Pages

Saturday, 25 April 2026

श्रीयन्त्र की महिमा

#श्रीयन्त्र की महिमा ।।.
      श्रीयन्त्र को यंत्र शिरोमणि श्रीयंत्र, श्रीचक्र व त्रैलोक्यमोहन चक्र भी कहते हैं । धन त्रयोदशी और दीपावली को यंत्रराज श्रीयंत्र की पूजा का अति विशिष्ट महत्व है । श्री यंत्र या श्री चक्र सारे जगत को वैदिक सनातन धर्म, अध्यात्म की एक अनुपम और सर्वश्रेष्ठ देन है। इसकी उपासना से जीवन के हर स्तर पर लाभ का अर्जन किया जा सकता है, इसके नव आवरण पूजन के मंत्रों से यही तथ्य उजागर होता है।
मूल रूप में श्रीयन्त्र नौ यन्त्रों से मिलकर एक बना है , इन नौ यन्त्रों को ही हम श्रीयन्त्र के नव आवरण के रूप में जानते हैं, श्री चक्र के नव आवरण निम्नलिखित हैं:-

1:- त्रैलोक्य मोहन चक्र- तीनों लोकों को मोहित करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।
2:- सर्वाशापूरक चक्र- सभी आशाओं, कामनाओं की पूर्ति करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।
3:- सर्व संक्षोभण चक्र- अखिल विश्व को संक्षोभित करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।
4:- सर्व सौभाग्यदायक चक्र- सौभाग्य की प्राप्ति,वृद्धि करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।
5:- सर्वार्थ सिद्धिप्रद चक्र- सभी प्रकार की अर्थाभिलाषाओं की पूर्ति करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।
6:- सर्वरक्षाकर चक्र- सभी प्रकार की बाधाओं से रक्षा करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।
7:- सर्वरोगहर चक्र- सभी व्याधियों, रोगों से रक्षा करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।
8:- सर्वसिद्धिप्रद चक्र- सभी सिद्धियों की प्राप्ति करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।
9:- सर्व आनंदमय चक्र- परमानंद या मोक्ष की प्राप्ति करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।

इसके अतिरिक्त श्रीयन्त्र का एक रहस्य ओर है कि श्रीयन्त्र वेदों, कौलाचार व अगमशास्त्रों में उल्लेखित स्वयंसिद्ध भैरवी चक्र या संहार चक्र का ही विस्तृत स्वरूप है , श्रीयन्त्र के क्रमशः 7,8 व 9 वें (बिंदु, त्रिकोण और अष्टकोण) चक्र ही संयुक्त होकर मूल स्वयंसिद्ध भैरवी चक्र है , व बाहर के अन्य 1 से 6 तक के चक्र उसका सृष्टि व स्थिति क्रम में विस्तार मात्र है, इसीलिए श्रीचक्र या श्रीयन्त्र का समयाचार, दक्षिणाचार, व कौलाचार सहित अन्य सभी पद्धतियों से पूजन अर्चन किया जाता है !

श्रीयंत्र के ये नवचक्र सृष्टि, स्थिति और संहार चक्र के द्योतक हैं । अष्टदल, षोडशदल और भूपुर इन तीन चक्रों को सृष्टि चक्र कहते हैं। अंतर्दशार, बहिर्दशार और चतुर्दशार स्थिति चक्र कहलाते हैं। बिंदु, त्रिकोण और अष्टकोण को संहार चक्र कहते हैं। 
श्री श्री ललिता महात्रिपुर सुंदरी श्री लक्ष्मी जी के यंत्रराज श्रीयंत्र के पिंडात्मक और ब्रह्मांडात्मक होने की बात को जो साधक जानता है वह योगीन्द्र होता है । श्रीयंत्र ब्रह्मांड सदृश्य एक अद्भुत यंत्र है जो मानव शरीर स्थित समस्त शक्ति चक्रों का भी यंत्र है। श्रीयंत्र सर्वशक्तिमान होता है। इसकी रचना दैवीय है। अखिल ब्रह्मांड की रचना का यंत्र होने से इसमें संपूर्ण शक्तियां और सिद्धियां विराजमान रहती हैं। स्व शरीर को एवं अखिल ब्रह्मांड को श्रीयंत्र स्वरूप जानना बड़े भारी तप का फल है। इन तीनों की एकता की भावना से शिवत्व की प्राप्ति होती है तथा साधक अपने मूल आत्मस्वरूप को प्राप्त कर लेता है ।
श्री यंत्र का आध्यात्मिक स्वरूप पूर्ण विधान से श्री यंत्र का पूजन जो एक बार भी कर ले, वह दिव्य देहधारी हो जाता है। दत्तात्रेय ऋषि एवं दुर्वासा ऋषि ने भी श्री यंत्र को मोक्षदाता माना है। इसका मुख्य कारण यह है कि मनुष्य शरीर की भांति, श्री यंत्र में भी 9 चक्र होते हैं। 

