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Saturday, 8 November 2025

देश-काल के हिसाब से पाप-पुण्य बदल जाता है।

भारत में पश्चिम की परिभाषाएँ आप लागू नहीं कर सकते। देश-काल के हिसाब से पाप-पुण्य बदल जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं- जो यहाँ और अभी पुण्य है, वह अलग देश-काल में पाप हो सकता है। इतिहास इसे सिद्ध भी करता है। जो वेदों में नायक हैं, अहुर माज्दा में वही खलनायक बन जाते हैं। जो यहाँ देव हैं, वो कहीं दैत्य हैं। जो यहाँ दैत्य हैं, वो भी कहीं देव हैं। इसे और अच्छे से समझना हो तो आज इतिहास के पन्ने खोल देते हैं। प्राचीन भारत के इतिहास में गुप्तकाल को स्वर्णयुग का दर्जा दिया जाता है। लेकिन कई इतिहासकार इसे मलिन करना चाहते हैं। इसके लिए पश्चिम से लेकर आये सामंतवाद का सिद्धांत और इसे जबरदस्ती गुप्तकाल पर थोपने लगे। मैं ऐसी धारणा क्यों रखता हूँ, इसे विस्तार से स्पष्ट करता हूँ। सामंतवाद की बहस बहुत पुरानी है, लेकिन इसे वर्तमान संपूर्ण स्वरूप प्रदान किया फ्रांसीसी इतिहासकार मार्क ब्लॉख (Marc Bloch) ने। उन्होंने दो खंड में सामंतवाद पर ग्रंथ लिखा है। सामंतवाद की परिभाषा और उसके अनिवार्य तत्वों की जो विवेचना वो कर गये हैं, उसी को आधार बनाकर दुनिया भर के इतिहासकारों ने शब्द घिसे हैं। भारत में जिन इतिहासकारों ने गुप्तकाल में सामंतवाद खोज निकालने का उद्यम किया है, उन्होंने भी मार्क ब्लॉख का ही सहारा लिया है। आज मैं भी मार्क ब्लॉख की ही बात लेकर चलता हूँ।

मार्क ब्लॉख के अनुसार सामंतवाद का पहला और सबसे आवश्यक तत्व है- भूमि का वितरण फीफ (Fief) या रियासत के रूप में। यानी राजा भूमि इस शर्त पर किसी अधीनस्थ को देता है कि वह राजा के प्रति सैन्य और राजनीतिक वफादारी रखेगा। यह भूमि न केवल आय का साधन होती है, बल्कि उसके साथ कर व न्याय देने का अधिकार भी जुड़ा रहता है। इसी को ब्लॉख सामंती सत्ता का केंद्र मानते हैं। अब आइये इसे गुप्तकाल पर कसकर देखें। गुप्त काल में जो भूमि दान के प्रमाण हमें मिलते हैं, वे प्रायः धर्मार्थ दान या कर-छूट के रूप में होते हैं। राजा भूमि किसी ब्राह्मण, मठ, मंदिर या विद्या संस्थान को देता है, ताकि वह अपने धार्मिक कार्यों को सम्पन्न कर सके। इनका स्वभाव पूर्णतः परमार्थी और धार्मिक है, न कि सामंती या सैन्य। कहीं भी यह नहीं दिखता कि राजा ने किसी सैनिक अधिकारी को युद्ध सेवा के बदले भूमि दी हो और उसके बदले उससे निष्ठा की अपेक्षा रखी हो। और यही सबसे बड़ा अंतर है। यूरोप में भूमि फीफ थी- सैन्य अनुबंध का परिणाम। भारत में भूमि दान थी- पुण्य और धर्म का फल। यूरोप में राजा ने शक्ति बाँटी, भारत में राजा ने धर्म बाँटा। ब्लॉख के अनुसार दूसरा तत्व है- व्यक्तिगत वासल संबंध। यानी सामंती प्रभु और उसके अधीनस्थ के बीच निजी निष्ठा, जो अक्सर विरासत में चलती है। परंतु गुप्तकालीन भारत में राजा और अधिकारी का संबंध निजी निष्ठा पर नहीं, बल्कि राजकीय पदानुक्रम पर आधारित था। अधिकारी “राज्य का सेवक” था, किसी व्यक्तिगत सामंत का नहीं। गुप्तकाल के अभिलेखों में “महादण्डनायक”, “कुमारामात्य”, “उपरिक” जैसे पद मिलते हैं। ये सभी नियुक्त अधिकारी हैं, न कि भूमि-स्वामी या वासल। अब ब्लॉख का तीसरा तत्व- मनोवारित अर्थव्यवस्था (Manorial Economy)। यानी ग्रामीण कृषि उत्पादन के चारों ओर केंद्रित बंद अर्थव्यवस्था, जिसमें किसान भूमि से बंधा होता है, और अपनी श्रमशक्ति मैनर के स्वामी को देता है। यह यूरोप में स्पष्ट था, लेकिन भारत में नहीं। गुप्तकाल में नगर जीवन, व्यापार, सिक्कों का प्रचलन, दूरगामी वाणिज्य, सब फल-फूल रहे थे। वैशाली, उज्जैन, पाटलिपुत्र जैसे नगर सक्रिय थे। यह मनोरियल बंद अर्थव्यवस्था नहीं थी, बल्कि चलायमान, व्यापारिक और धार्मिक रूप से विविध जीवन था। ब्लॉख का चौथा तत्व बन्धुआ श्रम या सर्फडम (Serfdom) है। यानी किसान भूमि के साथ बंधा हुआ, अपने स्वामी की अनुमति के बिना कहीं नहीं जा सकता। लेकिन भारत में ऐसी बन्धन व्यवस्था नहीं थी। गाँवों के किसान अपने समुदाय के सदस्य थे, और ग्राम-सभाओं की अपनी स्वायत्तता थी। कर देना था, लेकिन वे गुलाम नहीं थे। “कृषक” शब्द यहाँ उत्पादक है, “सर्फ” नहीं। न्यायाधिकार और कराधिकार का विकेन्द्रीकरण भी नहीं मिलता है गुप्तकाल में। सैन्य निजीकरण भी नहीं है। गुप्तकालीन भारत में सेना का नियंत्रण राजा के अधीन था। चंद्रगुप्त द्वितीय, समुद्रगुप्त जैसे शासक स्वयं युद्धों का नेतृत्व करते थे, सामंतों की निजी सेनाएँ नहीं थीं। तो कुल मिलाकर देखिये, मार्क ब्लॉख द्वारा सामंतवाद के लिए निर्धारित लगभग सारे निर्णायक तत्व गुप्तकालीन भारत में अनुपस्थित हैं, लेकिन फिर भी कई इतिहासकारों का हठ है कि गुप्तकाल में सामंतवाद था ही।

