(हिन्दी अर्थ सहित)
🍁ध्यानम् ॥
ह्रींकारमध्यसंस्थां तां रक्तवर्णां करालिनीम् ।
रामवामाङ्कसंस्थां तां चण्डीं ध्यायेत् जनकात्मजाम् ॥
अर्थ: जो 'ह्रीं' बीज के मध्य में स्थित हैं, जिनका वर्ण लाल है, जो विकराल (शत्रुओं के लिए) हैं और भगवान श्री राम के वाम भाग (बाईं ओर) विराजमान हैं; उन चण्डी-स्वरूपा जानकी का मैं ध्यान करता हूँ।
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पीताम्बरां रक्तनयां करालां चण्डीं च भीमां करुणार्द्रभावाम् ।
रामस्य वामे स्थितमादिशक्तिं सीतां नमामि जगदेकमातम् ॥ १ ॥
अर्थ
जो माता पीताम्बर धारण करती हैं (जो वैष्णवी शक्ति हैं ), जिनके नेत्र क्रोध से लाल हैं (जो अधर्म के विनाश का संकेत है), जिनका स्वरूप कराल और भीषण है (दुष्टों के लिए भयप्रद), परन्तु भीतर से अत्यन्त करुणामयी हैं (भक्तों के लिए दयामयी)—वे ही भगवान राम के वामभाग में स्थित आदिशक्ति हैं।
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नमामि सीतां जगदम्बिकां तां चण्डीं महाशक्तिमनन्तरूपाम् ।
या मूलकासुरं संहृत्य शीघ्रं धर्मस्य रक्षां विदधाति नित्यम् ॥ २ ॥
अर्थ
मैं उन जगदम्बा सीता को प्रणाम करता हूँ जो अनन्त रूपों वाली महाशक्ति हैं और आवश्यकता पड़ने पर चण्डी रूप धारण करती हैं।
मूलकासुर जैसे दुष्ट का संहार करके उन्होंने यह सिद्ध किया कि धर्म की रक्षा के लिए शक्ति का प्रकट होना अनिवार्य है—यह शक्ति स्वयं माता सीता ही हैं।
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रामप्रियां राममनोऽभिरामां रक्तप्रभां कालभयप्रणाशाम् ।
उग्रां वरां भीषणरूपधारिणीं वन्दे सदा जानकीं चण्डिकाख्याम् ॥ ३ ॥
अर्थ
जो श्रीराम की प्रियतम हैं और उनके हृदय को आनन्द देने वाली हैं, जिनकी आभा लाल (ऊर्जा, तेज और संहार) से युक्त है, और जो मृत्यु तथा काल के भय का भी नाश कर देती हैं—ऐसी उग्र किन्तु वरदायिनी चण्डिका जानकी को मैं प्रणाम करता हूँ।
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या देवि सर्वेषु च शक्तिरूपा या वै महामृत्युविनाशकारिणी ।
सा सीतया चण्डिरूपेण भूत्वा संहत्य दैत्यान् परिपाति लोकान् ॥ ४ ॥
अर्थ
जो देवी प्रत्येक प्राणी में ऊर्जा (शक्ति) के रूप में स्थित हैं और जो मृत्यु (अज्ञान, अहंकार, बन्धन) का भी नाश करती हैं—वही सीता चण्डी रूप धारण कर दैत्यों का संहार करती हैं और सम्पूर्ण लोकों की रक्षा करती हैं।
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मूलप्रकृतिं मूलदाहकारिणीं कुण्डलिनीं योगिवरैः सुपूज्याम् ।
रामस्य शक्तिं परमां विभूतिं सीतां नमामि भुवनैकमातम् ॥ ५ ॥
अर्थ
जो समस्त सृष्टि की मूल प्रकृति हैं, जो मूलाधार में स्थित होकर अज्ञान का दहन करती हैं, जो कुण्डलिनी शक्ति के रूप में योगियों द्वारा पूजित हैं—वे ही राम की परम शक्ति हैं।
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मूलकासुरस्य विनाशहेतोः चण्डीं समुत्पाद्य स्वमात्मरूपात् ।
देवीं नमामि प्रणतार्तिहन्त्रीं भीमां शिवां शान्तिकरीं वरदाम् ॥ ६ ॥
अर्थ
मूलकासुर के विनाश के लिए जिन्होंने अपने ही स्वरूप से चण्डी शक्ति को प्रकट किया—वे शरणागतों के दुःखों का नाश करने वाली हैं।
उनका बाह्य रूप भले ही भयानक हो, परन्तु वे अंततः शिवस्वरूप (कल्याणकारी) और शांति देने वाली हैं।
