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Saturday, 25 April 2026

बिना ईश्वर के नाम के यह जीवन 'मिट्टी' के समान है।

एक समय की बात है, एक प्रतापी राजा अपने लाव-लश्कर के साथ नगर भ्रमण पर निकले थे। चलते-चलते उनकी दृष्टि सड़क किनारे बैठे एक छोटे से बालक पर पड़ी। वह बालक मिट्टी के छोटे-छोटे पुतले बना रहा था। राजा ने देखा कि बालक एक पुतला बनाता, उसके कान में कुछ बुदबुदाता और फिर उसे तोड़कर वापस मिट्टी में मिला देता।
राजा को बड़ा कौतूहल हुआ। उन्होंने अपना रथ रुकवाया और बालक के पास जाकर पूछा, "बेटा, तुम यह क्या कर रहे हो? इतनी मेहनत से खिलौना बनाते हो और फिर उसे नष्ट कर देते हो?"
बालक ने बड़ी मासूमियत और गंभीरता से उत्तर दिया, "राजन, मैं इन मिट्टी के पुतलों के कान में पूछता हूँ कि क्या तुमने कभी उस परमात्मा का नाम लिया? क्या कभी 'राम' नाम जपा? जब ये कोई उत्तर नहीं देते, तो मैं इन्हें वापस मिट्टी में मिला देता हूँ क्योंकि बिना भक्ति के यह शरीर केवल मिट्टी का ढेर है।"

बालक की इतनी छोटी उम्र में इतनी गहरी और आध्यात्मिक बात सुनकर राजा दंग रह गए। उन्हें लगा कि यह कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि कोई सुलझी हुई आत्मा है। राजा ने कहा, "बालक, तुम बहुत ज्ञानी हो। क्या तुम मेरे साथ राजमहल चलोगे? वहाँ तुम्हें सुख-सुविधाएं और राजसी ठाट-बाट मिलेंगे।"
बालक ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैं चलने को तैयार हूँ महाराज, किंतु मेरी चार शर्तें हैं:"

1. प्रथम शर्त: जब मैं सोऊँ, तब आपको पूरी रात जागकर मेरी पहरेदारी करनी होगी।

2. द्वितीय शर्त: जब मैं भोजन करूँ, तब आपको भूखा रहकर मुझे खिलाना होगा।

3. तृतीय शर्त: जब मैं नए वस्त्र पहनूँ, तब आपको निर्वस्त्र (नग्न) रहना होगा।

4. चतुर्थ शर्त: जब भी मैं किसी संकट में होऊँ और आपको पुकारूँ, तो आपको अपना राज-पाट और सब काम छोड़कर तुरंत मेरे पास दौड़ कर आना होगा।
राजा यह शर्तें सुनकर सोच में पड़ गए और बोले, "पुत्र! यह तो असंभव है। मैं राजा हूँ, मैं भला भूखा कैसे रह सकता हूँ या रात भर जागकर पहरा कैसे दे सकता हूँ? और एक राजा का नग्न रहना तो लोक-मर्यादा के विरुद्ध है।"

राजा की बात सुनकर बालक की आँखों में एक ईश्वरीय चमक आ गई। उसने शांति से कहा:

 "राजन! फिर मैं उस परमात्मा का साथ छोड़कर आपके पास क्यों जाऊँ? मेरा 'वो' मालिक (ईश्वर) खुद जागता है ताकि मैं चैन की नींद सो सकूँ। वह खुद भूखा रहकर मेरा पेट भरता है। वह निर्गुण और निराकार (नग्न) रहकर मुझे सुंदर वस्त्रों से ढकता है। और सबसे बड़ी बात, जब भी मैं विपत्ति में होता हूँ, वह अपने सारे काम छोड़कर, बिना बुलाए ही नंगे पाँव मेरी रक्षा के लिए दौड़ा चला आता है।"

राजा बालक के चरणों में झुक गए। उन्हें समझ आ गया कि जो सुख और सुरक्षा परमात्मा के शरणागत होने में है, वह संसार के किसी वैभव में नहीं।

यह कथा हमें जीवन के सबसे बड़े सत्य से परिचित कराती है:

हम सोचते हैं कि हम अपनों का पालन-पोषण कर रहे हैं, पर वास्तव में वह 'परमपिता' ही है जो सबका ध्यान रख रहा है।

 ईश्वर भक्त के लिए हर मर्यादा तोड़ देते हैं। जैसे उन्होंने द्रौपदी की लाज बचाई, प्रह्लाद के लिए खंभा चीरा और गजराज की पुकार पर नंगे पाँव दौड़े।

 बिना ईश्वर के नाम के यह जीवन 'मिट्टी' के समान है। जिसे हम अपना अहंकार समझते हैं, वह अंततः मिट्टी में ही मिल जाना है।
हम व्यर्थ के सांसारिक विकारों में उलझकर उस रक्षक को भूल जाते हैं जो हमारी हर सांस का पहरेदार है।
जय श्री कृष्ण ।

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