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Wednesday, 12 November 2025

मंत्र दृष्टा " घोषा "

स्निग्ध प्रकृति के वक्षस्थल पर, चन्द्रिका की श्वेत, शीतल, क्षीरधारा सी अमृत अंजलि चारु विस्तार पा रही हैं। आकाशगंगा की दुग्धधारा में तारारूपी पुष्प तैर रहे हैं। आश्रम के शांत कुटीर के अग्रभाग में दीपक का कंपित प्रकाश झिलमिला रहा है। वह प्रभा , उपस्थित नवदंपति के हृदयों में उत्पन्न , परस्पर आकर्षण व प्रथम स्पर्श की लालसा के सदृश्य थी, वह प्रज्वलित अवश्य थी, किन्तु संकोचवश स्पंदित भी हो रही थी, मानो प्रेम के उद्गार और लज्जा के आवरण के मध्य संलाप कर रही हो। 

देवदारु की सुगंधित कोमल शैय्या पर विराजमान घोषा का सौन्दर्य चन्दन के वृक्ष पर चढ़ी माधवी लता के समान अनुपम था, जो कि प्रिय चंदवृक्ष से आलिंगनबद्ध होकर उसकी सुगंध से अपने पुष्पो की मादकता को द्विगुणित कर देती हैं। उसके केश - चमेली और केवड़े के तेल से सुवासित होकर, उसके अंसस्थल पर अलसाए हुये यामिनी के मंदगामी श्यामल मेघो के समान विचर रहे थे। मस्तक पर लगा श्वेत चन्दन, चन्द्रकिरणों से आलोकित, धवलित कुमुदिनी के मध्य स्थित कमल केसर के समान शोभित हो रहा था। हस्तयुगल में मल्लिका के गजरे, चरणकमल में रक्तचन्दन की लालिमा से रंगी अलक्तक की रेखा और कंठ में वन-फूलो की माला थी। घोषा का अस्तित्व , जलनिधि में निमग्न नीलमणि के समान चंचल, संकोच से सिकुड़ा हुआ और प्रतीक्षा के एक अनिर्वचनीय मधुर भाव से सजल हो रहा था। उँगलियो की सूक्ष्म थिरकन, हृदय की तीव्र गति की मूक संदेशवाहिका बनी हुई थी।

तभी वर, प्रियतम समीप आया और उसने घोषा के रक्तिम, अलक्तक-रंजित चरणकमल को अपने करकमल से स्पर्श किया। स्पर्श में उत्साह था, उमंग थी, स्नेह था, ताप भी था। घोषा की समस्त देह में सिहरन दौड़ गई, जैसे कोयल की प्रथम कूक से वसन्तागम का संकेत पाकर वनस्थली रोमांच से थरथरा उठती हैं। उसने लज्जा से संकोच करती हुई, अधखुली पलको से पति को देखा, वह और निकट आ रहे थे। 

दीपक की लौ मंद समीर के झोंके से डगमगा उठी। क्षणभर को मंद पड़ गई। मानो वह दंपति के इस पावन एकांतिक अतरंग मिलन के क्षणो को देखने में संकोचवश लज्जा कर रही हो, अपना मुख मोड लेना चाहती हो। घोषा की समस्त इंद्रियाँ विभोर हो उठी।

अकस्मात एक लघु पक्षी के तीव्र और कर्कश कलरव से घोषा की कल्पना भंग हो गई। वह प्रणय-सुमधुर कल्पनालोक के सुखद अरण्य से जागृत होकर नीरस यथार्थ पर पर आ गई। सरसिजनी के सुंदर स्वप्न के समान उसकी मनोरम भवन-रचना को कर्कश ध्वनि के कंकरी-प्रहार ने तत्क्षण विछिन्न कर दिया। 

