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Saturday, 25 April 2026

सिंदूर चोला चढ़ाने का शास्त्रीय विधि-विधान

बाबा हनुमान जी को चोला चढ़ाने की शास्त्रोक्त विधि -
हनुमान जी को चोला चढ़ाना उनकी भक्ति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावी अंग माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इसे पूरी श्रद्धा और पवित्रता के साथ करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।

01... आवश्यक सामग्री

चोला चढ़ाने से पहले इन सामग्रियों को एकत्रित कर लें:
सिंदूर: अच्छी गुणवत्ता वाला नारंगी सिंदूर (चमेली के तेल में मिलाने वाला)।
चमेली का तेल: शुद्ध चमेली का तेल।
चांदी का वर्क: हनुमान जी की प्रतिमा पर लगाने के लिए।
जनेऊ: एक नया जनेऊ।
वस्त्र: लाल या पीला लंगोट या धोती।
पुष्प: लाल गुलाब या गेंदे के फूल और तुलसी दल (अनिवार्य)।
प्रसाद: बूंदी के लड्डू, चने-गुड़ या इमरती।

02.. पूर्व तैयारी
दिन का चयन: मंगलवार या शनिवार का दिन सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। हनुमान जयंती या विशेष पर्वों पर भी इसे किया जा सकता है।
शुद्धि: स्वयं स्नान करके साफ वस्त्र (लाल या पीले) धारण करें।
संकल्प: मंदिर में हनुमान जी के सम्मुख बैठकर हाथ में जल लेकर अपना नाम, गोत्र और अपनी मनोकामना बोलते हुए संकल्प लें।

03..चोला चढ़ाने की मुख्य विधि

प्रतिमा की सफाई: सबसे पहले हनुमान जी की प्रतिमा को गंगाजल या साफ जल से स्नान कराएं। यदि पहले से चोला चढ़ा हुआ है, तो उसे आदरपूर्वक साफ करें।
मिश्रण तैयार करना: एक पात्र में चमेली का तेल और सिंदूर मिलाएं। ध्यान रहे कि मिश्रण न बहुत गाढ़ा हो और न बहुत पतला।
लेपन (चोला चढ़ाना): * हनुमान जी के चरणों से लेपन शुरू करें और धीरे-धीरे ऊपर की ओर (सिर तक) जाएं।
लेपन करते समय "ॐ हं हनुमते नमः" या हनुमान चालीसा का निरंतर जाप करें।
चांदी का वर्क: लेपन के बाद पूरी सावधानी से प्रतिमा पर चांदी का वर्क लगाएं।
वस्त्र धारण: इसके बाद प्रभु को जनेऊ और लंगोट (वस्त्र) अर्पित करें।
श्रृंगार: अब पुष्प माला पहनाएं और मस्तक पर अक्षत (चावल) व फूल चढ़ाएं। तुलसी दल चरणों में और हृदय पर अवश्य रखें।

हनुमान प्रतिमा पर चोला चढ़ाने का उचित क्रम 

हनुमान जी को चोला चढ़ाते समय चरणों का क्रम अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, भक्ति और शरणागति के भाव से हमेशा प्रभु के दाएं चरण (Right Foot) से शुरुआत करनी चाहिए।

चोला चढ़ाने की दिशा हमेशा नीचे से ऊपर (Bottom to Top) होनी चाहिए:
चरण (दायां → बायां) ⤏ आधार और शक्ति
मध्य भाग (कमर और वक्ष) ⤏ भक्ति और सेवा
शीर्ष (मुख और मस्तक) ⤏ ज्ञान और तेज

क्रम शरीर का अंग आध्यात्मिक महत्व / भाव

१ दायां चरण (Right Foot)
 सर्वप्रथम दाएं अंगूठे और पंजे से शुरुआत करें (शक्ति का उदय)।

२ बायां चरण (Left Foot) फिर बाएं पंजे पर लेपन करें (पूर्ण शरणागति)।

३ पिंडलियाँ (Calves) चरणों से ऊपर बढ़ते हुए दोनों पिंडलियों पर लेपन करें। यह प्रभु की तीव्र गति और अटूट शक्ति का प्रतीक है।