* पहला चक्र मनुष्य शरीर में मूलाधार चक्र होता है। शरीर में यह रीढ़ की हड्डी के सबसे नीचे के भाग में, गुदा और लिंग के मध्य में है। श्री यंत्र में यह अष्ट दल होता है। यह रक्त वर्ण पृथ्वी तत्व का द्योतक है। इसके देव ब्रह्मा हैं 
* दुसरा चक्र स्वाधिष्ठान चक्र यह लिंग स्थान के सामने है। श्री यंत्र में इसकी स्थिति चतुर्दशार चक्र में बनी होती है। यह जल तत्व का द्योतक है। इसके देव विष्णु भगवान हैं। 
* तीसरा चक्र मणीपुर चक्र यह नाभी के पीछे मेरु दंड के अंदर होता है। यह दश दल का होता है। श्री यंत्र में यह त्रिकोण है और अग्नि तत्व का द्योतक होता है। यंत्र के देव बुद्ध रुद्र माने गये हैं।

* चौथा चक्रअनाहत चक्र होता है। मनुष्य शरीर में यह हृदय के सामने होता है। यह द्वादश दल का है। श्री यंत्र में यह अंतर्दशार चक्र कहा जाता है। यह वायु तत्व का द्योतक माना जाता है। इसके देव ईशान रुद्र माने गये हैं। 
* पांचवां चक्र विशुद्ध चक्र होता है। मनुष्य शरीर में यह कंठ में होता है। यह 16 दल का है। श्री यंत्र में यह अष्टकोण होता है। यह आकाश तत्व का द्योतक माना गया है। इसके देव भगवान शिव माने जाते हैं। 
* छठा चक्र आज्ञा चक्र होताहै। मनुष्य शरीर में यह मेरुदंड लँबिका स्थान ( दोनो भौओ के मध्य ) में माना गया है। यह 2 दलों का है। श्री यंत्र में इसकी स्थिति त्रिकोण मे मानी जाती है। 
* सातवां चक्र सहस्रार चक्र इंद्र योनि,जो शरीर में मेरुदण्ड के ब्रहम नाडी मे माना गया है और श्री यंत्र में इसकी स्रिथति बिन्दु रूप में मानी जाती है। 
* आठवा कुल और नवम अकुल चक्र माना जाता है। श्री यंत्र में यह नूपुर के रूप में अंकित होता है। श्रीर यंत्र के पूजन और उसे जागृत करते समय दश मुद्राएं होती हैं। इनमें संक्षोभिणी मुद्रा, द्रावणी मुद्रा, आकर्षिणी मुद्रा, वश्य उन्माद मुद्रा, महाङ्गशा मुद्रा, खेचरी मुद्रा, बीज मुद्रा, योनि मुद्रा, त्रिखंडा मुद्रा हैं। मुद्राओं के प्रयोग का एक कारण यह है कि मुद्राओं से सभी नाड़ियों में प्राण का सहज गति से प्रवेश, वीर्य की स्थिरता, कषायों और पातकों का नाश, सर्वरोगों का उपशमन्, जठराग्नि की वृद्धि, शरीर की निर्मल कांति, जरा का नाश,पंच तत्वों पर विजय एवं नाना प्रकार की योग सिद्धियों की प्राप्ति इनका मुख्य कार्य माना गया है। कुंडलिनी शक्ति का उद्बोधन, मुद्राभ्यास से ब्रह्म द्वार, या सुषुम्ना मुख से निद्रिता कुल कुंडलिनी जागृत हो कर ऊपर की ओर उठाने का कार्य मुद्राओं से होता है। इसी कारण श्री यंत्र को जागृतकरने में खेचरी मुद्रा को शामिल किया गया है। 