नदी के तट पर नीप वृक्षो की छाया में बैठी महर्षि कक्षीवत की पुत्री घोषा खिन्न हो उठी.... उसने पक्षी पर कटाक्ष किया - "हे मूढ़ पक्षिराज, क्या तुझे कभी प्रेम के मिलन की उत्कंठा का ज्ञान हुआ हैं? क्या तूने कभी अपने प्रियतम का स्नेहिल स्पर्श प्राप्त किया है? निश्चय ही तू निष्ठुर और निर्दय है, तूने प्रथम प्रणय में जो इस प्रकार विघ्न डाला।  

महर्षि कक्षीवत ने दूर से अपनी पुत्री को देखा और वहाँ आ पहुंचे। घोषा जो क्षण भर पूर्व प्रणय-कल्पना में खोई थी, महर्षि को सम्मुख देखकर सकुचा गई, नेत्र भूमि की ओर टिक गए। 

 "हे तन्वंगि, यहाँ क्यो भटक रही हो, तुम्हें ज्ञात है न, आज अतिथि अग्रिम संध्या में अपने विद्वान व गुणवान सुपुत्र के साथ तुम्हारे दर्शनार्थ आ रहे हैं। देवताओ की कृपा रही तो आज तुम्हारा विवाह निश्चित हो जाएगा। 

महर्षि के वचनो को सुनकर घोषा का लज्जाभार हर्ष के आवेग में लीन हो गया - "जी, पिता जी , आप चले, मैं शीघ्र ही आती हूँ" । 

महर्षि कक्षीवत ने घोषा के मन की उथल-पुथल को पढ़ लिया , वे आशीर्वाद देकर आगे बढ़ गए। किन्तु उनके शब्द, घोषा के हदय में अनूठा संगीत भर गए- "आज तुम्हारा विवाह निश्चित हो जाएगा" 

"अहो, आज वह शुभक्षण आ गया। कैसे होंगे वह ? निश्चय ही वेद-वेदान्त में पारंगत, तेजस्वी, गुणवान। 

घोषा ने नदी के निर्मल जल में अपना प्रतिबिंब देखा। हाथो से अपने केशो को सँवारते हुये, उन्हे चम्पक और बकुल के नवविकसित पुष्पो से सजाया। हाथो में वनलताओ के कंगन पहने। उसने प्रार्थना की - 

"हे वाग्देवी, आज के दिवस को मेरे जीवन का सर्वश्रेष्ठ दिवस बना दो"

"में भी गृहस्थाश्रम की सब विधियो का पालन करूंगी। अपने पति की सेवा करूंगी, उनके साथ यज्ञ में भाग लूँगी। मेरे भी पुत्र और पुत्रियाँ होंगे। 

उसकी कल्पना इतनी सजीव थी मानो भविष्य उसके नेत्रो में ही घटित हो रहा हो। विविध कल्पनाएं करती हुई घोषा आश्रम पहुंची। प्रत्येक क्षण उसे युग के समान प्रतीत होता था, वह आश्रम को सजाती हुई बार बार आश्रम के मार्ग को देखती - "वे अतिथि कब आएंगे ???
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महर्षि कक्षीवत का आश्रम सब ओर से हरित-तरु-श्रेणियों से घिरा था। अशोक के वृक्ष लाल पुष्पों से लदे थे। चम्पक के पेड़ों से वातावरण में सुगंधि व्याप्त थी। यह आश्रम कुटीरों की एक श्रंखला था। प्रत्येक कुटीर के सामने एक छोटा सा उद्यान था, जहां तुलसी, बेला, चमेली आदि के पौधे लगे थे। आश्रम के मध्य की चौरस स्वच्छ भूमि पर विशाल यज्ञशाला थी। आश्रम की शोभा और सजावट में घोषा ही मुख्य भूमिका निभाती थी। वह प्रातःकाल पुष्प चुना करती, यज्ञशाला में देवपूजन की सामग्री सजाती, दीपकों में तेल डालती, धूपदानियों में घी और समिधा रखती। भोजनशाला का प्रबंध भी वह विशेषता से देखती। अतिथियों का सत्कार करती। संध्या समय उसके जलाए दीपकों की पंक्तियों से आश्रम जगमगा उठता। उसके हाथों की व्यवस्था देखकर महर्षि हर्षित हो उठते थे।

