#केतु_से_जिन_विषयों_पर_विचार_होता_है
#मोक्ष और कैवल्य केतु त्रिगुणातीत अवस्था का कारक है। यह सत्व, रज और तम सभी से परे है। उपनिषदों में जिसे “#नेति_नेति” कहा गया है, वही केतु का स्वभाव है। यह मनुष्य को “#अहम्” से “#नाहम्” की ओर ले जाता है।
गूढ़ विद्याएँ और तंत्र-मंत्र केतु मंत्र-सिद्धि, कुंडलिनी जागरण, षट्चक्र-भेदन, काल-ज्ञान, भूत-प्रेत विद्या, ज्योतिष के गूढ़ रहस्य, यंत्र-विज्ञान, आकाश-गमन विद्या और मृत्यु-रहस्य का स्वामी है।
#आध्यात्मिक_रोग और मानसिक विक्षेप केतु से त्वचा रोग (विशेषकर सफेद दाग), नाड़ी-संस्थान के रोग, कैंसर जैसे असाध्य रोग, हिस्टीरिया, ओसीडी, स्किजोफ्रेनिया जैसे मनोरोग, भूत-बाधा, पितृ-दोष और पूर्वजन्म का प्रारब्ध सक्रिय होता है।
#वैराग्य, संन्यास और तीर्थ-यात्रा केतु व्यक्ति को गृहस्थ से संन्यास की ओर धकेलता है। कैलाश, बद्रीनाथ, केदारनाथ, अमरनाथ, तिरुपति बालाजी, रामेश्वरम जैसे क्षेत्रों से गहरा संबंध रखता है।
#पूर्वजन्म और #पितृ_ऋण केतु पितृलोक का द्वारपाल है। पितृदोष, कुल-देवता क्रोध, श्राद्ध में त्रुटि – सबके पीछे केतु की भूमिका रहती है।
रहस्यमय मृत्यु और आकस्मिक घटनाएँ विष, सर्पदंश, दुर्घटना, आत्महत्या की प्रवृत्ति, अचानक गुम हो जाना – ये सब केतु के कुप्रभाव हैं।
केतु का दार्शनिक स्वरूप
#श्रीमद्भागवत_पुराण (5.24.4-5) में राहु-केतु को भगवान के चक्र से कटे सिर-धड़ के रूप में वर्णित किया गया है। धड़ (केतु) नि:शब्द, नि:शिर, नि:संग है – यह निर्गुण ब्रह्म का प्रतीक है। #बृहत्पाराशर_होराशास्त्र में पराशर ऋषि कहते हैं – “#केतुस्तमोऽधिको_रक्तवर्णो_विवर्णोऽन्त्यजोऽतिदुःखी_च। किंतु मोक्षकारकोऽयं भवति ज्ञानवैराग्यदाता।” अर्थात् केतु तमोगुणी होते हुए भी ज्ञान और वैराग्य देता है।
#केतु_की_शारीरिक_संरचना में महत्ता
मानव शरीर में केतु कुंडलिनी का अंतिम द्वार (#ब्रह्मरंध्र) और आज्ञाचक्र से परे सहस्रार का सूचक है।
केतु की पीड़ा = पीनियल ग्रंथि (Pineal Gland) में विकृति
#केतु_की_शांति = तीसरे नेत्र का जागरण
केतु का बल = सहस्रार में प्रकाश का अनुभव
केतु-पीड़ा के अत्यंत गंभीर लक्षण (जो सामान्य ज्योतिषी नहीं पहचान पाते)
रात में 3:00 से 4:30 बजे अचानक नींद खुलना और भय लगना
#सिर_के_पिछले_हिस्से_ब्रह्मरंध्र_में_दर्द या खालीपन का अनुभव
बिना कारण #शरीर_में_कंपन या करंट लगना
पूर्वजों के सपने में श्राद्ध मांगना
#काले_सफेद_कुत्ते या सांप का बार-बार दिखना
अब अत्यंत गोपनीय, दुर्लभ और आज तक सार्वजनिक न किए गए केतु-शांति के उपाय
(ये उपाय केवल उन्हीं को बताए जाते थे जो वर्षों तप करते थे। मैं इन्हें पहली बार प्रकट कर रहा हूँ।)
“#निर्गुण_केतु_कवच” (शिव-पार्वती संवाद से प्राप्त) प्रतिदिन सूर्यास्त के बाद 21 बार इस मंत्र का जप करें (बिना रुद्राक्ष माला के, केवल उंगलियों से): “ॐ ह्रां ह्रीं केतवे नमः स्वाहा निर्गुणाय विद्महे सुवर्णवर्णाय धीमहि तन्नो केतु: प्रचोदयात्॥” जप के बाद एक काले तिल का दान किसी काले कुत्ते को करें। 43 दिन में चमत्कार।
“#कालसर्प_दोष_नाशक_गुप्त_यंत्र” भोजपत्र पर केसर और काले अगरबत्ती की राख से यह यंत्र बनाएं: एक त्रिकोण में 9 बिंदु बनाएं, बीच में “ह्रां” लिखें। इसे रात में शिवलिंग के नीचे रखकर 11 सोमवार छोड़ें। 12वें सोमवार इसे लाल कपड़े में बांधकर गले में धारण करें। कालसर्प दोष 100% नष्ट।
“#पितृऋण_मुक्ति_प्रयोग” (अथर्ववेद की गुप्त शाखा से) अमावस्या की रात को पीपल के पेड़ के नीचे 11 काले उड़द के दाने, 11 कौड़ियां, 11 गोमती चक्र रखें। वहां 11 बार यह मंत्र बोलें: “ॐ नमो भगवते केतवे पितृदोष नाशय नाशय स्वाहा” फिर बिना पीछे मुड़े घर लौट आएं। पितृदोष जड़ से समाप्त।
“#कुंडलिनी_जागरण_केतु_उपाय” (केवल सिद्ध पुरुष करते थे) हर रात सोने से पहले दाएं हाथ की अनामिका उंगली पर काले चंदन का तिलक लगाएं और यह मंत्र 7 बार बोलें: “ॐ क्रौं केतवे सहस्रारं भेदय भेदय ह्रां ह्रूं फट्” 6 महीने में सहस्रार जागरण शुरू हो जाता है।
“#महामृत्युंजय_से_भी_श्रेष्ठ_केतु_मंत्र” (गरुड़ पुराण के गुप्त भाग से) जब कभी मृत्यु तुल्य कष्ट हो, तब 1 माला (108 बार) यह मंत्र बोलें: “ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं केतवे नमः मृत्युंजयाय स्वाहा” यह मंत्र मृत्यु को भी टाल देता है।
ये सभी उपाय केवल श्रद्धा और गोपनीयता के साथ करें। इन्हें कभी किसी को न बताएं, अन्यथा फल नष्ट हो जाता है।
केतु कोई दुष्ट ग्रह नहीं है – यह वह दर्पण है जो आपको आपके असली स्वरूप का दर्शन कराता है। जब तक आप संसार को सत्य मानते हैं, केतु आपको कष्ट देगा। जब आप संसार को मिथ्या मान लेते हैं, वही केतु आपको मोक्ष दे देता है।
यदि आप अपनी कुण्डली विश्लेषण चाहते हैं तो जन्म स्थान समय बताएं!!
ॐ ह्रां ह्रीं केतवे नमः
#SHRI_NARAYAN_JI
#Shri_Narayan_Ji
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