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Tuesday, 13 January 2026

" आशिको को कुछ नही आता सिवाय मोहब्बत के ....."

१९५४-५५ की बात है मूर्धन्य इतिहासकार और साहित्यकार वृन्दावनलाल वर्मा दतिया पीतांबरा पीठ के स्वामी जी के शरणागत हो चुके थे 
उस समय भारत के चोटी के गवैयौ मे से एक उस्ताद आदिल खां झाँसी मे रहते थे और वृंदावन लाल वर्मा जी के मित्र थे 
दुर्दैव से उस्ताद जी की आवाज लोप हो गई 
आदिल खां साहब भारी भावुक व्यक्ति थे सो वो मरने को राजी हो गये 
तब वर्मा जी ने उनको सम्बल दिया और उन्हे लेकर दतिया आये और उस्ताद जी की समस्या को लेकर श्री चरणो मे निवेदन किया 
महाराज शास्त्रीय संगीत के भारी रसिक थे हों भी क्यों ना विद्या को सम्मान दक्षिणामूर्ति ना दे तो कौन दे 
उस समय महाराज बरामदे मे अपने मूढे (बेंत की बनी कुर्सी )पर विराजमान थे और खैनी घिस रहे थे 

वे वर्मा जी की बात सुन रहे थे पर उनकी आंखे आदिल खां साहब को देख रही थी जो उनके अस्तित्व को भेदे जा रही हों (यह बात आदिल खां साहब ने अपने संस्मरण मे लिखी है)
स्वामी जी चुपचाप सुनते रहे और खैनी खाने के पश्चात उसका बचा हिस्सा उस्ताद जी को दिया 
दो मिनट बाद एक दम बोले 
" खां साहब !बागेश्वरी मे कुछ सुनाइये "
खां साहब किंकर्तव्य विमूढ हो कभी स्वामी तो कभी वर्मा जी को देखते 
तभी फिर से कठोर स्वर मे आज्ञा हुई 
"गाइये " 
खां साहब हिम्मत करके गाना शुरू किया 
एक दो मिनट खरखराती आवाज निकलने के बाद अचानक से लंबा आलाप निकलने लगा उनके कंठ से ज्यों आवाज को कभी कुछ हुआ ही ना था 
पंडित रेवाराम तिवारी सुनाते थे की खां साहब ने गजल गाई 
" जो ऐतबार-ए-उल्फत मुझ पर ना हुई तुमको 
मै समझ गया की कमी मेरी ही जात मे है"
  तिवारी जी कहते की ऐसा गाया ऐसा गाया की चार बरस का अपना सारा दर्द उस एक गान मे भर दिया 
वर्मा जी तिवारी जी के साथ जितने लोग बैठे थे सबके आंसू निकल गये 
परंतु दाता निश्चल भाव से पूरा गान सुनते रहे 
गान पूरा होने के बाद खां साहब भाव विह्वल हो के चरनो मे पड गये की दाता शरण लीजिये 
भाग्य प्रबल था तो स्वामी जी ने एक माला मंगा कर खां साहब को दी और पूछा 

" आदिल ! कौन सा मन्त्र लोगे 
अरबी या संस्कृत ?
मै सब देने मे समर्थ हूं 
तुम कहो "

यह सुन कर उस्ताद जो लगभग रूंआसे बैठे थे वो फूट फूट कर रोने लगे और फिर संभल कर बोले 

" मुझे संस्कृत या अरबी से क्या लेना ना मै जानता यह सब  
मै तो तुम्हारा आशिक और गुलाम हूं और आशिक तो बस मोहब्बत कर सकता 
 सो जो मालिक कहेंगे वो सर आंखो पर रहेगा "

खां साहब पर कृपा हुई मातंगी माई का उपदेश उनको हुआ 

खैर!
कभी कहीं किसी ने किसी से पूछा था 
'आप मेरी हर बात गुस्सा , झुंझलाहट ,बेरूखी सब इतने सहज से कैसे ले जाते हैं गुस्सा नही आता आपको या मन ना उचटता 
तो जवाब मिला की 
मैं तो तुम्हारा आशिक और गुलाम हूं 
और आशिको को कुछ नही आता सिवाय मोहब्बत के ....."


--अविनाश भारद्वाज शर्मा
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