💐माया का मायाजाल और ईश्वर की खोज💐
एक समय की बात है, एक अत्यंत न्यायप्रिय, प्रजावत्सल और धार्मिक राजा हुआ करता था। वह केवल राजकाज में ही कुशल नहीं था, बल्कि उसका हृदय सदैव अपने इष्ट देव की भक्ति में लीन रहता था। उसकी अटूट श्रद्धा से प्रसन्न होकर एक दिन भगवान ने उसे साक्षात दर्शन दिए। भगवान ने राजा से वरदान मांगने को कहा, तो परोपकारी राजा ने निवेदन किया, "हे प्रभु! आपकी कृपा से मेरे पास सब कुछ है, परंतु मेरी इच्छा है कि जिस दिव्य दर्शन का आनंद मुझे मिला है, वही सौभाग्य मेरी प्रजा को भी प्राप्त हो।" भगवान ने मुस्कुराते हुए कहा, "राजन्, यह कठिन है, क्योंकि हर कोई परमात्मा का पात्र नहीं होता।" परंतु राजा की जिद के आगे भगवान को झुकना पड़ा और उन्होंने अगले दिन पहाड़ी के शिखर पर पूरी प्रजा को दर्शन देने का वचन दे दिया।
अगले दिन, पूरे राज्य में ढिंढोरा पिटवा दिया गया। राजा के नेतृत्व में हजारों की संख्या में प्रजा और उनके सगे-संबंधी ईश्वर से मिलने की उमंग में पहाड़ी की ओर चल पड़े। अभी कुछ ही दूरी तय की थी कि मार्ग में तांबे के सिक्कों का एक विशाल पहाड़ दिखाई दिया। सूर्य की रोशनी में चमकते तांबे को देख कुछ लोगों के मन में लालच आ गया। वे सोचने लगे कि भगवान तो फिर कभी मिल जाएंगे, पहले इस संपत्ति को बटोर लें। राजा ने उन्हें समझाया कि ईश्वर के सामने इस धातु का कोई मूल्य नहीं है, पर लोभ के वशीभूत होकर एक बड़ी भीड़ वहीं रुक गई।
राजा खिन्न मन से आगे बढ़े। कुछ किलोमीटर बाद चांदी के सिक्कों का धवल पहाड़ नजर आया। इस बार तांबे से बचकर आए लोगों का संयम जवाब दे गया। उन्होंने सोचा कि चांदी तो तांबे से कहीं अधिक कीमती है, ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता। राजा की चेतावनियों को अनसुना कर एक और बड़ा समूह चांदी की गठरियां बांधने में व्यस्त हो गया। जैसे-जैसे यात्रा आगे बढ़ी, प्रलोभन और बढ़ते गए। रास्ते में सोने के सिक्कों का चमचमाता पर्वत आया। अब तो राजा के खास दरबारी और स्वजन भी खुद को रोक न सके। वे भी सोने के मोह में फंसकर पीछे छूट गए।
अब केवल राजा और रानी ही शेष बचे थे। राजा ने संतोष की सांस ली कि कम से कम उनकी पत्नी तो उनके साथ है। तभी रास्ते में सप्तरंगी आभा बिखेरते हीरों का पर्वत दिखाई दिया। हीरों की उस अलौकिक चमक ने रानी के विवेक को शून्य कर दिया। वह पागलों की तरह हीरों को बटोरने लगी, यहाँ तक कि वजन बढ़ने पर उसने अपने वस्त्रों तक की परवाह नहीं की। राजा अत्यंत दुखी हुए। उन्होंने देखा कि माया के प्रभाव में आकर हर व्यक्ति ने ईश्वर के साक्षात सान्निध्य को तुच्छ समझ लिया।
राजा अकेले ही पहाड़ी के शिखर पर पहुँचे। वहाँ भगवान मुस्कुराते हुए उनका इंतजार कर रहे थे। भगवान ने पूछा, "राजन्, तुम्हारी प्रजा कहाँ है? मैं तो कब से उनसे मिलने को बेकरार था।" राजा ने आत्मग्लानि से सिर झुका लिया। तब भगवान ने कहा, "हे राजन्! जो लोग सांसारिक वस्तुओं को मुझसे श्रेष्ठ मानते हैं, उन्हें मेरी प्राप्ति कभी नहीं हो सकती। मनुष्य अक्सर सोने-चांदी की चमक में उस परम प्रकाश को भूल जाता है जो उसके भीतर है।"
*शिक्षा*
यह कहानी हमें सिखाती है कि परमात्मा की प्राप्ति केवल उसे ही होती है जिसकी बुद्धि स्थिर और जिसका मन मोह-माया के आकर्षणों से मुक्त है। संसार में मार्ग भटकाने वाले बहुत से 'पहाड़' (लोभ, काम, क्रोध, मोह) आएंगे, लेकिन जो इन प्रलोभनों को पार कर निरंतर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता रहता है, वही अंत में ईश्वर के प्रेम और आशीर्वाद का पात्र बनता है। सत्य यही है कि संसार की समस्त दौलत ईश्वर के एक अंश के सामने भी तुच्छ हैं।
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