आज उसने आश्रम के प्रवेशद्वार पर पुष्पमालाएँ लटकाई हैं, जो मंद पवन के झोंकों से हिलते हुए, अपनी सुगंध बिखेर रही हैं। इस द्वार से एक तेजस्वी युवक ने अपने पिता के साथ आश्रम में प्रवेश किया। स्वागत सत्कार आदि हुआ। 

"हे तपोनिधे, हमें ज्ञात हुआ हैं कि आपकी कन्या घोषा जो कि अत्यंत सुशील, गुणवती एवं सर्वकर्मपटु हैं, वह विवाह योग्य हुई है। हम उसी के दर्शनार्थ विवाह-प्रस्ताव लेकर आए हैं । 

"आपने उचित ही सुना है ऋषिवर" - कहते हुये महर्षि ने पुत्री को पुकारा - "वत्से, अतिथि आए हैं, इनकी यथोचित सेवा करो" 

घोषा लजाती हुई, हाथ में अर्ध्य का पात्र लेकर आई। उसने सिर झुकाकर अतिथियों का स्वागत किया, अभिवादन किया। किन्तु ज्योंही उसने सर उठाकर अपना मुख प्रकट किया। अतिथियों के चेहरे की प्रसन्नता तिरोहित हो गई। 

युवक ने मुख फेर लिया। पिता और पुत्र दोनों की आँखों में घृणा और विस्मय का भाव उत्पन्न हुआ। उन्हे घोषा के मुख और हाथों पर कुष्ठरोग के चिन्ह स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहे थे। 

महर्षि कक्षीवत बोले - "हे विद्वन , यह मेरी पुत्री और शिष्या घोषा, इसे देवी सरस्वती ने सभी कलाओं से अलंकृत किया हैं, यह सब कार्यो में अत्यंत निपुण हैं, आश्रम का सम्पूर्ण व्यवस्थापन इसी के हाथों में हैं। 

महर्षि के वचन सुनकर ब्रह्मदत्त कठोर स्वरो में बोले - "हे महर्षि, हमें आपकी कन्या के गुणों की प्रसंशा से कोई आपत्ति नहीं, किन्तु विवाह तो शारीरिक संपन्नता का भी योग चाहता हैं। इस रोगिणी कन्या के शरीर को देखकर तो ....... हमें खेद हैं। 

महर्षि बोले - "इस कन्या ने अपना सम्पूर्ण जीवन तप और सेवा में ही व्यतीत किया है" 

"विवाह केवल गुणो का व्यापार तो नहीं होता ऋषिवर। समाज कहेगा मेरा पुत्र एक विकृत शरीर वाली कन्या से विवाह करके लाया हैं। और फिर कुष्ठरोग से ग्रसित कन्या को कैसे स्वीकार करे भगवन्, क्या कोई भी संसार में होगा जो रोगिणी से विवाह करेगा? हमें क्षमा करे। " - अतिथियों ने प्रणाम किया और चल दिये। 

घोषा स्तंभित हो गई, मानो पत्थर की मूर्ति बन गई हो। आंखो का प्रकाश तिरोहित हो गया, अश्रुधारा बह निकली। वह धीरे धीरे अपने कुटीर की ओर चली गई, हदय टूट चुका था। 

रात्रिकाल में जब सब निद्रा में थे, वह जाग रही थी - "हे देव, क्यो तुमने मुझे यह शरीर दिया। मेरे सभी गुण इस देह के कारण धूमिल हो गए।  

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समय की अविरल धारा बहती रही। वर्षों के चक्र ने अनेक ऋतुओं के दर्शन कराए। आश्रम के अशोक वृक्ष बारम्बार रक्तिम पुष्पों से लदे, चम्पक की सुगन्ध ने वातावरण को पुनः पुनः सुवासित किया, किन्तु घोषा के जीवन का वसन्त फिर कभी नहीं लौटा।