दत्त ऋषि ने जमदाग्नि पुत्र परसराम जी से कहा कि यंत्र के पूजन से लाख गुणा फल अधिक होता है। इसी कारण यंत्रों को विशेष स्थान प्राप्त है। साथ ही श्री विद्या को दस महाविद्याओं में सर्वश्रेष्ठ, केवल मोक्ष प्रदान करने के कारण ही, माना गया है। इसी कारण श्री यंत्र को यंत्रराज की उपाधि दी गयी है। इस विद्या को अति गोपनीय रखा गया है और बिना पात्रता के श्री विद्या की दीक्षा नहीं दी जाती है। यही कारण है कि श्री यंत्र को जागृत करने वाले विद्वान बहुत ही कम हैं। यदि आम जन श्री यंत्र विद्या के साधक को साधक के रूप में पहचान लें, तो वह समय उसकी मृत्यु का माना जाता है, क्योंकि आम जन के जानने से उसे यश प्राप्त होता है, जो मोक्ष और सिद्धि में बाधक है। 
श्री यंत्र में ऊध्र्वमुखी 5 त्रिकोण, 5 प्राण, 5 ज्ञानेंद्रियां, 5 तन्मात्रा और 5 माया भूतों के प्रतीक हैं। मनुष्य शरीर में येअस्थि, मेदा, मांस, अवृक और त्वक् के रूप में विद्यमान हैं। 4 त्रिकोण शरीर में प्राण, शुक्र, मज्जा, जीने के द्योतक हैं और ब्रह्मांड में मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के प्रतीक हैं। श्री यंत्र में त्रिकोण, अष्ट कोण, अंतर्दशार, बहिर्दशार और चतुरस्व, ये 5 शक्ति चक्र होते हैं और बिंदु, अष्ट दल, षोडश दल और चतुरस्त्र, ये 4 शिव चक्र होते हैं। श्री यंत्र में कुल 43 त्रिकोण होते हैं। ये त्रिकोणों के मंथन और योग से बने षट्कोण यंत्र हैं।

#ब्रम्हविद्या-श्रीविद्या-श्री चक्र-विराट षोडशी-राजराजेश्वरी श्री श्री ललिता महात्रिपुरमहासुन्दरी श्री महालक्ष्मी महाविद्या" ---
साधक की आत्मा व मस्तिष्क इतने शक्तिशाली हो जाते है।

#श्रीविद्या - परिचय
एक बार पराम्बा पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि आपके द्वारा प्रकाशित तंत्रशास्त्र की साधना से मनुष्य समस्त आधि-व्याधि, शोक-संताप, दीनता-हीनता से मुक्त हो जायेगा। किंतु सांसारिक सुख, ऐश्वर्य, उन्नति, समृद्धि के साथ जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति कैसे प्राप्त हो इसका कोई उपाय बताईये।

भगवती पार्वती के अनुरोध पर कल्याणकारी शिव ने श्रीविद्या साधना प्रणाली को प्रकट किया। श्रीविद्या साधना भारतवर्ष की परम रहस्यमयी सर्वोत्कृष्ट साधना प्रणाली मानी जाती है। ज्ञान, भक्ति, योग, कर्म आदि समस्त साधना प्रणालियों का समुच्चय (सम्मिलित रूप) ही श्रीविद्या-साधना है।