४ घुटने (Knees) पिंडलियों के बाद घुटनों पर लेपन करें।
५ कटि (कमर) कमर के भाग पर लेपन करें (धैर्य और संयम का केंद्र)।

६ वक्षस्थल (Chest) हृदय भाग पर लेपन करते समय ध्यान करें कि वहां प्रभु श्री राम बसते हैं।

७ भुजाएं व गदा दोनों भुजाओं और उनके शस्त्र 'गदा' पर लेपन करें।

८.मुख मंडल (चेहरा) अंत में प्रभु के मुख, ठुड्डी और मस्तक पर सिंदूर लगाकर पूर्ण श्रृंगार करें 

९.नेत्र आँखों को बहुत सावधानी से छोड़ दें या उन पर केवल हल्का स्पर्श करें ताकि स्वरूप स्पष्ट रहे।

१०...चोला चढ़ाने की दिशा हमेशा नीचे से ऊपर (Bottom to Top) होनी चाहिए:
चरण (दायां → बायां) ⤏ आधार और शक्ति
मध्य भाग (कमर और वक्ष) ⤏ भक्ति और सेवा
शीर्ष (मुख और मस्तक) ⤏ ज्ञान और तेज

विशेष सुझाव
गदा: यदि प्रतिमा में गदा अलग से है या हाथ में है, तो उस पर भी सिंदूर का लेपन करना चाहिए, क्योंकि वह उनकी शक्ति का आयुध है।

पुष्प अर्पण: चोला पूर्ण होने के बाद, चरणों में दाएं चरण पर विशेष रूप से गुलाब का पुष्प या तुलसी दल अर्पित करें।

शनि बाधा मुक्ति: यदि आप शनि दोष निवारण के लिए चोला चढ़ा रहे हैं, तो बाएं पैर के अंगूठे पर सिंदूर लगाते समय विशेष ध्यान और प्रार्थना करें।

04... आरती और भोग
चोला चढ़ाने के बाद धूप-दीप प्रज्वलित करें।
प्रसाद (लड्डू या गुड़-चना) का भोग लगाएं।
हनुमान जी की आरती करें और अंत में क्षमा प्रार्थना करें कि पूजा में कोई त्रुटि हुई हो तो प्रभु उसे क्षमा करें।

05.. क्षमा प्रार्थना 
बिना क्षमा प्रार्थना के:
   पूजा “पूर्ण” नहीं मानी जाती
  क्षमा प्रार्थना करने से:
छोटी-बड़ी त्रुटियाँ स्वतः क्षम्य हो जाती हैं
पूजा का फल पूर्ण रूप से मिलता है

क्षमा प्रार्थना मंत्र 

कायेन वाचा मनसेंद्रियैर्वा  
बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतिस्वभावात्।
करोमि यद्यत् सकलं परस्मै  
नारायणाय इति समर्पयामि॥

 अर्थ --मैं अपने शरीर, वाणी, मन, इंद्रियों, बुद्धि या स्वभाव से जो भी कर्म करता हूँ — वह सब भगवान नारायण को समर्पित करता हूँ।

06.. महत्वपूर्ण नियम (सावधानियां)

ब्रह्मचर्य: चोला चढ़ाने वाले व्यक्ति को उस दिन (और संभव हो तो एक दिन पूर्व भी) पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
सात्विकता: मांस, मदिरा या तामसिक भोजन का त्याग अनिवार्य है।
सूतक-पातक: सूतक या पातक की अवस्था में चोला न चढ़ाएं।
निषेध: शास्त्रों के अनुसार, स्त्रियों को हनुमान जी को स्पर्श करके चोला नहीं चढ़ाना चाहिए; वे दूर से दर्शन कर पूजन सामग्री अर्पित कर सकती हैं।
इस विधि से किया गया पूजन हनुमान जी की असीम कृपा और मानसिक शांति प्रदान करता है।

#बाबा_हनुमान जी को सिन्दूर चढ़ाने का वैदिक मंत्र 

ॐ सिन्धोरिव प्राध्वने शूघनासो वातप्रमियः पतयन्ति यह्वाः।
घृतस्य धारा अरुषो न वाजी काष्ठा भिन्दन्नूर्मिभिः पिन्वमानः॥
सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम्।
शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम्॥