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शूलं च चक्रं धनुषं च बाणं खड्गं त्रिशूलं परिघं दधानाम् ।
दैत्यान् संहर्तुं प्रकटां महेशीं सीतां भजे चण्डिकरूपधारिणीम् ॥ ७ ॥
अर्थ
जो देवी अपने हाथों में शूल (भेदन शक्ति), चक्र (धर्म और समय का नियंत्रण), धनुष-बाण (संकल्प और लक्ष्यसिद्धि), खड्ग (अज्ञान का छेदन), त्रिशूल (त्रिगुण—सत्त्व, रज, तम—पर अधिकार) और परिघ (बलपूर्वक विघ्नों का नाश) धारण करती हैं—ऐसी महेश्वरी, चण्डिका रूप धारण करने वाली सीता का मैं भजन करता हूँ, जो दैत्यों (बाहरी और आंतरिक दोनों प्रकार के विकारों) का संहार करने के लिए प्रकट होती हैं।
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रक्तेक्षणां रक्तविभूषिताङ्गीं रक्ताम्बरां रौद्रमुखीं दुरापाम् ।
भक्तेषु सौम्यां रिपुषु प्रचण्डां सीतां नमामि शरणं प्रपद्ये ॥ ८ ॥
अर्थ
लाल नेत्रों और रक्तवर्ण से युक्त उग्र रूप धारण करने वाली, जो साधारणतः दुर्लभ हैं—परन्तु भक्तों के लिए अत्यन्त सरल और सौम्य हैं—ऐसी सीता की मैं शरण लेता हूँ।
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या योगिनां हृदि सदा प्रकाशा या भक्तानां सर्वकामप्रदा च ।
सा चण्डिरूपा जनकात्मजा मे रक्षां करोतु प्रतिदिनं सदैव ॥ ९ ॥
अर्थ
जो योगियों के हृदय में ज्ञान के प्रकाश के रूप में विराजमान हैं और भक्तों की सभी कामनाओं को पूर्ण करती हैं—वही चण्डी स्वरूपा जानकी मेरी सदा रक्षा करें।
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रावणमर्दिन्यपि या पुरा वै सहस्रशीर्षं विनिहत्य क्रोधात् ।
सा मूलकासुरं पुनरपि हत्वा शक्तिं स्वकीयां प्रददाति लोके ॥ १० ॥
अर्थ
जो पहले भी सहस्रशीर्ष रावण जैसे महादैत्य का संहार कर चुकी हैं, वही पुनः मूलकासुर का वध करके अपनी शक्ति का प्रदर्शन करती हैं।
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नमोऽस्तु ते चण्डि जगन्मयेऽम्बे नमोऽस्तु ते रामविभूतिरूपे ।
नमोऽस्तु ते मूलविनाशकारिणि नमोऽस्तु ते भक्तजनप्रियेऽम्बे ॥ ११ ॥
अर्थ
हे चण्डी! हे सम्पूर्ण जगत में व्याप्त माता! आपको नमस्कार।
हे राम की शक्ति स्वरूपा! आपको नमस्कार।
हे अज्ञान और मूल बन्धनों का नाश करने वाली! आपको नमस्कार।
हे भक्तों की प्रिय माता! आपको बार-बार प्रणाम।
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त्वं ब्रह्मरूपा हरिरूपधारिणी त्वं रुद्ररूपा त्रिगुणात्मकापि ।
त्वं सर्वदेवी जगदेकमाता सीता नमस्ते जगदम्बिकेऽम्ब ॥ १२ ॥
अर्थ
आप ही ब्रह्मा (सृष्टि), विष्णु (पालन) और रुद्र (संहार) स्वरूप हैं।
आप सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणों को धारण करती हुई भी उनसे परे हैं।
आप ही समस्त देवियों की मूल शक्ति और एकमात्र जगतजननी हैं—हे अम्बे सीता! आपको नमस्कार।
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भुक्तिं च मुक्तिं च ददासि नित्यं संसारदुःखं हरसि क्षणेन ।
चण्डीस्वरूपा यदि चिन्तिता त्वं सर्वार्थसिद्धिं प्रददासि शीघ्रम् ॥ १३ ॥
अर्थ
हे माता! आप साधक को भौतिक सुख (भुक्ति) और आध्यात्मिक मुक्ति (मोक्ष) दोनों प्रदान करती हैं।
आपका स्मरण करते ही जीवन के दुःख क्षण भर में समाप्त होने लगते हैं।
यदि आपको चण्डी रूप में साधक ध्यान करता है, तो आप उसे शीघ्र ही सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करती हैं—