श्रीविद्या साधना की प्रमाणिकता एवं प्राचीनता
जिस प्रकार अपौरूषेय वेदों की प्रमाणिकता है उसी प्रकार शिव प्रोक्त होने से आगमशास्त्र (तंत्र) की भी प्रमाणिकता है। सूत्ररूप (सूक्ष्म रूप) में वेदों में, एवं विशद्रूप से तंत्र-शास्त्रों में श्रीविद्या साधना का विवेचन है।

शास्त्रों में श्रीविद्या के बारह उपासक बताये गये है- मनु, चन्द्र, कुबेर, लोपामुद्रा, मन्मथ, अगस्त्य अग्नि, सूर्य, इन्द्र, स्कन्द, शिव और दुर्वासा ये श्रीविद्या के द्वादश उपासक है।

श्रीविद्या के उपासक आचार्यो में दत्तात्रय, परशुराम, ऋषि अगस्त, दुर्वासा, आचार्य गौडपाद, आदिशंकराचार्य, पुण्यानंद नाथ, अमृतानन्द नाथ, भास्कराय, उमानन्द नाथ प्रमुख है।

इस प्रकार श्रीविद्या का अनुष्ठान चार भगवत् अवतारों दत्तात्रय, श्री परशुराम, भगवान ह्यग्रीव और आद्यशंकराचार्य ने किया है। श्रीविद्या साक्षात् ब्रह्मविद्या है।#श्रीयंत्र

यह सर्वाधिक लोकप्रिय प्राचीन यन्त्र है,इसकी अधिष्टात्री देवी स्वयं श्रीविद्या अर्थात त्रिपुर सुन्दरी हैं,और उनके ही रूप में इस यन्त्र की मान्यता है। यह बेहद शक्तिशाली ललितादेवी का पूजा चक्र है,इसको त्रैलोक्य मोहन अर्थात तीनों लोकों का मोहन यन्त्र भी कहते है। 

यह सर्व रक्षाकर सर्वव्याधिनिवारक सर्वकष्टनाशक होने के कारण यह सर्वसिद्धिप्रद सर्वार्थ साधक सर्वसौभाग्यदायक माना जाता है। इसे गंगाजल और दूध से स्वच्छ करने के बाद पूजा स्थान या व्यापारिक स्थान तथा अन्य शुद्ध स्थान पर रखा जाता है। इसकी पूजा पूरब की तरफ़ मुंह करके की जाती है,श्रीयंत्र का सीधा मतलब है,लक्ष्मी यंत्र जो धनागम के लिये जरूरी है। 

श्रीयंत्र अलौकिक शक्ति व चमत्कारों से परिपूर्ण गुप्त शक्तियों का प्रजनन केन्द्र बिद्नु कहा गया है। जिस प्रकार से सब कवचों से चन्डी कवच सर्वश्रेष्ठ कहा गया है,उसी प्रकार से सभी देवी देवताओं के यंत्रों में श्रीदेवी का यंत्र सर्वश्रेष्ठ कहा गया है।

 इसी कारण से इसे यंत्रराज की उपाधि दी गयी है। इसे यन्त्रशिरोमणि भी कहा जाता है। दीपावली धनतेरस बसन्त पंचमी अथवा पौष मास की संक्रान्ति के दिन यदि रविवार हो तो इस यंत्र का निर्माण व पूजन विशेष फ़लदायी माना गया है

श्रीयंत्र का मूल मंत्र:- ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।

सिद्ध श्री यंत्र ही देता है फल आज बाजार में रत्नों के बने श्री यंत्र आसानी से प्राप्त हो जाते हैं किंतु वे सिद्ध नहीं होते। सिद्ध श्री यंत्र में विधिपूर्वक हवन-पूजन करके देवी-देवताओं को प्रतिष्ठित किया जाता है तब श्री यंत्र समृद्धि देने वाला बनता है। यह आवश्यक नहीं कि श्री यंत्र रत्नों का बना हो। 

श्री यंत्र तांबे पर बना हो अथवा भोज पत्र पर जब तक उसमें मंत्र शक्ति विधिपूर्वक प्रवाहित नहीं की गई हो तब तक वह श्री प्रदाता अर्थात धन प्रदान करने वाला नहीं होता।

