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कथा है कि गुरुकुल में कुछ सहपाठियों को दत्तात्रेय की तांत्रिक सिद्धियों की भनक लग गई। सहपाठी यह जान गये कि दत्तात्रेय के पास गुरु से भी अधिक ज्ञान और सामर्थ्य है।वे दत्तात्रेय से विद्या सिखाने का अनुरोध करने लगे और दबाव बनाने लगे।तो दत्तात्रेय आश्रम से अचानक भाग गये। सहपाठियों को दत्तात्रेय के आश्रम छोड़ने का पता चला तो वे खोजते हुए उनके पीछे लग गये। दत्तात्रेय ने देखा कि उनके सहपाठी उनके पीछे पड़े हैं।वे उनका पीछा नहीं छोड़ रहे हैं तो वे मार्ग में मिले एक तालाब में घुस गए और जल में समाधि लगा ली। सहपाठी खोजते हुए उस तालाब तक पहुंच गये। उन्होंने वहां दत्तात्रेय को नहीं पाया तो वे जान गये कि दत्तात्रेय यहीं कहीं सिद्धि के बल पर स्वयं को छुपाये हुए हैं।तो वे सब वहीं बैठकर दत्तात्रेय की प्रतीक्षा करने लगे।जब बहुत समय हो गया कोई भी सहपाठी वहां से नहीं गया तो दत्तात्रेय माया रचते हुए एक युवा स्त्री के साथ तालाब से बाहर निकल आये और उस स्त्री की गोद में सिर रखकर लेट गये।कई सहपाठियों की बुद्धि भ्रमित हो गई उन्हें लगा कि दत्तात्रेय भ्रष्ट हो गये हैं। अतः कई सहपाठी वहां से चले गए। केवल एक सहपाठी वहीं बैठा रहा। कुछ देर बाद दत्तात्रेय ने उस सहपाठी को बुलाया और पूछा कि मेरे भ्रष्ट आचरण को देखने के बाद भी तुम मुझे छोड़कर क्यों नहीं गये??तो उस सहपाठी ने कहा कि -हे भगवन!!आप तंत्र विद्या के ज्ञाता हैं आप कैसी भी माया रच सकते हैं। मैं जान रहा था कि यह सब आपकी माया है।आप सहपाठियों से छुटकारा पाना चाहते हैं। लेकिन मैं आपको छोड़ना नहीं चाहता था। मैंने सोच लिया था कि आप कभी तो कृपा करेंगे,जब कृपा करेंगे तो ज्ञान भी देंगे।सो मैं आपको छोड़कर नहीं गया।तंत्रेश्वर भगवान दत्तात्रेय ने उस सहपाठी को तंत्र का ज्ञान दिया था।
है तो कथा, लेकिन कथा के संदेश को समझना होगा। प्रकृति के गूढ़ रहस्यों को समझने के मार्ग सीधे सपाट नहीं हैं । उनमें बहुत उलझाव हैं।बड़े धैर्य और सजगता से इस पथ पर चलना होता है।
हरहर महादेव।
वयं राष्ट्रे जागृयाम
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