अन्य अनेक वर आए... प्रत्येक ने उसके गुणों, उसकी कुशलता, उसकी सेवाभावना की भूरि-भूरि प्रशंसा की। किन्तु ज्योंही उनकी दृष्टि उसकी देह पर अंकित रोग के चिह्नों पर पड़ी, प्रशंसा के सभी शब्द मानो हिम बन कर पिघल गए। नेत्रों में उत्सुकता के स्थान पर एकाएक भय, घृणा और खेद का भाव उदित हो आता। कोई मुख फेर लेता, कोई बहाना बना कर चला जाता, तो कोई सीधे ही तीक्ष्ण वचनों में अपनी असहमति व्यक्त कर देता।

प्रत्येक अस्वीकार, प्रत्येक अपमानजनक दृष्टि, प्रत्येक कठोर वचन घोषा के हृदय में एक गंभीर घाव बन गया। प्रारम्भ में तो वह रोया करती, रात्रि के अन्धकार में तकिए को आर्द्र कर डालती। फिर धीरे-धीरे उसके अश्रु सूख गए, मानो उसकी भावनाएँ भी उसके शरीर के साथ ही कठोर होती गई हों। उसने स्वयं को और अधिक तपस्या और सेवा में निमग्न कर दिया। यज्ञशाला की व्यवस्था, अतिथि सत्कार, पुष्पविहार... सब कर्म वह पूर्व से भी अधिक निपुणता से करने लगी, मानो इन्हीं कर्मों में लय हो जाना चाहती हो। उसके नेत्रों की ज्योति, उसके मुखमण्डल की मन्द मुस्कान सदा के लिए विदा हो गई थी, उसके स्थान पर एक गम्भीर, निर्विकार शान्ति ने स्थान ले लिया था।

उसकी किशोरावस्था का कोमल पुष्प म्लान हो गया। युवावस्था की उमंगें उसके द्वार पर खड़ी भी नहीं हुईं। समय निरन्तर चलता रहा और वह प्रौढ़ावस्था की देहरी पर आ पहुँची। उसके केशों में चाँदी की कुछ किरणें खेलने लगीं, मुखचन्द्र पर समय और संघर्ष की कथा के गंभीर झुर्रियों के अक्षर अंकित हो गए।
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संध्या का समय है। पश्चिम दिशा में भगवान सूर्यदेव अरुणिमा बिखेरते हुए अपने रथ को अस्ताचल की ओर ले जा रहे हैं। वन के एकांत प्रांतर में, शिलातल पर बैठी घोषा विलाप कर रही है।

देखो तो, सामने उसी पलाश वृक्ष पर दो शुक-युगल प्रेमालाप में मग्न हैं। नर शुक मधुर स्वर में कुछ कह रहा है, शुकनी लज्जा से सिर झुकाए उसकी बातें सुन रही है। "अहो! इस सृष्टि का प्रत्येक प्राणी अपने जीवनसाथी के स्नेह-सुख का भागी है... और मैं......" उसकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी।

मेरी सब सखियों ने गहने पहने, वे सुहागिन बनीं, उनके हाथों में मांगल्य-सूत्र चमके, पैरों में लाख की चूड़ियाँ खनकीं... और मैं? बस देखती ही रह गई.... केवल देखती रही.......कोई वर न आया.... कोई मेरे पैरों में आलता रचाने वाला न आया....

किशोरावस्था बीती, युवावस्था भी व्यतीत हुई..... इस प्रौढ़ अवस्था में भी, हृदय तो वही है.... तृषित, पिपासु, अतृप्त इच्छाओं का भंडार। इस हृदय में आज भी स्नेह की वही प्यास है, प्रेम की वही भूख है, प्रियतम के आलिंगन की वही लालसा है।

देखो, वह हिरण-युगल तालाब से जल पीकर लौट रहे हैं... नर-हिरण सतर्कतापूर्वक अपनी प्रियतमा की रक्षा करता हुआ अग्रगामी है। वह दो शारिका-पक्षी अपने घोंसले में एक-दूसरे के पंखों में सिर छिपाए सोने की तैयारी में हैं। प्रकृति का प्रत्येक प्राणी अपने युगल के साथ है... और मैं इसी वन में, एकांत में, शिला पर बैठी नियति को कोस रही हूँ।