पौराणिक कथा

श्री यंत्र के संदर्भ में एक कथा का वर्णन मिलता है। उसके अनुसार एक बार आदि शंकराचार्यजी ने कैलाश मान सरोवर पर भगवान शंकर को कठिन तपस्या कर प्रसन्न कर दिया। भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर उनसे वर मांगने के लिए कहा। आदि शंकराचार्य ने विश्व कल्याण का उपाय पूछा। 

भगवान शंकर ने शंकराचार्य को साक्षात लक्ष्मी स्वरूप श्री यंत्र की महिमा बताई और कहा- यह श्री यंत्र मनुष्यों का सर्वथा कल्याण करेगा। श्री यंत्र परम ब्रह्म स्वरूपिणी आदि प्रकृतिमयी देवी भगवती महा त्रिपुर सुदंरी का आराधना स्थल है क्योंकि यह चक्र ही उनका निवास और रथ है। श्री यंत्र में देवी स्वयं मूर्तिवान होकर विराजती हैं इसीलिए श्री यंत्र विश्व का कल्याण करने वाला है।

आज के यांत्रिक युग में जबकि मनुष्य अनेक प्रकार की समस्याओं से आक्रान्त है, अगर वह श्रीयंत्र की स्थापना करें तो यह यंत्र उसके लिए रामबाण सिद्व हो सकता है।

 इस यंत्र को पूर्ण श्रद्वा, विश्वास से अपने व्यवसाय, दुकान, ऑफिस , फैक्टरी आदि में स्थापित करना चाहिए। इसकी प्रतिदन पूजा से श्रीलक्ष्मी प्रसन्न होती है। तथा साथक धनाढय बनता है आज जबकि वास्तु का युग है, प्रत्येक व्यक्ति वास्तु के द्वारा सुख भी प्राप्ति करना चाहता है। ऐसे में श्रीयंत्र की स्थापना और भी आवश्यक हो जाती है।

आदिकालीन विद्या का द्योतक हैं वास्तव में प्राचीनकाल में भी वास्तुकला अत्यन्त समृद्व थी। श्रीयंत्र में सर्वप्रथम धुरी में एक बिन्दु और चारो तरफ त्रिकोण है, इसमें पांच त्रिकोण बाहरी और झुकते है जो शक्ति का प्रदर्शन करते हैं और चार ऊपर की तरफ त्रिकोण है, इसमें पांच त्रिकोण बाहरी और झुकते हैं जो शक्ति का प्रदर्शन करते है और चार ऊपर की तरफ शिव ती तरफ दर्शाते है।

 अन्दर की तरफ झुके पांच-पांच तत्व, पांच संवेदनाएँ, पांच अवयव, तंत्र और पांच जन्म बताते है। ऊपर की ओर उठे चार जीवन, आत्मा, मेरूमज्जा व वंशानुगतता का प्रतिनिधत्व करते है। चार ऊपर और पांच बाहारी ओर के त्रिकोण का मौलिक मानवी संवदनाओं का प्रतीक है। यह एक मूल संचित कमल है।

 आठ अन्दर की ओर व सोलह बाहर की ओर झुकी पंखुड़ियाँ है। ऊपर की ओर उठी अग्नि, गोलाकर, पवन,समतल पृथ्वी व नीचे मुडी जल को दर्शाती है। ईश्वरानुभव, आत्मसाक्षात्कार है। यही सम्पूर्ण जीवन का द्योतक है। यदि मनुष्य वास्तव में सुखी और सृमद्व होना चाहता है तो उसे श्रीयंत्र स्थापना अवश्य करनी चाहिये।

अनन्त ऐश्वर्य एवं लक्ष्मी प्राप्ति के मुमक्ष को चाहिए कि श्री यंत्र के सम्मुख श्री सूक्त का पाठ करो पंचमेवा देवी को भोग लगायें तो शीघ्र ही इसका चमत्कार होता है।

यंत्र का उपयोगइस यंत्र को व्यापार वृद्धि के लिए तिजोरी में रखा जाता है धान्य वृद्धि के लिए धान्य में रखा जाता है