ॐ भूर्भुवः स्वः हनुमते नमः, सिन्दूरं समर्पयामि।

इसके अतिरिक्त कुछ सरल मंत्रों इनका भी प्रयोग कर सकते 

१.ॐ नमो भगवते आंजनेयाय महाबलाय नमः।
२.ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय रामदूताय स्वाहा।
३.ॐ हं हनुमते नमः (सरल बीज मंत्र)

#बाबा_हनुमान जी को सिन्दूर चढ़ाने का साबर मंत्र 

ॐ नमो सिद्ध हो सिन्दूर कहां से आया, सुमेरु पर्वत से आया,
कौन ले आया, गौरी के पुत्र गणेश जी ले आया,
किस पे चढ़ाया, वीर हनुमान पे,
ॐ सिन्दूर महा सिन्दूर घी तेल से तिलक करे
दुश्मन को मार हटावे बारा बरस के वीर हनुमान
हाथ में लड्डू मुख में पान, जो इस बालक की पूजा मेटे,
राजा मेटे राज से जाय, परजा मेटे धन सम्पत से जाय,
घट में खाय मसान में रहे रक्षा करे अंजनी माई
बारा बरस के वीर हनुमान ।

#किस प्रकार की प्रतिमाओं को सिंदूर चढ़ाया जाता है।

हनुमान जी की प्रतिमा पर सिंदूर (चोला) चढ़ाने की परंपरा के पीछे गहरे शास्त्रोक्त और वैज्ञानिक कारण हैं। लेकिन हर धातु या पत्थर की प्रतिमा पर सिंदूर नहीं चढ़ाया जाता।

यहाँ प्रतिमाओं के प्रकार और उन पर चोला चढ़ाने के जानकारी का विवरण नीचे दिया जा रहा है 

१. किस प्रकार की प्रतिमा पर चोला चढ़ाया जाता है?

शास्त्रों के अनुसार, चोला मुख्य रूप से पाषाण (पत्थर) और मिट्टी की प्रतिमाओं पर चढ़ाया जाता है:

शिलारूप (पत्थर): अधिकांश प्राचीन और सिद्ध मंदिरों में हनुमान जी की पत्थर की प्रतिमा होती है। पत्थर सिंदूर और चमेली के तेल को सोखने की क्षमता रखता है, जिससे प्रतिमा सुरक्षित रहती है और उसका तेज बढ़ता है।

मिट्टी या लेप की प्रतिमा: कई स्थानों पर गोबर, मिट्टी या विशेष औषधियों से बनी प्रतिमाएं होती हैं, जिन पर सिंदूर का लेप करना अनिवार्य माना जाता है ताकि वे खंडित न हों।

२. धातु की प्रतिमाओं के लिए नियम
धातु की प्रतिमाओं पर चोला चढ़ाने के नियम अलग होते हैं:
अष्टधातु, पीतल, तांबा या चांदी: इन धातुओं की प्रतिमाओं पर गाढ़ा सिंदूर (चोला) नहीं चढ़ाया जाता। चमेली के तेल और सिंदूर का लेप धातु को खराब कर सकता है या उस पर काई (oxidation) जमा सकता है।
विधि: धातु की प्रतिमा होने पर केवल एक छोटा सा सिंदूर का तिलक लगाया जाता है या उनके चरणों में सिंदूर अर्पित किया जाता है।

३. प्रतिमाओं का वर्गीकरण और फल
(प्रतिमा का प्रकार विवरण फल और महत्व)

सिंदूरी प्रतिमा--
 वह प्रतिमा जो पूरी तरह सिंदूर से ढकी हो। यह 'उग्र' और 'सक्रिय' स्वरूप है, जो बाधाओं के नाश के लिए उत्तम है।
इन पर सिंदूर चढ़ाया जाता है 

स्वयंभू प्रतिमा
 जो पत्थर प्राकृतिक रूप से हनुमान जी की आकृति लिए हो। यहाँ चोला चढ़ाना अत्यंत फलदायी है (जैसे सालासर या मेहंदीपुर बालाजी)।

संगमरमर (White Marble) सफेद पत्थर की प्रतिमा। 
इन पर चोला नहीं चढ़ाया जाता, केवल तिलक लगाया जाता है। यह शांति का प्रतीक है।