घोषा के कंठ से करुण क्रंदन फूट पड़ा - "हे देव! क्या यही न्याय है? क्या इसी के लिए मुझे सृजा था?" वह फफककर रो पड़ी।

संध्या का अंधेरा गहराने लगा। पक्षियों का कलरव मंद पड़ गया। उसके एकांत विलाप को, उसकी करुण कथा को वनदेवता सुन रहे थे, किंतु उसकी वेदना से सन्न, निर्वाक और निश्चल खड़े उसके अश्रु पोंछने में असमर्थ थे। __ क्रमशः___

शेष भाग - 

निशा का कृष्णवर्णीय आवरण वन-वनान्तरों पर धीरे-धीरे अपना अधिकार स्थापित कर रहा था। गगन को घने जलधरों ने आच्छादित कर दिया था, जिन्होंने चन्द्र और तारागण का मार्ग पूर्णतः रुद्ध कर दिया था। किन्तु एक क्षीण दीपशिखा टिमटिमा रही थी...

उस वयोवृद्ध कुमारी घोषा के हृदय-निकुंज के अन्तस्तल में, जहाँ निराशा ने अपना साम्राज्य स्थापित कर रखा था, वहाँ भी एक अलक्ष्य दीपिका का क्षीण कंपन अब तक जाग रहा था। आशा... इस त्रिलोकी में इस पद का कितना अपार बल है! इसे दलित किया जा सकता है, परंतु इसका अस्तित्व कभी लुप्त नहीं होता। घोषा के हृदय में भी, पिंजरबद्ध कपोतिका के समान यह आशा अपने पक्ष फड़फड़ा रही थी...

घोषा का स्मृतिपटल चंचल हो उठा। क्या वह इसी प्रकार, फलरहित, पुष्पहीन, सन्तानहीन ही महाप्रयाण करेगी? क्या दैव ही सर्वेश्वर है? क्या पुरुषार्थ से भाग्य के दुर्विलंघ्य श्लोक को पुनः लिखा नहीं जा सकता?

तभी, एक दिव्य स्मृति उसके हृदयाकाश में विद्युत् के समान कौंध गई - उसके पिता महर्षि कक्षीवान् की! क्या वह तेजस्वी मुनि भी एक समय निःसन्तान नहीं थे? क्या उन्होंने भी अनपत्य होकर मृत्यु को स्वीकार कर लिया था? कदापि नहीं! उन्होंने घोर तपश्चर्या की, देवताओं की उपासना की, और अन्ततः अश्विनीकुमारों की दिव्य अनुकम्पा से उन्हें सन्तान की प्राप्ति हुई... यदि मेरे पिता ने कर्मबल से अपना भाग्य परिवर्तित कर लिया, तो क्या मैं, उन्हीं की सन्तति, ऐसा नहीं कर सकती?

वे देववैद्य तो आरोग्य प्रदान करने वाले हैं। वे जिससे प्रसन्न हो जाएँ, तो भला ऐसा क्या है जो नहीं दे सकते? मैं उनको ही प्रसन्न करूँगी, या तो उनकी कृपा प्राप्त करूँगी अथवा उनके लिए ही तप करते-करते प्राण दे दूँगी।

घोषा के भीतर एक नवीन आशा का संचार हुआ। एक विचार हृदय में फूट पड़ा। उसी क्षण उसने आँखें बंद कर लीं... वह अश्विनी कुमारों का ध्यान करने लगी...

