषमंडप से पहले तुम पुष्पबाटिका की याद कर लो। साथ में तुम भी तो थे। जब ये लताकुंज से निकले तो क्या दशा थी?

गोस्वामीजी ने लिखा कि--

भाल तिलक श्रम बिन्दु सुहाए।

प्रभु के माथे पर पसीने की बूँद थी।

लक्ष्मणजी से सखियों ने पूछा-
जिसको फूल तोड़ने में पसीना आ जाय, क्या वह धनुष तोड़ सकता है?कौन सा तर्क कहता है?

तब कैसे टूट गया?

सखियों ने कहा-
सत्य तो यह है कि इनसे तो टूट ही नहीं सकता था। अगर तोड़ने की शक्ति होती तो पहले उठकर तोड़ देते।तुमने देखा नहीं कि जब वे चले तो बेचारे इतने धीरे धीरे चले कि हम लोगों को दया आ गयी। हमने सोचा कि सुकुमार राजकुमार धनुष क्या तोड़ेगा? अतः हम सबने अपने अपने पितरों तथा देवताओं का आह्वान किया और उनसे निवेदन किया कि-
बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे।
जौं कछु पुन्य प्रभाउ हमारे॥
तो सिव धनु मृनाल की नाईं।
तोरहुँ राम गनेस गोसाईं॥ 

हे गणेश जी महाराज! हमारा सारा पुण्य लेकर श्रीराम से धनुष तुड़वा दीजिए। और इतना ही नहीं, इसमें श्रीसीताजी ने सहायता दी।श्रीसीताजी ने श्रीराम की सुकुमारता को देखा तो तुलसीदासजी ने उनकी दशा का वर्णन करते हुए लिखा कि-

देखि देखि रघुबीर तन, सुर मनाव धरि धीर।
भरे बिलोचन प्रेम जल पुलकावली सरीर॥

उन्होंने मन ही मन अपने पिताजी को उलाहना दिया-
अहह तात दारुनि हठ ठानी।
समुझत नहिं कछु लाभ न हानी॥ 

और साथ ही साथ गणेशजी से वे प्रार्थना भी करती हैं-
गन नायक बरदायक देवा। 
आज लगें कीन्हिउँ तुअ सेवा।
बार बार बिनती सुन मेरी। 
करहु चाप गुरुता अति थोरी॥

सखियाँ कहती हैं इस तरह से हम सबने अपना सारा पुण्य लगा दिया, प्रार्थना की, तब कहीं जाकर धनुष टूटा और तुम कहते हो कि इन्हें गर्व करना चाहिए।

कोहबर की भाषा सर्वथा भिन्न प्रकार की है, पर लक्ष्मणजी सरलता से हार नहीं मानते। वे याद दिला देते हैं कि जब आप लोग प्रार्थना नहीं कर रहे थे, तब की घटनाओं का पता है आप लोगों को। जब इन्होंने अहिल्या का उद्धार किया, उस समय आप लोग थीं क्या? पत्थर को चेतन बनाने की जो शक्ति है, क्या वह दिब्य नहीं है?

तुरन्त सखियों ने प्रश्न किया-

चरणों में चमत्कार था, तो क्या अयोध्या में एकाध पत्थर स्त्री के रूप में परिवर्तित हुआ? नहीं न!

इसका अर्थ है कि चमत्कार चरणों का है ही नहीं।
और याद कीजिए, गुरुजी ने भी यही कहा था-

चरण कमल रज चाहति,

चमत्कार तो धूलि में है। उनके चरणों में चमत्कार तब आया, जब वे मिथिला की ओर चले, मिथिला की धूलि जड़ को चेतन बना देती है।इसका सीधा सा अर्थ है कि परिवर्तन ज्ञान के द्वारा नहीं होता है। ज्ञान का कार्य तो वस्तु को यथार्थ रूप में दिखा देना भर है।
प्रकाश का काम किसी में परिवर्तन करना नहीं है। प्रकाश किसी गोरे को काला अथवा काले को गोरा नहीं करता, और न ही आकृति में कोई परिवर्तन लाता है। वस्तुतः वह तो जो वस्तु जैसी होती है, उसे उसी रूप में दिखा देता है। परिवर्तन तो “भक्ति” के द्वारा होता है।

अहिल्या की बुद्धि वासना के स्पर्श से मलिन हो गयी है, जड़ हो गयी है, वह साधना नहीं कर सकती। उसका उद्धार इस पथ पर होगा, जहाँ कृपामयी श्री किशोरीजी निवास करती हैं।

महर्षि विश्वामित्र अहिल्या का परिचय देते हैं-

गौतम नारी श्राप बस उपल देह धरि धीर।
चरण कमल रज चाहती, कृपा करहु रघुबीर॥

यह आपके चरण कमलों की रज के लिये व्यग्र है। आप इस पर कृपा कीजिए। अतः श्री सीताजी के कारण ही अहिल्या का उद्धार हुआ।लक्ष्मणजी कुछ सोचने लगे तो सखियों ने प्रभु श्रीराम की ओर रुख करते हुए, गीतों के माध्यम से कहा कि 

राघवेन्द्र तुम अन्यत्र अभिमान करना, पर यहाँ नहीं। क्योंकि आप यहाँ तो बिना निमंत्रण के आये हुए हो-

बिनु बोले पिय आये

शीलसिन्धु प्रभु राम ने सखियों के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि अच्छा यह बताओ कि कमल ने क्या कभी किसी भ्रमर को निमंत्रण दिया है? यह तो कमल की विशेषता है कि उसके पराग और सुगंध के आकर्षण से, भ्रमर खिंचा हुआ स्वयं आ जाता है।
उनका संकेत श्री किशोरीजी की ओर था।

तुलसीदासजी ने भी इसका निर्वाह किया। भगवान राम मिथिला तक पैदल चल कर आये और उनकी इस यात्रा का श्रीगणेश कृपा से ही हुआ।

                   साभार - भगवद्गीता समूह
                        वयं राष्ट्रे जागृयाम 

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