चित्रपट (फोटो): कागज़ या कपड़े के चित्र पर कभी भी चोला या तेल नहीं चढ़ाना चाहिए, केवल सूखा सिंदूर स्पर्श कराया जा सकता है।

काष्ठ (लकड़ी) प्रतिमा-- लकड़ी से बनी आकृति

(सामान्यतः काष्ठ (लकड़ी) की प्रतिमाओं पर सिंदूर नहीं चढ़ाया जाता, क्योंकि इससे लकड़ी के खराब होने या उसमें नमी आने का डर रहता है। हालांकि, भारतीय परंपराओं में इसके कुछ अपवाद और विशेष तरीके भी हैं:
1. शास्त्र और परंपरा
अधिकतर लकड़ी की मूर्तियों (जैसे चंदन या अन्य पवित्र लकड़ियाँ) पर चंदन का लेप या अत्तर लगाना शुभ माना जाता है। सिंदूर का प्रयोग आमतौर पर पत्थर या धातु की प्रतिमाओं पर अधिक होता है।
2. अपवाद: भगवान जगन्नाथ की मूर्ति
पुरी के भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियाँ "दारु" (नीम की लकड़ी) से बनी होती हैं। इन पर सीधा सिंदूर या जल नहीं चढ़ाया जाता। इसके बजाय, उन पर विशेष रंगों और लेप (श्रीअंग फिटा) का उपयोग किया जाता है, जो लकड़ी को सुरक्षित रखते हैं।
3. सुरक्षा के उपाय
यदि किसी विशेष परंपरा के कारण लकड़ी की मूर्ति पर सिंदूर लगाना अनिवार्य हो, तो ये बातें ध्यान में रखी जाती हैं:
सूखा सिंदूर: गीले सिंदूर की जगह सूखे सिंदूर का तिलक लगाया जाता है।
तेल का आधार: कुछ स्थानों पर चमेली के तेल में सिंदूर मिलाकर लगाया जाता है (जैसे हनुमान जी की लकड़ी की मूर्तियों पर), लेकिन यह लंबे समय में लकड़ी को काला कर सकता है।
सुरक्षा परत: मूर्ति पर पहले से ही वार्निश या प्राकृतिक तेल (जैसे अलसी का तेल) की कोटिंग हो, तो लकड़ी सुरक्षित रहती है।)
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#शास्त्रोक्त कारण: सिंदूर क्यों?

पौराणिक कथा: 
माता सीता को मांग में सिंदूर भरते देख हनुमान जी ने पूछा था कि वे ऐसा क्यों करती हैं। माता ने कहा कि इससे श्री राम की आयु बढ़ती है और वे प्रसन्न होते हैं। तब हनुमान जी ने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लिया ताकि उनके प्रभु सदैव प्रसन्न रहें।

वैज्ञानिक कारण:
 प्राचीन काल में प्रतिमाएं विशेष पत्थरों की होती थीं। चमेली का तेल और सिंदूर मिलकर एक सुरक्षा कवच (Protective Layer) बनाते हैं, जो पत्थर को नमी, दरारों और क्षरण (erosion) से बचाता है।

. विशेष ध्यान देने योग्य बातें
दक्षिणामुखी हनुमान: जिस प्रतिमा का मुख दक्षिण दिशा की ओर हो, उस पर चोला चढ़ाना विशेष रूप से शत्रुओं पर विजय दिलाने वाला माना जाता है।
पंचमुखी हनुमान: यदि प्रतिमा पंचमुखी है, तो पांचों मुखों पर सिंदूर अर्पण का विशेष विधान है।

 यदि आपके घर में पीतल या चांदी की छोटी प्रतिमा है, तो आप केवल तिलक लगाएं। यदि मंदिर में पत्थर की बड़ी प्रतिमा है, तो ही ऊपर बताई गई विधि से पूर्ण चोला चढ़ाएं।

#सिंदूरी वर्ण हनुमान स्तुति 

सिन्दूरारुणविग्रहं त्रिनयनं मणिकुण्डलशोभितम्।
रामदूतं महावीर्यं वन्देऽहं मारुतात्मजम्॥