अब घोषा के मस्तिष्क में अन्य कोई स्मृतियाँ उपद्रव न करती थीं, उसके मन में अन्य कोई विचार न आते थे, वह निरंतर अश्विनी कुमारों का चिंतन करने लगी। रात की यामिनियाँ व्यतीत होती थीं, दिवस के प्रहर व्यतीत होते थे। उसे ज्ञात न होता कि कब वह सोई। आँधी आती, वर्षा आती, वह बैठी रहती। समय बीतता गया... उसकी तपस्या अधिक कठोर होती गई। शरीर क्षीण होता गया।

और अकस्मात् एक प्रातः
घोषा की अंतरात्मा प्रकाशित हुई, उसे वेदमंत्रों के दर्शन होने लगे... घोषा के मुख से वेदमंत्र फूट पड़े... सूक्त प्रस्फुरित होने लगे... वह स्तवन करने लगी -

"हे अश्विनी कुमारों! ऋतुओं ने आपके निमित्त रथ प्रेषित किया था, वह रथ प्रकट हुआ। उस रथ के प्रकट होने पर आकाश-कन्या उषा उदित हुई, उसी से सूर्यदेव की आश्रिता रात्रि और दिन जन्म लेते हैं। आप कृपा कर उसी मन से भी अधिक वेगवान रथ पर आरूढ़ होकर आइए।" (ऋग्वेद १०.३९.१२)

"आपने ही जराजीर्ण च्यवन ऋषि को युवा किया था, आपने ही राजा पुरुमित्र की पुत्री शुम्भा का विवाह विमद से कराया था। गर्भिणी भृगुमती के आह्वान पर आपने ही उसका सुखपूर्वक प्रसव कराया था। वृद्ध स्तोता कक्षीवान् को आपने पुनर्जनन दिया और वंदन को कूप से बाहर निकाला था।" (ऋग्वेद १०.३९)

"हे देववैद्य! आपने विश्पला को लोहे का पाँव लगाया था। शत्रुओं द्वारा मरणासन्न समझकर फेंके गए रेभ को आपने स्वस्थ किया था। सात बंधनों में बाँधकर अग्नि में डाले गए महर्षि अत्रि के लिए आपने अग्निकुंड को शीतल कर दिया था। आपने वृकमुख वार्तिका पक्षी का उद्धार किया।"

"हे अश्विन्द्वय! मैं बंधूरहित हूँ, अज्ञानी हूँ, कुटुंबहीन और अश्रद्ध मतिवाली हूँ, मेरी दुर्गति के आने से पहले ही तुम आकर मेरा उद्धार करो..."

घोषा का स्तवन समाप्त हुआ। वह चेतना में लौटी और देखा - पूर्व दिशा से एक अलौकिक प्रकाश का स्राव होने लगा। यह प्रकाश सूर्य के तेजस से भिन्न, चन्द्र के शीतल प्रकाश से भिन्न, और विद्युत के तीक्ष्ण प्रकाश से भिन्न था। यह तो एक सुवर्णिम, मधुर, आनन्ददायी तेज था, जो अंधकार को दूर किए बिना ही समस्त वातावरण को दिव्य आभा से आपूरित कर रहा था। वह प्रकाश बढ़ता गया और अन्ततः एक दिव्य रथ के रूप में दृष्टिगोचर हुआ।

वह रथ त्रिनाभि, त्रिचक्र, सुवर्णमय, रजतभूषित था। उसके तीन चक्र ऋतुत्रय के सदृश प्रतीत होते थे - एक पद्मपत्र के सदृश कोमल (वसन्त), एक सूर्यकान्तमणि के सदृश दीप्तिमान (ग्रीष्म), एक शस्यश्यामल के सदृश पुष्ट (शरद्)। रथ के अग्रभाग में हंसों का एक युगल बद्ध था। रथ के ऊपर एक स्वस्तिक चिह्न अंकित था। उस रथ पर दो देवताओं की मूर्तियाँ विराजमान थीं। वे अश्विनीकुमार थे - नासत्य और दस्र।

उनके शरीर का वर्ण कमलदल के समान कोमल, कान्तिमय और सुवर्णिम था। मुखमण्डल पर एक अवर्णनीय तेज और सौम्यता विराजमान थी, जो समस्त रोग, शोक और जरा का नाश करने वाली थी। उनके नेत्र 'विश्वपति' -अत्यन्त कोमल, दयासागर और प्रकाशवान थे, जिनमें समस्त सृष्टि के प्रति करुणा झलक रही थी। उनकी दृष्टि जहाँ भी पड़ती, वहाँ की वनस्पतियाँ हरी हो उठतीं, मुरझाए पुष्प पुनः खिल उठते।

