अयोध्या की पवित्र नगरी में बहुत समय पहले एक दिव्य ध्वज फहराया करता था। उस ध्वज पर तीन पवित्र चिन्ह अंकित थे — ॐ, सूर्य, और एक अनोखा वृक्ष कोविदार.
यह ध्वज भगवान राम के राज्य की मर्यादा, तेज और धर्म का प्रतीक माना जाता था.
समय बीतता गया, युग बदले, राज बदले, और इतिहास की धूल में वह ध्वज कहीं खो गया. लोग बस कहानियों में उसका उल्लेख सुनते, पर असली ध्वज कब और कैसे विलीन हो गया, कोई नहीं जानता था.
शताब्दियों बाद, जब राम मंदिर का पुनर्निर्माण चल रहा था, तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी. मंदिर के प्राचीन गर्भगृह के पास खुदाई के दौरान एक पुरानी तांबे की पेटी मिली. पेटी इतनी जर्जर थी कि कोई भी उसके भीतर क्या होगा, अनुमान नहीं लगा पा रहा था.
जब उसे धीरे-धीरे खोला गया, भीतर से हल्की-हल्की केसरिया धूल उड़ी. उसी धूल में लिपटा था — पुराना, किंतु अब भी जीवित — रामराज्य का ध्वज!! 🙏
उस कपड़े पर धुंधली रेखाओं से उभर रहा था ॐ का चिन्ह, सूर्य की प्रभा, और कोविदार वृक्ष की आकृति, ऐसा लगा मानो सदियों से चुप रहा इतिहास स्वयं अपना स्वर पाकर बोल उठा हो.
मंदिर के आचार्यों, पुरातत्वविदों और विद्वानों ने मिलकर उसकी जाँच की.... शास्त्रों और प्राचीन वर्णनों से मिलान हुआ, यह वही ध्वज था, जिसका उल्लेख रामायणकालीन विवरणों में मिलता है.
अयोध्या में उस दिन उत्सव जैसा माहौल था, लोगों की आँखें नम थीं, हृदय आनंद से भरे हुए थे. भगवान राम के मंदिर को उसका प्राचीन ध्वज मिल चुका था, वह ध्वज जो समय की गहराइयों में खो गया था और अब पुनः अपनी जन्मभूमि लौट आया था.
जब नवस्थापित मंदिर के शिखर पर वह ध्वज फहराया गया, पूरे अयोध्या में मंत्रों की गूँज फैल गई...ऐसा लगा जैसे युगों से प्रतीक्षा करता हुआ इतिहास फिर से जीवित हो उठा हो ।
( मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी विक्रम संवत २०८२, मंगलवार)
दिनांक 25 नवंबर 2025 को यह ध्वज राममंदिर के नवनिर्मित शिखर पर सम्मान के साथ फहराया गया।
वयं राष्ट्रे जागृयाम
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