मैं मुस्कुराया।
क्योंकि मैं बहुधा वही करता हूँ जिसकी किसी को आशा नहीं होती।
क्विक शिट, क्विक बाथ, देवताओं को गन्ध-उत्कोच, ऐंड अ हॉट कप ऑफ टी। सोचा कि दो घण्टों का थोड़ा आराम कर लूँ
तो अ क्विक ट्रिप ऑफ नेटिव विलेज भी पॉसिबल है
किन्तु...
थके शरीर की भी अपनी विवशता होती है और मन का हठ हर बार नहीं चल पाता। लेटा तो नींद आ गयी।
सचल दूरभाष यन्त्र से आती सङ्गीत ध्वनि ने निद्रा में व्याघात किया।
देखा तो एक परम सुहृद थे। समय देखा तो मैं अपने मन में बनाये समयसारिणी से डेढ़ घण्टे च्युत था।अब गाँव जाने का लाभ नहीं। तो यदि गाँव नहीं जाना तो फिर क्यों न सो ही लिया जाय? और यदि सोना है तो फोन उठाने से नींद टूटेगी।
अवॉयड।
सोना चाहे संज्ञात्मक रूप में हो या क्रियात्मक रूप में, मेरे भाग्य में नहीं। अगला फोन मेरे बॉस का था जिसे अवॉयड नहीं किया जा सकता था।
क्वेश्चंस फ्रॉम अदर साइड,
आंसर्स फ्रॉम दिस साइड,
ऐट लीस्ट फ़ॉर टेन मिनट्स
और फिर एक प्रश्न - तिवारी जी आप सो रहे थे क्या?
येस सर!
तो मैं बाद में फोन करता हूँ।
बंदा शराफत की सीमा में भी बद्तमीज है तो -
अब तो जाग गया सर। और कोई बात हो तो बताइये।
नहीं नही। आप आराम करिये। मैं बाद में करता हूँ।
अरे सर अब तो जाग ही गया। आप बताइये।
अस्तु। निबटा किसी तरह।
मैं किसी कॉल को परिस्थिति वश नजरअंदाज कर दूँ तो कर दूँ, कॉल बैक जरूर करता हूँ। तो उन महानुभाव को फोन मिलाया।
नो रिस्पॉन्स।
अगला व्यस्त होगा कहीं।
पाँच मिनट बाद उधर से फिर ट्रिंग ट्रिंग। उठाया। बातें और बातों के बीच एक प्रश्न - भैया शक्ति पीठों के सम्बंध में कुछ जिज्ञासा है।
अरे य्यार! छोड़ चुका मैं यह सब। गधों को पंजीरी खिलाने की जो बेवकूफी मैंने की उसका समुचित प्रतिदान मिल चुका है मुझे। किन्तु अपनों हेतु मुझे कुछ भी अदेय नहीं है अतः -- ---
मैं अपने आलेखों में प्रत्येक बार कुछ संकेत छोड़ता हूँ। लोग समझते नहीं और समझाने जैसे कृत्य से मैं स्वयं को बचाता रहता हूँ। मैंने शाक्त सम्प्रदाय के मूल बीज का अनेकों बार ढँके-छिपे शब्दों में अनावरण करने का प्रयास किया है किन्तु
कथा-कहानी लिखने वाला बीज-मन्त्रों के बारे में लिखने का दुस्साहस कैसे कर सकता है? यह तो बस वे कर सकते हैं जो कुल-परम्परा से गुरु विरुद आहरित करते गर्दभों के शिष्य हैं।
- आगे वर्णमालिनी का संकेत -
साभार - त्रिलोचन नाथ तिवारी
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