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Tuesday, 13 January 2026

षोडषाक्षरी विद्या ( संक्षिप्त विधान )

भगवती त्रिपुरा को श्रीविद्या भी कहा जाता है। मन्त्रों की नायिका श्रीविद्या देवताओं के लिए भी दुर्लभहै। यह विद्या समस्त सम्पत्तियों की प्राप्ति कराने वाली मानी गई है। उसके उच्चारण से ही पापों का समूह नष्ट हो जाता है। इस विद्या के महत्त्व का ज्ञान शास्त्रों में वर्णित इस अंश से ही हो जाता है- "शिर दे दो, आत्मा दे दो, परन्तु षोडषाक्षरी विद्या को किसी को न दो।" यद्यपि इस विद्या की पूजा-आराधना अत्यन्त ही विस्तृत और तकनीकपूर्ण है, परन्तु सामान्य साधकों के लिए इसका सूक्ष्म विधान भी है, जिसे यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा हैं - 

     पूजन विधिसर्वप्रथम साधक को स्नानादि से निवृत्त होकर श्वेत आसन पर बैठकर उपर्युक्त यन्त्र का निर्माण करना चाहिए। इसे भोजपत्र पर भी बनाया जा सकता है, अथवा तांबा, सोना या चाँदी के पतरे पर बनवाया जा सकता है। इस यन्त्र को अपने सामने किसी भी पात्र में रख लें और भगवती षोडशी का ध्यान करें-ध्यानवालार्कयुत तेजसां त्रिनयनां 
रक्ताम्बरोल्लासिनीं ।
नानालंकृति राज मानव पुषं बालेन्दु युक् शेखराम्।॥
हस्तैरिक्षु धनुः सृतां शुभशरं पाशं मुदा विभ्रतीं।श्रीचक्र स्थित सुन्दरीं त्रिजगतामाधार भूतां भजे॥भावार्थ: प्रातः काल के सूर्य के समान जिनका तेज है; जिनके तीन नेत्र हैं; जो लाल रंगों के वस्त्रों से परिपूर्ण तथा अनेक प्रकार के अलंकारों से सुसज्जित हैं, जिनकी चारों भुजाओं में इक्षु-धनुष, बाण, चाप और पाश सुशोभित हैं। श्री चक्र पर स्थित (विराजमान) सौन्दर्य की देवी, त्रिलोक की आधार शक्ति, माँ षोडशी देवी को मैं नमस्कार करता हूँ; उनका ध्यान करता हूँ।

     इस प्रकार ध्यान करने के उपरान्त बनवाए गए यन्त्र का घी से अभ्यंग करके उसके ऊपर दुग्धधारा तथा जलधारा देकर स्वच्छ वस्त्र से उसको पौंछकर उसे पुनः रखकर अक्षत, कुंकुम, पुष्पों आदि से पूजन करें और फिर निम्नांकित मन्त्र का जप करें-
              "ऐं क्लीं सौः बालात्रिपुरे स्वाहा।"
   उपर्युक्त मन्त्र की जप संख्या एक लाख है। कनेर (करवीर) के पुष्पों से जप का दशांश होम करें और होम का दशांश मार्जन व उसका दशांश तर्पण करें। फिर ब्राह्मण भोज कराने के उपरान्त इस यन्त्र को धारण करना चाहिए। इस यन्त्र को धारण करने से साधक शीघ्र ही लक्ष्मी, विद्या तथा सुयश को प्राप्त करता है।


(विशेष: 'पूजन यन्त्र' का पूजन करें, तदोपरान्त धारण यन्त्र को बनाकर धारण करना चाहिए। इस प्रकार दोनों यन्त्र अलग-अलग हैं।"
उपर्युक्त सम्पूर्ण पूजन पद्धति की विस्तृत विधि के लिए पुस्तक "श्री महात्रिपुर सुन्दरी साधना" का परिशीलन करें।)
   साभार - दिव्य Solution मंत्र तावीज  
                       वयं राष्ट्रे जागृयाम 

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