ठीक वैसे ही, जैसे हमने अपना पूरा बचपन खीरे को ककड़ी कहकर पुकारा। आप लाख कहते रहें कि खीरा अलग है और ककड़ी अलग है, हम उसे ककड़ी ही कहते हैं और कहते रहेंगे। ककड़ी के लिए खीरा शब्द हमारे लिए उतना ही पराया है जितना कि क्युक्युम्बर! पानी बाबा आता है तो ककड़ी-भुट्टा लाता है, खीरा नहीं लाता! जो बड़ा-सा खीरा होता है, उसे सैलाना, रतलाम, बाँसवाड़ा से लेकर इन्दौर-उज्जैन तक के लोग बालम-ककड़ी कहते हैं। यहाँ तक कि पपीते को भी हम अरण-ककड़ी कहकर ही पुकारते हैं!
भारत देश बहुत बड़ा है। भाँति-भाँति की वस्तुओं के यहाँ भिन्न-भिन्न नाम हैं। प्याज भी कहते हैं, कांदा भी कहते हैं। पर कोई अड़ जाय कि कांदा गलत कहते हो, वह तो प्याज है, तब कलह-क्लेश की नौबत है। बाबाजी लोग तो कांदा को रामलड्डू बोलते हैं। साधुजन नमक को रामरस बोलते हैं। नून-तेल-लकड़ी में फिर यही लवण भिन्न नाम से प्रस्तुत है, किस-किससे झगड़ा कीजियेगा कि गलत कहते हो?
धनिया को हमारे यहाँ कोथमीर कहते हैं। सेम को बालौर कहते हैं। सहजन को सुरजना-फली कहते हैं। इधर मुझे पता चला कि कुछ लोग कद्दू को सीताफल कहते हैं। जबकि हमने तो शरीफे को ही हमेशा सीताफल कहा। कद्दू काशीफल भी कहलाया है, कोहड़ा भी और भोपला भी। रामकौळा और कुम्हणा भी कद्दू के नाम हैं। गोया कि कद्दू कटता है तो सबमें बँटता है- कभी-कभी भिन्न नामों से भी!
परवल साग है और परमल चबैना है। सेव-परमल हमारे मालवा का प्रिय स्नैक है। इसी परमल को दूसरे लोग मुरमुरा कहते हैं। बंगाल में वही मूड़ी कहलाई है। जो फुल्की कहलाई है, वह हमारे यहाँ पतासी है। फुल्का, रोटी है। बीकानेर में जो कचौड़ी है, वो कलकत्ते वाली कचौड़ी नहीं है। चिरौंजी को हमारे यहाँ चारोली कहते हैं। चिरौंजी कहेंगे तो हम शकर की गोलियाँ समझेंगे। चना-चिरौंजी की प्रसादी प्रसिद्ध है। हमारे यहाँ वैद्य किसी से कह दे कि घी में चिरौंजी भूँजकर खाइये तो वह भलामानुष चारोली के बजाय शकर वाली चिरौंजी समझकर घृत-शर्करा के घालमेल का सेवन करता रहेगा। क्या कीजियेगा?
आलू सही है या बटाटा?
मटर सही है या बटला?
तरबूज़ सही है या मतीरा?
सुरण सही है या जिमीकंद?
किशमिश सही है या दाख?
उड़द सही है या माषदाल?
अरहर सही है या तुअर दाल?
मीठी नीम सही है या कड़ीपत्ता?
घासलेट सही है या मिट्टी का तेल?
करते रहिये विवाद!
मूंग-मोगर-मोठ में साम्य और वैषम्य है। बनारस में जो लंगड़ा है, वो बंगाल में मालदा है। जो कहीं पर तोतापुरी है, वो कहीं और कलमी है। कोई अड़ जाए कि कलमी गलत कहते हो, तो झमेला है। पपीता, अरण-ककड़ी के साथ ही रण-खरबूजा भी कहलाया है। लौकी को घिया, दूधी और आल भी कहते हैं। मालवा में पूछो, आज भोजन में क्या बनाया, तो वो कहेंगे- "आल चने की दाल!" अरबी को घुइयाँ कहते हैं। घुइयाँ छीलने वाली कहावत इसी से बनी है। अमरूद को हमने हमेशा जामफल ही कहा। नर्मदांचल में वह बिही कहलाया है। पेडू, संतालु, सफरी, लताम : ये सब अमरूद के नाम हैं। बैंगन भटा भी है, बिंताक भी है, बेगुन तो है ही। अंग्रेजी में फिर वही ब्रिंजल-एगप्लान्ट के दो नामों से इठलाता है। हजार वस्तुओं के हजार अलग-अलग नाम हैं।
जो गंगा उत्तराखंड में मंदाकिनी-अलकनंदा है, वही पूर्वबंग में पद्मा-मेघना है, पर है गंगा ही! घाट बदलने से पानी तो नहीं बदल जाता, बोन्धु!
Sushobhit
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