सिन्दूरलेपनप्रियं भक्ताभीष्टफलप्रदम्।
सीताशोकविनाशाय नमोऽस्तु पवनात्मज॥

लक्ष्मणप्राणदाता त्वं राघवस्य प्रियं सखा।
सिन्दूरकान्तिदेहाय नमस्ते कपिनायक॥

अञ्जनासुत वीराय रुद्रांशाय नमो नमः।
सिन्दूररूपधारिणे सर्वमङ्गलदायिने॥

  भावार्थ --
 जो सिंदूर से अरुण (लाल) आभा वाले हैं,
 जो श्रीराम के दूत, महावीर और भक्तों की इच्छा पूर्ण करने वाले हैं,
जो माता सीता के शोक का नाश करते हैं,
उन सिंदूरी स्वरूप वाले हनुमान जी को नमन।

 सिंदूरवर्ण हनुमान पद्य स्तुति 

१।
सिंदूर-वर्ण तनु, तेजोमय, त्रिभुवन में ज्योति पसारे।
रामदूत महावीर हनुमत, चरणन में शीश हमारे॥

२।
लाल ललाट ललित ललाम, भक्तों के हितकारी हो।
सीता-दुख हरने वाले, संकट-भंजनकारी हो॥

३।
सिंदूर-चोला अति प्रिय जिनको, मंगलमय तन धारी।
भक्तन की हर इच्छा पूरण, दीनन के हितकारी॥

४।
अंजनि-सुत रुद्रांश बलशाली, लंका दहन कर डाली।
राक्षस दल कंपित कर डारे, गूँजी जय-जय काली॥

५।
लक्ष्मण प्राण-प्रदाता तुम हो, राम हृदय के प्यारे।
सुग्रीव सखा, धर्म रक्षक, संकट हरन हमारे॥

६।
सिंदूर-आभा से दीप्तिमान, दिव्य सुगंध लुटाते।
जहाँ-जहाँ तुम चरण धरते, मंगल वहाँ बसाते॥

७।
शत्रु विनाशक, भय हरने वाले, दुख-दलन सुखकारी।
त्रिलोक रक्षक, पवनसुत वीर, जय-जय कपीश मुरारी॥

८।
ब्रह्म-विष्णु-शिव स्वरूप तुम्हीं, भक्तों के रखवाले।
सिंदूरी रूप धरे प्रभु तुम, सब संकट टाले॥

९।
मस्तक रक्षो सिंदूरधारी, नेत्रन में बल दीजो।
कर्णन में शुभ श्रुति बसाओ, वाणी मधुर कर दीजो॥

१०।
मुख रक्षो राम-नाम से, जिह्वा हरि-गुण गावे।
कंठ सदा जयकार करे, भय पास न आवे॥

११।
भुजबल दे कर वीर बनाओ, हस्तन में शक्ति बसाओ।
वक्षस्थल में राम बसाओ, हृदय भक्ति उपजाओ॥

१२।
नाभि कटि में धैर्य धराओ, ऊरू में बल भर दीजो।
जानु-जंघा गति अचल बनाओ, पग-पग विजय कर दीजो॥

१३।
सर्व अंग में रक्षा करिहो, सिंदूरी तनधारी।
कवच बनो चारों ओर सदा, संकट हरनहारी॥

१४।
पूर्व दिशा में वीर तुम्हीं हो, दक्षिण पावन राखो।
पश्चिम में रामदूत बनकर, उत्तर कपीश संभालो॥

१५।
ऊर्ध्व अधो सब ओर तुम्हारा, दिव्य कवच छाया है।
जहाँ स्मरण हो नाम तुम्हारा, वहाँ सुख ही आया है॥

१६।
जो यह पाठ करे श्रद्धा से, संकट दूर हो जाए।
संपत्ति, सुख, शांति मिले, जीवन सफल बन जाए॥

सिंदूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम्।
शुभदं कामदं चैव सिंदूरं प्रतिगृह्यताम्॥

।। जय श्री राम, जय हनुमान ।।
_पुखराज मेवाड़ा बनी के बालाजी 
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जय मां जय बाबा महाकाल जय श्री राधे कृष्ण अलख आदेश 🙏🏻

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