इस यंत्र को वेलवृक्ष की छाया में उपासना करने से लक्ष्मी शीघ्र प्रसन्न होती है और अचल सम्पत्ति प्रदान करती हैं।

इस यंत्र को सम्मुख रखकर सूखे वेलपत्र घी में डुबोकर वेल की समिधा में आहूति डालने से मां भगवती शीघ्र ही प्रसन्न होती है एवं धन ऐश्वर्य प्राप्त होता है तथा जीवन भर लक्ष्मी के लिए दुखी नहीं होना पड़ता।

मान्यता है कि भोजपत्र की अपेक्षा तांबे पर बने श्रीयंत्र का फल सौ गुना, चांदी में लाख गुना और सोने पर निर्मित श्रीयंत्र का फल करोड़ गुना होता है। 'रत्नसागर' में रत्नों पर भी श्रीयंत्र बनाने की बात लिखी गई है।

 इनमें स्फटिक पर बने श्रीयंत्र को सबसे अच्छा बताया गया है। विद्वानों की ऐसी धारणा है कि भोजपत्र पर 6 वर्ष तक, तांबे पर 12 वर्ष तक, चांदी में 20 वर्ष तक और सोना धातु में श्रीयंत्र आजीवन प्रभावी रहता है।

 केसर की स्याही से अनार की कलम द्वारा भोजपत्र पर श्रीयंत्र बनाया जाना चाहिए। धातु पर निर्मित श्रीयंत्र की रेखाएं यदि खोदकर बनाई गई हों और गहरी हों, तो उनमें चंदन, कुमकुम आदि भरकर पूजन करना चाहिए।
दीपावली की रात गृहस्थ के लिए श्री यंत्र सिद्ध करना सबसे आसान है। 

इसके लिए पूजन के बाद लक्ष्मी मंत्र- 

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः

 की 11 माला का जाप करें। साथ ही श्री यंत्र की स्थापना कर उसका पूजन करें तो वह सिद्ध हो जाएगा।
" # श्रीयंत्र "

" चतुर्थिः श्री कण्ठेः, शिवयुवतिभिः पंच भिरपि। प्रभिन्नाभिः शम्भोर्नवभिरपि मूल प्रकृतिभिः!त्रयश्चत्वारिशद्बसुदल कलाब्जत्रिविलय। त्रिरेखाभिः साधेः तव मव कोणः परिणताः !!

आनन्द लहरी में श्री शंकराचार्य ने बताया है कि 4 श्री कंठों (शिवस्वरूप), 
पांच शिव की युवतियों, 
शंभू की 9 अभिन्न मूल प्रकृति, 
43 वसुदर, 
कलाकब्ज की त्रिविलय, तीन रेखाओं के साथ इस महामंत्र में परिलक्षित हैं।

'श्री यंत्र 'समस्त यंत्रों में सर्वश्रेष्ठ है। 
यह भगवती श्री त्रिपुर संदुरी का यंत्र है। 
'योगिनी हृदय' ग्रंथ के अनुसार आद्या शक्ति अपने बल से ब्रह्माण्ड का रूप लेकर स्वयं अपने स्वरूप को निहारती हैं तो वहीं से 'श्री चक्रों' का प्रादुर्भाव होता है।

श्री यंत्र के केन्द्र में बिंदु है।
इस बिंदु के चारों ओर 9 त्रिकोण हैं जो नवशक्ति के प्रतीक हैं।
 
5 त्रिकोण को शक्ति स्वरूप माना जाता है। 
ये (पांच त्रिकोण) पंच प्राण, पंच ज्ञानेन्द्रियां, पंच कर्मेन्द्रियां, पंच तन्मात्रा और पंच महाभूत का प्रतिनिधित्व करते हैं। 

नीचे के चार त्रिकोण शिव स्वरूप माने जाते हैं। 
ये शरीर में जीवात्मा, प्राण, मज्जा और शुक्र को परिलक्षित करते हैं और 
मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार के द्योतक हैं। 
इस तरह से ये 9 त्रिकोण 9 मूल प्रकृति का प्रतीक हैं।
 
