*🍃 ॥ॐ॥ 🍃*
(१) "ॐ तत् सत् " इति निर्देशः ब्रह्मणः त्रिविधः स्मृतः
(गीता, १७/२३)
ॐ - तस्य वाचकः प्रणवः ।
(योग सूत्र, १/२७)
तत् = परोक्ष या दूर की वस्तु, मूल स्रष्टा -
तदिति परोक्षे विजानीयात्-तदिदास भुवनेषु ज्येष्ठम् ।
(ऋक्, १०/१२०/१)
तत् सवितुर्वृणीमहे श्रेष्ठं सर्वधातमम्। (ऋक्, ५/८२/१)
सत् = सत्ता या स्थिति जिसका अनुभव हो सके।
असत् = जिसका अनुभव नहीं हो।
अतिदूरात् सामीप्याद् इन्द्रियघातान्मनोऽनवस्थानात्।
सौक्ष्म्याद् व्यवधानाद् अभिभवात् समानाभिहाराच्च॥
(सांख्यकारिका, ७)
वस्तुओं के नहीं दीखने के कारण हैं-बहुत दूरी, बहुत निकटता, इन्द्रियों की अक्षमता, बहुत सूक्ष्म होना, बीच में व्यवधान, अभिभव (अधिक प्रकाशित के सामने छिप जाना), सदृश वस्तु में मिलना।
(२) मनुष्य की आत्मा ब्रह्म का छोटा व्यक्तिगत रूप है। आत्मा रूप प्राण का गतिशील रूप ’रम्’ है, जो लोक-भाषा में ’राम’ है।
प्राणो वै रं । (बृहदारण्यक उपनिषद्, ५/१२/१)
व्यक्ति का निर्देश ’नाम’ से होता है। अतः शरीर से प्राण निकलने पर
"ॐ तत् सत् " का रूप है-’ राम नाम सत्।'
(३) सत्-चित्-आनन्द
शून्य-प्राय या इन्दु आकाश चित् है-चिदाकाश। इसमें आनन्द या रस विश्व का मूल स्रोत है जो सर्वव्यापी है।
यद् वै तत् सुकृतं रसो वै सः, रसं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति।
(तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७/२)
इसका अनुभव गम्य अंश सत् है, बाकी असत्।
(४) शंकर = शं + खं + रं।
शं = शान्त रूप, भाषा में शिव।
शं नो मित्रः शं वरुणः शं नो भवत्यर्यमा।
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः, शं नो विष्णुरुरुक्रमः॥
(ऋक्, १/९०/९, अथर्व, १९/९/६, वाज. यजु, ३६/९, तैत्तिरीय आरण्यक, ७/१/१)
खं = ब्रह्म है या सृष्टि का स्थान है, पुराण (प्रथम तत्त्व)
रं = वायु (गतिशील तत्त्व) रं है।
ॐ खं ब्रह्म खं पुराणं वायु रं खमिति ह स्माह ।
(बृहदारण्यक उपनिषद्, ५/१/१)
खं का कर्ता रूप कं है-
को नाम प्रजापतिः अभवत्, को वै नाम प्रजापतिः।
(ऐतरेय ब्राह्मण, ३/२१)
को वै प्रजापतिः।
(गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ६/३)
प्रजापतिर्वै कः
(ऐतरेय ब्राह्मण, २/३८, ६/२१, कौषीतकि ब्राह्मण, ५/४, २४/४, ५/९, ताण्ड्य महाब्राह्मण, ७/८/३, शतपथ ब्राह्मण, ६/४/३/४, ७/३/१/२०, तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/२/५/५, जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण, ३/२/१०, गोपथ ब्राह्मण उत्तर, १/२२)
कस्मै देवाय हविषा विधेम । (वाज. यजु. १२/१०२)
कस्मै देव वषडस्तु तुभ्यम् । (वाज. यजु, ११/३९)
(४) त्रीण्युष्ट्रस्य नामानि । (अथर्व, २०/१३२/१३)
तृतीय अवस्था वृद्ध या जरा (जरत्)\ त्रीणि उष्ट्र = जरत् -उष्ट्र = जरथुष्ट्र ।
✍️ _अरुण कुमार उपाध्याय_
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*🌸॥卐॥❀ शुभम् स्वस्ति ❀॥卐॥🌸*
*_वंदे मातृसंस्कृतम_*
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