भगवती का एक नाम वर्णमालिनी भी है। अ से ले कर क्ष तक के वर्णों की माला का सुमेरु है क्ष। कुल कितने वर्ण हुए? इक्यावन। और शक्तिपीठ कितने हैं? वे भी इक्यावन। आप कहोगे कि पीठ और भी हैं और एक सौ आठ तक जाते हैं किन्तु भैये! इक्यावन के बाद वाले वे उपपीठ हैं, पीठ नहीं। अब अन्धे सियार को तो बरगद का गोदा भी पकवान ही लगता है तो हम निरीह सियारों को तो उपपीठ भी पीठ ही है भले उप हो।
कुछ उदाहरण देना चाहूँगा जो गोरुओं के चइलो को ज्ञात नहीं होगा और प्रथम है कामरूप पीठ!
सती की योनि का जहाँ पात हुआ, वहाँ कामरूप नामक पीठ हुआ, वह 'अकार' का उत्पत्तिस्थान एवं श्रीविद्या से अधीष्ठित है। यहाँ कौलशास्त्र से अणिमादि सिद्धियाँ सिद्ध होती हैं। योनि क्षेत्र पर पाये जाने वाले लोम से उत्पन्न इसके वंश नामक दो उपपीठ भी हैं जहाँ शाबर मन्त्रों की सिद्धि होती है।
कुछ समझे?
कामरूप पीठ अ वर्ण का उत्पत्ति स्थल घोषित है और इसके दो उपपीठ भी हैं। मने एक के साथ चाहो तो तीन गिनो।
और यह अ वर्ण का उत्पत्ति क्षेत्र है।
तो शुरू हो गयी अपनी देवनागरी लिपि की संस्कृत वर्णमाला यहाँ से।
स्तनों के पतनस्थल में काशिकापीठ
हुआ और वहाँ से “आ" कार उत्पन्न हुआ जहाँ देहत्याग करने से मुक्ति प्राप्त होती है। और सती के स्तनों से दो धाराएँ निकलीं, जो असी और वरणा नामक नदी हो गयीं। असी के तीर पर दक्षिण सारनाथ उपपीठ है एवं वरणा के उत्तर में उत्तर सारनाथ उपपीठ है, जहाँ क्रमश: दक्षिण एवं उत्तर मार्ग के मन्त्रों की सिद्धि होती है।
एक काशिका पीठ के साथ दो और गिन लो। और "आ" की उत्पत्ति यहाँ सिद्ध है यह दुहराने की आवश्यकता है क्या?
जहाँ गुह्मभाग पतित हुआ वहाँ नेपालपीठ हुआ, वहाँ से 'इकार' की उत्पत्ति हुई। वह पीठ वाममार्गं का मूलस्थान है।
अ, आ, इ।
क्रम क्ष तक चलेगा।
भिन्न-भिन्न वर्णों की शक्तियाँ और देवता भिन्न हैं इसीलिये उन-उन वर्णों, पीठों, शक्तियों एवं देवताओं का परस्पर सम्बन्ध है।
माया द्वारा ही परब्रह्म से विश्व की सृष्टि होती है। सृष्टि हो जाने पर भी उसके विस्तार की आशा तब तक नहीं होती, जब तक चेतन पुरुष की उसमें आसक्ति न हो। अतएव, सृष्टि-विस्तार के लिये काम की उत्पत्ति हुई। रज:सत्व के सम्बन्ध में द्वैतसृष्टि का विस्तार होता है, परन्तु
तम कारण रूप है, वहाँ द्वैत दर्शन की कमी से मोह की कमी होती है। सत्वमय सूक्ष्म-कायरूप विष्णु एवं रजोमय स्थूलकायरूप ब्रह्मा के मोहित हो जाने पर भी कारणात्मा शिव मोहित नहीं होता।
परन्तु जब तक कारण में भी मोह नहीं, तब तक सृष्टि की पूर्ण स्थिति नहीं होती।
इसीलिये स्थूल-सूक्ष्म कायचैतन्यों की ऐसी रुचि हुई कि कारण चैतन्य भी मोहित हो परन्तु वह तो अघटित घटनापटीयसी महामाया के ही वश को बात है।
स्वाधीनभर्तृका स्त्री (जिसका पति उसके वश में हो) ही परम सौभाग्यशालिनी होती है। महामाया ने शिव को स्वाधीन कर लिया, फिर भी पिता द्वारा पति का अपमान होने पर उसने उस पिता से सम्बन्धित शरीर को त्याग देना उचित समझा।
महाशक्ति का शरीर उसका लीलाविग्रह ही है। जैसे निर्विकार चेतन शक्ति के योग से साकार एक विग्रह धारण करता है, वैसे ही शक्ति भी अधिष्ठान चेतनयुक्त हो साकार विग्रह धारण करती है।
