याद कीजिए 90s का वो दौर, जब हमारे घरों में पहला फ्रिज या डिब्बे वाला टीवी आता था। वो सिर्फ बाज़ार से खरीदी गई कोई मशीन नहीं होती थी, बल्कि उसे शुभ मुहूर्त देखकर, पूरे परिवार के साथ एक उत्सव की तरह घर लाया जाता था। वो घर का एक सदस्य बन जाता था! 15 साल, 20 साल... पीढ़ियाँ बदल जाती थीं, लेकिन उन गैजेट्स की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता था। हमें याद ही नहीं कि कभी फ्रिज की बांस आने, कम कूलिंग होने, गैस उड़ने या टीवी की स्क्रीन काली होने जैसी कोई समस्या भी होती थी।
उन दिनों चीजें कभी 'खराब' होकर कबाड़ में नहीं जाती थीं। होता यह था कि वक्त के साथ परिवार बड़ा हो जाता था, जरूरतें बढ़ जाती थीं, और वह सामान घर के लिए छोटा पड़ने लग जाता था। लेकिन तब भी उसे फेंकने या कौड़ियों के भाव बेचने की हमारी संस्कृति नहीं थी। हम बड़े आदर और प्रेम के साथ उस चालू फ्रिज या टीवी को अपने घर के वफादार काम वाले भाई-बहनों, किसी जरूरतमंद रिश्तेदार या गांव के किसी परिवार को सौंप देते थे। वहाँ भी वह सामान अगले 10 साल शान से चलता था! यानी एक सिंगल इन्वेस्टमेंट समाज के तीन अलग-अलग स्तरों पर 30 साल तक अपनी Value डिलिवर करता था। इसे कहते थे भारतीय मिजाज।
और आज? आज आप डेढ़ लाख का OLED TV या चमचमाता Smart AC खरीदिए, वारंटी का पीरियड खत्म होते ही उसकी सांसें फूलने लगती हैं। 5 साल पार करना तो आज के गैजेट्स के लिए 'पुनर्जन्म' जैसा है। कॉर्पोरेट की भाषा में इस गंदे और सोचे-समझे खेल को कहते हैं— Planned Obsolescence (सोची-समझी एक्सपायरी डेट)!
हाँ भाई साहब! आज की कंपनियाँ चीज़ें जानबूझकर ऐसी बनाती हैं जो वक्त पर खुद-ब-खुद दम तोड़ दें। क्योंकि अगर आपका AC और TV पहले की तरह 20 साल चल गया, तो इन बड़े ब्रांड्स के शोरूम पर ताले नहीं लग जाएँगे? उनकी अगली Sales कैसे होगी? उनका Profit Margin कैसे बढ़ेगा? उनका पूरा बिजनेस मॉडल ही इस बात पर टिका है कि आप हर 4 साल में नया सामान खरीदें।
कंपनियों का खतरनाक 'वारंटी ट्रैप' (Warranty Trap)
इस खेल को और मजबूत बनाने के लिए कंपनियों ने एक नया चक्रव्यूह बुना है, जिसे मैं Warranty Trap कहता हूँ। जब तक आपका सामान Under Warranty है, आप बंधक बन जाते हैं। आपको छोटी से छोटी दिक्कत के लिए भी उनके ऑथराइज्ड शोरूम या सर्विस सेंटर ही भागना पड़ता है।
लेकिन असली खेल इसके बाद शुरू होता है! अगर वारंटी के दौरान या उसके तुरंत बाद भी आपने अपनी मर्जी से किसी लोकल मैकेनिक से उस सामान को छू भी दिया, तो कंपनी सीधे ब्लैकमेलिंग पर उतर आती है—"सर, आपने बाहर से गैजेट ओपन करवा लिया? अब हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं, आपकी वारंटी खत्म!" यानी आपके खुद के खरीदे हुए सामान पर आपका कोई हक नहीं रहता। वे आपको डराते हैं ताकि आप मजबूरन उनके महंगे पार्ट्स खरीदें और उनके सर्विस सेंटर को मोटी फीस दें। यह कंपनियों का बनाया हुआ एक बहुत बड़ा 'प्रिज़्न' (जेल) है, जिसमें हर ग्राहक फंसा हुआ है।
AC की गैस और TV का 'पैनल': जेब काटने का नया औजार!
आजकल के 80% AC मालिकों की गर्मियों की शुरुआत ठंडी हवा से नहीं, बल्कि मैकेनिक को "भाईसाहब, कूलिंग नहीं हो रही, शायद गैस लीक हो गई है" का रोना रोने से होती है। कॉपर कॉइल के नाम पर कंपनियां ऐसी घटिया और पतली क्वालिटी की पन्नियां दे रही हैं कि कुछ ही महीनों में उनमें बारीक छेद हो जाते हैं। मैकेनिक आता है, हाथ खड़े करता है और कहता है—"साहब, कॉइल बदलनी पड़ेगी।"
महंगे LED TV का हाल तो और भी बदतर है। उसकी स्क्रीन (पैनल) बहुत नाज़ुक होती है। ज़रा सा वोल्टेज का झटका लगा या स्क्रीन में खराबी आई नहीं कि कंपनी का ऑथराइज्ड सर्विस सेंटर आपको सीधे 15 से 20 हजार का Estimate हाथ में थमा देता है। मध्यमवर्गीय आदमी मन मसोसकर सोचता है—"यार, 20 हजार मरम्मत पर लगाने से अच्छा है कि 5 हजार और मिलाकर नया ही ले आता हूँ!" और यहीं पर आप कॉर्पोरेट के बुने हुए उस चक्रव्यूह में फंस जाते हैं, जिसकी स्क्रिप्ट बोर्ड रूम में बैठकर लिखी गई थी।
कहाँ गए हमारी कॉलोनी के 'टीवी वाले अंकल' और वो मोची?