यह सिर्फ एक उदाहरण है। ऐसे अनेकों उदाहरण मिलेंगे। इस वाले उदाहरण में संबंधित इतिहासकार कार्ल मार्क्स की ही अवधारणा पर तौल लिये होते तो हठ पालने की आवश्यक्ता समाप्त हो गयी होती। मार्क्स उत्पादकता के सिद्धांत (मोड ऑफ प्रोडक्शन) देते हैं। 4 मोड ऑफ प्रोडक्शन हैं। क्रमश: दासत्व (स्लेवरी), सामंतवाद (फ्यूडलिज्म), पूँजीवाद (कैपिटलिज्म) और साम्यवाद (कम्युनिज्म)। इस वर्गीकरण का आधार इनके नाम में ही स्पष्ट है- उत्पादन। यदि किसी समाज में उत्पादन का आधार सामंत है, तभी उसे सामंतवादी बताया जा सकता है। गुप्तकाल में उत्पादन का आधार कुछ भी हो, सामंत तो कहीं से नहीं था। यह बहुत बाद में स्पष्ट होता है। कम से कम गुप्तकाल के बाद से। लक्षणों की गहनता दिल्ली सल्तनत के बाद इतना बढ़ पाती है कि पश्चिम से आयातित सिद्धांत थोपे जा सकें। ठीक-ठीक ऐसी ही बातें सभी वादों पर लागू होती है। यूरोप में राष्ट्रवाद सरल है। भारत में जटिल। यूरोप में भाषाओं-बोलियों के आधार पर देश बँटे हैं। नस्लों के आधार पर देश बने हैं। भारत में 120 से अधिक तो ऐसी भाषाएँ हैं, जिन्हें कम से कम 10 हजार लोग बरत रहे हैं। बोलियाँ तो 20 हजार पर पहुँच जाती हैं। नस्लों में भी विविधता है। आर्य, द्रविड़, मंगोल सब एकसाथ मौजूद हैं यहाँ। इनमें भी इतने स्तर हैं। गंगा-यमुना के किनारे ही पर्याप्त विविधता उपस्थित है। बंगाल से हरियाणा तक की यात्रा में 4-5 स्तर तो बिना गौर किये मिल जायेंगे। कारण है कि भारत एक ऐसा बहुस्तरीय समाज है, जिसके हर स्तर में बहुत ज्यादा विविधता है। इसे प्याज से समझिये। प्याज में छिलके के बाद छिलका, स्तर के बाद स्तर रहता है। भारत भी एक प्याज है। चीजें मजेदार यहाँ पर हो जाती हैं कि कोई एक छिलका भी पूरी तरह से एक समान नहीं है। छिलका एक है, लेकिन उसमें गुण-धर्म एक (समान) नहीं हैं।