इसीलिये शिव-पार्वती दोनों मिलकर अर्द्धनारीश्वर के रूप में व्यक्त होते हैं। अधिष्ठान चेतन सहित महा-शक्ति का उस लीलाविग्रह सती-शरीर से तिरोहित हो जाना ही सती का मरना है।
हींग के समाप्त हो जाने पर भी उसकी डिब्बी में हींग की गन्ध रची-बसी होती है।
संस्कृत वर्णमाला के वर्ण शाक्त सम्प्रदाय के बीज-मंत्र भी हैं। एकाक्षर कोश, मातृका निघण्टु, वर्ण निघण्टु, वर्णबीजकोश आदि में इनके रहस्यों का सङ्केत दिया हुआ है यदि तुम पढ़ो, यदि तुम समझो।
वामाक्षि का अर्थ इ होता है।
जिस स्थान पर सती का वाम नेत्र गिरा वहाँ इकार सिद्धि होती है। बात उल्टी है #मूर्ख। जहाँ इकार सिद्धि होती है वहाँ सती के वाम नेत्र के पतन की कथा रची गयी।
वर्णबीजकोश के अनुसार वामकर्ण का अर्थ ऊ है, वामकंकण का अर्थ ज है, वामकरोटिका का अर्थ द है, वामकपोल का अर्थ लृ है। और ऐसे ही अन्यान्य भी हैं।
अब स्वयं विचार करो कि सती के इन अङ्गों एवं इन आभरणों का पातस्थल कहाँ है, उन शक्तिपीठों का नाम क्या है, उनका तान्त्रिक महत्व क्या है, अन्यथा बीस बाइस हजार खर्च कर के जय माता दी बोलते स्वरभंग करके लौट आओ, माता क्या मना करती है?
काली कर्पूर स्तोत्र सम्बंधित शृंखला में ऐसे कई रहस्य बताया मैने, किन्तु तुम ठहरे भालू के गुह। लम्बा आलेख है, कौन पढ़े? पढ़े तो पढ़े, समझे तो भालू के अब्बा जान।
लिखना तो बड़ी बात है, क्या लिखूँ यह सोचना उससे भी बड़ी, यहाँ तो लिखने के बारे में ही सोचना अपराध सा प्रतीत होता है। सो, सभी इक्यावन पीठों का रहस्य लिखने भर का न समय है, और न ही मन ही है।
सूत्र दे दिया है, शेष आप खोज लो और लिख लो। समाहार यह है कि हमारी संस्कृत वर्णमाला के
अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ऋ, ऋ, ॠ, लृ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ: |
क, ख, ग, घ, ङ।
च, छ, ज, झ, ञ।
ट, ठ, ड, ढ़, ण।
त, थ, द, ध, न।
प, फ, ब, भ, म ।
य, र, ल, व, श, ष, स, ह,
और माला का सुमेरु क्ष,
इसी माला के आधार पर सती के भिन्न-भिन्न अङ्गों का पात #कल्पित हुआ है। एत्तावता हमारे भारतवर्ष की भूमि वर्ण-समाम्नायस्वरूप ही है, यही सती-प्रसंग का मूल रहस्य है।
इसी कारण कहता हूँ -
भले शुद्ध न बोलो,
किन्तु शुद्ध लिखो अवश्य! अन्यथा सती के अङ्गों का अपमान होता है जिसका पातक तुमको जन्म-जन्मान्तर तक शान्ति नहीं लेने देगा।
इस आलेख के आधार पर कुछ लोग पॉडकास्ट करेंगे, कुछ लोग सभाओं में व्याख्यान दे कर पुरस्कृत होंगे, कुछ लोग निबन्ध या अन्य आलेख लिख कर यश एवं धन का अर्जन करेंगे, किन्तु मुझे क्या? मुझे तो महामाया द्वारा प्रेरित प्रत्यूर्जता (एलर्जी) वश छींक आ गयी, नासा से श्लेष्मा-पात हुआ, जो मैंने छिनक कर इस भित्ति पर पोंछ दिया, जैसे गोली खेलता कोई बच्चा नाक छिनक कर दीवार पर पोंटा पोंछ देता है।
प्रमोद सिंह और मधुसूदन उपाध्याय को उनके आने वाले जन्मदिन की शुभकामनाओं सहित, क्योंकि उनके जन्मदिन पर मुझे कुछ लिख सकने भर का समय नहीं होगा,
और योगी अनुराग से क्षमा याचना कि राजकीय व्यस्तता के कारण मैं उनके अनुरागपूर्ण निमंत्रण का मान रख रखने में अक्षम हूँ,
वर्णमालिनी का कृपाकांक्षी
साभार - त्रिलोचन नाथ तिवारी
वयं राष्ट्रे जागृयाम
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