इसके पश्चात इस यंत्रराज में पहले वृत्त के बाहर आठ दल का कमल और उसके पश्चात इस वृत्त के बाहर 16 दल का कमल है।

इस यंत्र में उर्ध्वमुखी त्रिकोण, अग्नितत्व का, 
वृत्त वायु का, 
बिंदु आकाश का और 
भूपुर पृथ्वी तत्व का प्रतीक हैं। 
कुल मिलाकर यंत्रराज श्री यंत्र स्वयं में मानव शरीर का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। 

" यदि इस प्राणप्रचलित चैतन्य महायंत्र के सामने धनतेरस या दीपावली से आरंभ करके नित्य 16 पाठ श्री सूक्त के किए जाएं तो यह यंत्र धीरे-धीरे जागृत होने लगता है।"

यह सर्वाधिक लोकप्रिय प्राचीन यन्त्र है, 
इसकी अधिष्टात्री देवी स्वयं श्रीविद्या अर्थात त्रिपुर सुन्दरी हैं तथा उनके ही रूप में इस यन्त्र की मान्यता है।
इसे गंगाजल और दूध से स्वच्छ करने के बाद पूजा स्थान या व्यापारिक स्थान तथा अन्य शुद्ध स्थान पर रखा जाता है। इसकी पूजा पूर्व दिशा की तरफ़ मुंह करके की जाती है,
दीपावली धनतेरस बसन्त पंचमी अथवा पौष मास की संक्रान्ति के दिन यदि रविवार हो तो इस यंत्र का निर्माण व पूजन विशेष फ़लदायी माना गया है। 

इस यंत्र की महिमा जग प्रसिद्ध है। 
समस्त मठों और मंदिरों में इस यंत्रराज का पूजन अवश्य किया जाता है जिससे उनका वैभव अक्षुण्ण रहता है।
 
सोमनाथ मंदिर में प्रत्येक ईंट पर यह यंत्र स्थापित था, जिसकी वजह से वहां अकूत सम्पदा थी, जिससे महमूद गजनवी ने उसे बार-बार लूटा, ऐसी मान्यता है।

साधना -
अक्षय तृतीया,नवरात्रि, धनतेरस के दिन 'श्रीयंत्र' का पूजन करने से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं। तंत्र ग्रंथों में दीपावली को कालरात्रि, यक्षरात्रि, महानिशा कहा गया है।

इस रात्रि में आद्य शक्ति महालक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करने आती है और श्री यंत्र गणपति, यंत्र - लक्ष्मी यंत्र - कुबेर यंत्र सहित अपनी पूजा अर्चना होते देखती है वहीं पर अपनी कृपा अनुकम्पा की वर्षा करती जाती है , जिसके प्रभाव से साधक वर्ष भर तक सुख-समृद्धि प्राप्त करता रहता है।

महालक्ष्मी की साधना-उपासना में सिद्ध प्राण प्रतिष्ठित ताम्रपत्र के श्री यंत्र या पारद श्री यंत्र , गणपति यंत्र, कुबेर यंत्र, अति आवश्यक है । लक्ष्मी साधना का मूल मंत्र आप नियमित 108 बार श्रद्धा से घर-प्रतिष्ठान में जप करें। 

" ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः! "

" ह्रीं ऐश्वर्य श्री धन्म्धान्यादिपत्ये ऐं पूर्णत्व लक्ष्मी सिद्धये नमः ! "

" ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं सिद्ध लक्षम्ये नमः ! "

चमत्कारी साबर मंत्र -
" श्री शुक्ले महाशुक्ले कमल दल निवासे श्री महालक्ष्मी नमो नम: लक्ष्मी माई सत की सवाई-आओं चेतो करो भलाई, भलाई ना करो तो सात समुद्रों की दुहाई-मेरी ऋध्दि-सिध्दि खाओही (खाओगी) तो नौ नाथ चौरासी सिद्धों की दुहाई ।"
भगवान दास वशिष्ठ..✍️
https://www.facebook.com/share/1FLmyfmFc6/

वयं राष्ट्रे जागृयाम 

No comments:

Post a Comment