इतिहास में... प्राचीन इतिहास में, जिसका कुछ भी लिखा हुआ नहीं मिलता, इतिहास को खोदकर निकाला जाता है। यह खुदाई दो तरीके से होती है। एक है स्तरी खुदाई। इसमें ऊपर सतह से शुरू करते हैं और गहराई तक खोदते चले जाते हैं। इससे हमें प्याज के सारे छिलके मिलते जाते हैं, जिन्हें इतिहास में कालक्रम (क्रोनोलॉजी) कहा जाता है। दूसरा तरीका है क्षैतिज खुदाई का। इसे ऐसे समझिये कि कोई मैदान है और उसमें इंच दर इंच उखाड़ा जा रहा है। यह तभी होता है, जब स्तरी खुदाई में महत्वपूर्ण स्तर मिल जाते हैं। लेकिन भारत में इतिहास को सही से समझने के लिए पूरे देश को मैदान बनाकर इंच दर इंच छीलना होगा, जो संभव नहीं है। यही वर्तमान पर भी लागू है। बिहार समेत पूरा भारत मौजूदा स्तर पर भी प्याज है। यदि वर्तमान एक छिलका है, तो इस एक छिलके में ही स्थान के साथ गुण-धर्म बदल जा रहे हैं। कहीं-कहीं तो प्याज के ही गुण-धर्म विलोपित हो जा रहे हैं। मतलब- इसे एक डंडे से हाँका नहीं जा सकता, एक परिभाषा से समझा नहीं जा सकता, एक उदाहरण से बाँधा नहीं जा सकता।

तो जैसा वादा किया था। वादा था- पहली फुर्सत में प्याज छीलने का, और वास्तव में उसके बाद आज ही पर्याप्त समय मिल सका। और प्याज-इतिहास का सहारा लेकर यह सब इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि इतिहास की असली सीख घाव उजागर करने के लिए कहती है, छुपाने के लिए नहीं। मैंने बिहार के तीन उदाहरणों के जरिये बताया कि कैसे किसी प्रदेश की सीमित तस्वीर के आधार पर पूरी कहानी थोप दी जा सकती है। यही पूरे देश के बारे में कहा जा सकता है। मैंने उस पोस्ट में तीन महापुरुषों (अजय कानू, अनंत सिंह और दुलारचंद यादव) के उदाहरण से दिखाया कि बिहार में किस तरह सभी वादों पर सुविधावाद हावी है। सुविधा जात वाली। लेकिन क्या यह स्थिति सिर्फ बिहार तक सीमित है? क्या सिर्फ बिहार में जातिवाद है? क्या सिर्फ बिहार में ही चुनावों में जाति का मुद्दा रहता है? तीनों प्रश्नों का उत्तर है- नहीं। दिल्ली जैसा महानगर भी इससे बचा नहीं है। मैंने लंबा समय दिल्ली में व्यतीत किया है। दिल्ली विश्वविद्यालय की राजनीति को भीतर से देखा है। दिल्ली की महानगरीय और देहाती राजनीति को भी एकदम समीप से देखा है। दिल्ली विश्वविद्यालय को देश के श्रेष्ठ संस्थानों में गिना जाता है। निश्चित वहाँ औसत से बेहतर प्रतिभाएँ पहुँचती होंगी। उनका हाल है कि वोट देने में जात से लेकर मुफ्त की रेवड़ियाँ हावी हो जाती हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में उम्मीदवार तय करते समय तमाम संगठन जात फैक्टर को प्रमुखता से देखते हैं। दरअसल भारत एक प्याज है। इस एक प्याज के भीतर कई प्याज हैं। हर परत अलग हैं, जटिल हैं। हर छिलका संपूर्ण प्याज है। जो बात मैंने गुप्तकाल और सामंतवाद के उदाहरण में कही, वह सिर्फ पुरातन इतिहास पर लागू नहीं होती, आज के सामाजिक और राजनीतिक व्यवहार पर भी यही बात लागू होती है। इसके विश्लेषण-समीक्षा-आलोचना में हम उन इतिहासकारों जैसा हठ नहीं पाल सकते कि गुप्तकाल में कैसे भी सामंतवाद खोजना ही है। सबसे उचित उपाय है, सबसे पहले निर्णय पर नहीं पहुँच जाना। निर्णय सबसे बाद का चरण है। उसके बाद कुछ नहीं बचता। हम हठ या अहंकार में (कई बार भ्रम में) इसी से आरंभ करते हैं।
(तस्वीर चैटजीपीटी की मदद से बनायी गयी है।)
✍️सुभाष सिंह सुमन 

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