उनके वस्त्र पीतवर्ण के थे, जो 'हिरण्यवर्णाः' के वैदिक विशेषण के अनुरूप चमक रहे थे... उनके मस्तक पर दिव्य मुकुट शोभायमान थे, जो नक्षत्रों के समान जगमगा रहे थे।

आर्तघोषा का शरीर पुलकित हो उठा, वह रुदन करती हुई उनके चरणों में लोट गई।

अश्विनी कुमारों ने रोग और जरा से पीड़ित उस तपस्विनी को देखा। उनके कंठ से मधुर वाणी फूटी - "हे शुभे! हे तपस्विनी! बोलो, हम तुम्हारा क्या उपकार कर सकते हैं? कहो, देवी, तुम्हारी क्या कामना है?"

घोषा ने झुर्रियों से भरे मस्तक को उनके चरणों में रख दिया और करुण स्वर में निवेदन किया - "हे देव! मेरा इस संसार में कोई नहीं। इस अभागिनी ने केवल आपका ही गुणगान किया है, आपका ही चिंतन और मनन किया है। आपने मेरा स्तवन स्वीकार करके मुझ पर बड़ी कृपा की है। आप देखते हैं, मेरा कोई पति नहीं। आप देखते हैं कि मैं वृद्ध हो चुकी हूँ। आपने च्यवन ऋषि का कायाकल्प कर उन्हें युवा बना दिया था। मैं अब आपकी ही शरण हूँ। जैसे हो, मेरा उद्धार करें।"

अश्विनीकुमार बोले - "तुम्हारी इच्छा पूर्ण हुई, घोषा। तुम्हें पति प्राप्त होगा।"

जैसे शीत ऋतु के बाद वसन्त आता है और वृक्षों में नवपल्लव का सृजन करता है, वैसे ही अश्विनी कुमारों की कृपा-दृष्टि पड़ते ही घोषा की त्वचा की मृत कोशिकाएँ जीवित हो उठीं। उसके शरीर से जरा का अंधकार छँट गया। झुर्रियाँ मिट गईं, श्वेत केश पुनः कजरारे हो उठे, शरीर में नवीन स्फूर्ति और सौंदर्य का संचार हुआ। क्षण भर में वह वृद्धा से एक सर्वांगसुन्दरी, मनोहर युवती में परिवर्तित हो गई।

अपने नवीन रूप को देखकर घोषा की आँखों में आनंद के आँसू छलक पड़े। वह बोली, "देव! आपकी कृपा से मैं धन्य हुई।"

अश्विनी कुमारों ने आशीर्वाद दिया, "मंत्रदृष्टा घोषा काक्षीवती, तुम्हारा कल्याण हो।" इतना कहकर वे दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर अंतर्धान हो गए।

(ऋग्वेद के दशम मंडल के ३९ व् ४० इन दो सूक्तो की दृष्टा घोषा काक्षिवती है, जो कि ऋषि कक्षीवान् की पुत्री थी... कुष्ठ रोग से ग्रसित होने के कारण घोषा का विवाह न हो सका , वह वृद्ध हो गई, तब उन्हौने रोगमुक्त होकर पति एवं संतानों की कामना से , अश्विनी कुमारो की अराधाना की... एवं निरोग होकर पति प्राप्त किया। नियोग के प्यासे आर्यसमाजी इन सूक्तो के मंत्र से भी अपने कल्पित नियोग को दिखाते हैं, जब कि यह कथा ही उनके नियोग की कल्पना को ध्वस्त कर देती हैं , अगर उस समय यह "दयानंदी-नियोग" प्रचलित होता तब फिर घोषा भी ११ ११ पुरुषो से नियोग करके अपनी इच्छाओ की पूर्ति कर लेती और दस बारह संताने भी प्राप्त कर लेती , किन्तु वह विवाह करके पति और उस पति से उत्पन्न संतानों के लिए इतना संघर्ष क्यों करती ? )

✍️ शचींद्र शर्मा 


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