जरा ठहरकर सोचिए, हमारी आत्मनिर्भरता को हमसे किसने छीना? पहले हमारी कॉलोनी के नुक्कड़ पर एक 'टीवी वाले अंकल' बैठते थे, जिनकी दुकान पर रेडियो, टेप रिकॉर्डर और टीवी का मेला लगा रहता था। चाहे खराबी कोई भी हो, वे आईसी (IC) बदलकर या एक छोटा सा टांका लगाकर अधिकतम ₹250 में टीवी को फिर से जिंदा कर देते थे। हमारे जूते-चप्पल भी तब तक मोची के पास जाकर सिलते रहते थे, जब तक वे पूरी तरह 'शहीद' न हो जाएँ।
आज कंपनियों ने इस Warranty और स्पेयर पार्ट्स को ब्लॉक करने के नियम से उन 'टीवी वाले अंकल' और लोकल मैकेनिकों को धीरे-धीरे बिजनेस से बाहर कर दिया। हमने अपनी मरम्मत की शानदार संस्कृति को खुद अपने हाथों से दफन कर दिया। आज हम पश्चिमी देशों की उस घातक 'Use and Throw' वाली बीमारी के पूरी तरह शिकार हो चुके हैं।
नतीजा देखना है तो हमारे महानगरों और शहरों के बाहर जाकर देखिए, जहाँ E-Waste (Electronic Waste) के ज़हरीले पहाड़ खड़े हो रहे हैं। ये पहाड़ सिर्फ पर्यावरण को ही नष्ट नहीं कर रहे, बल्कि आपकी जेब को भी खोखला कर रहे हैं। हम भारतीय, जिनकी रग-रग में Sustainable Life (टिकाऊ जीवन) और रीसाइक्लिंग का विज्ञान बसा था, आज दिखावे की अंधी दौड़ में सबसे आगे दौड़ रहे हैं।
'बैलेंस शीट' और 'मासिक बजट' की सलाह:
एक Chartered Accountant होने के नाते जब मैं व्यापारियों और नौकरीपेशा लोगों की Personal Balance Sheet का ऑडिट करता हूँ, तो मुझे एक बहुत ही चौंकाने वाला सच दिखाई देता है। लोग अपनी मेहनत की कमाई (Hard-earned Money) का एक बहुत बड़ा हिस्सा हर साल जाने-अनजाने में सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स पर फूंक रहे हैं। कभी मोबाइल बदल रहे हैं, कभी नया टीवी ला रहे हैं, तो कभी लैपटॉप अपग्रेड कर रहे हैं।
लोग इसे 'वन-टाइम इन्वेस्टमेंट' समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं, लेकिन हकीकत में यह आपकी सेविंग्स को दीमक की तरह चाट रहा है। मेरी सलाह है कि गैजेट्स पर होने वाले इस भारी-भरकम खर्चे को 'Asset' समझना बंद कीजिए। इसे अपने Monthly Expense (मासिक खर्च) के कॉलम में लेकर आइए!
जब आप सालभर में बदले गए मोबाइल, टीवी, एसी की मरम्मत और गैजेट्स के पूरे खर्च को 12 महीनों से डिवाइड (भाग) करके देखेंगे, तब आपको इसका Actual और डरावना गणित समझ में आएगा। आपको पता चलेगा कि आपकी कमाई का कितना बड़ा हिस्सा सिर्फ इन डब्बों को मेंटेन करने में जा रहा है। इसलिए, अगली बार कोई भी गैजेट खरीदने से पहले उसे अपने मंथली बजट में शामिल करके उसका वास्तविक बोझ ज़रूर नापें!
इस कॉर्पोरेट ट्रैप से बाहर निकलने के 3 अचूक रास्ते:
'Right to Repair' का समर्थन करें: भारत सरकार अब 'राइट टू रिपेयर' कानून लेकर आई है [Right to Repair India]। उपभोक्ता के तौर पर हमारा हक है कि हम कंपनियों के इस Warranty Blackmail के खिलाफ आवाज उठाएं। कंपनियों को मजबूर होना पड़ेगा कि वे स्पेयर पार्ट्स खुले बाज़ार में दें।
रिपेयर संस्कृति को जिंदा कीजिए: अगली बार घर का कोई गैजेट नखरे दिखाए, तो तुरंत Amazon या Flipkart खोलकर 'Buy Now' पर उंगली दबाने के बजाय, अपने लोकल मैकेनिक भाई की दुकान पर जाइए। उसे रोजगार भी मिलेगा और आपकी जेब भी बचेगी।
सामान की उम्र लंबी कीजिए: चीज की लाइफ बढ़ाना, उसे सहेजकर रखना और छोटी पड़ने पर किसी जरूरतमंद को चालू हालत में देना हमारी संस्कृति की खूबसूरती है। इसे ई-वेस्ट का हिस्सा मत बनने दीजिए।
असली समझदारी और टशन हर साल नया मॉडल बदलने में या दिखावे का शिकार होने में नहीं है। असली समझदारी कॉर्पोरेट की इस चालाकी को समझकर अपनी मेहनत की कमाई को सही जगह इन्वेस्ट करने और अपनी जड़ों की ओर लौटने में है!
पंकज 'चांडक' की कलम से...✍️
(एक सीए जो आपकी बैलेंस शीट भी देखता है और समाज का बदलता मिजाज भी)
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