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न ते समा देवी न ते समोऽस्ति लोकेषु कश्चित् त्रिषु अपि स्थलेषु ।
त्वमेव शक्तिः परमेश्वरस्य सीता नमस्ते जगदेकधात्रि ॥ १४ ॥
अर्थ
हे देवी! तीनों लोकों (भूः, भुवः, स्वः) में आपके समान कोई नहीं है।
आप ही उस परमेश्वर की मूल शक्ति हैं—बिना आपके कोई भी सृजन, पालन या संहार संभव नहीं।
आप सम्पूर्ण जगत का पालन-पोषण करने वाली एकमात्र धात्री (धारण करने वाली शक्ति) हैं।
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रामस्य शक्तिं परमां पवित्रां भक्तप्रियां भक्तजनार्तिहन्त्रीम् ।
वन्दे सदा चण्डिकरूपधारिणीं सीतां शिवां शाश्वतीं सनातनीम् ॥ १५ ॥
अर्थ
जो श्रीराम की परम पवित्र शक्ति हैं, भक्तों के दुःखों को दूर करने वाली हैं और सदा उनके प्रति प्रेम रखने वाली हैं—ऐसी चण्डिका रूप धारण करने वाली सनातन, शाश्वत और कल्याणकारी सीता को मैं नमन करता हूँ।
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ह्रीं बीजसम्भवां देवीं हृदयाग्निप्रदीपिनीम् ।
मूलाधारस्थितां शक्तिं सीतां वन्दे चण्डिकाम् ॥ १६ ॥
अर्थ
‘ह्रीं’ बीज (महा-माया, हृदय शक्ति) से प्रकट होने वाली देवी, जो हृदय में ज्ञान की अग्नि को प्रज्वलित करती हैं और मूलाधार चक्र में स्थित होकर जीवन ऊर्जा को जागृत करती हैं—ऐसी चण्डिका सीता को मैं प्रणाम करता हूँ।
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क्लींकाररूपिणीं देवीं कामरूपफलप्रदाम् ।
भक्ताभीष्टप्रदां नित्यं सीतां वन्दे महेश्वरीम् ॥ १७ ॥
अर्थ
‘क्लीं’ बीज (आकर्षण, प्रेम और संकल्प शक्ति) की अधिष्ठात्री देवी, जो इच्छाओं को साकार करने वाली हैं—ऐसी महेश्वरी सीता भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं।
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श्रींकारसम्भवां लक्ष्मीं सर्वसम्पत्प्रदायिनीम् ।
रामप्रियामनुप्राप्तां सीतां वन्दे जगदम्बिकाम् ॥ १८ ॥
अर्थ
‘श्रीं’ बीज (लक्ष्मी तत्त्व) से प्रकट होने वाली, धन, ऐश्वर्य और समृद्धि प्रदान करने वाली—ऐसी रामप्रिय सीता जगदम्बा को मैं प्रणाम करता हूँ।
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ऐंकाररूपिणीं विद्यां ब्रह्मज्ञानप्रदायिनीम् ।
मोहान्धकारनाशिन्यां सीतां वन्दे सरस्वतीम् ॥ १९ ॥
अर्थ
‘ऐं’ बीज (विद्या शक्ति) की अधिष्ठात्री, जो ज्ञान देती हैं और अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करती हैं—ऐसी सरस्वती स्वरूपा सीता को मैं प्रणाम करता हूँ।
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क्रींकाररूपिणीं कालीं दैत्यानां कुलनाशिनीम् ।
मूलकासुरहन्त्रीं तां सीतां वन्दे भयङ्करीम् ॥ २० ॥
अर्थ
‘क्रीं’ बीज (काली शक्ति) की अधिष्ठात्री, जो दुष्ट शक्तियों और आसुरी प्रवृत्तियों का नाश करती हैं—ऐसी भयङ्करी सीता को मैं प्रणाम करता हूँ।
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दूंकाररूपिणीं दुर्गां सर्वदुःखविनाशिनीम् ।
भयहारिणीं महादेवीं सीतां वन्दे शिवप्रियाम् ॥ २१ ॥
अर्थ
‘दूं’ बीज (दुर्गा शक्ति) की अधिष्ठात्री, जो सभी दुःखों और भय का नाश करती हैं—ऐसी महादेवी सीता को मैं प्रणाम करता हूँ।
यहाँ सीता को रक्षा और सुरक्षा शक्ति के रूप में दर्शाया गया है।
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हूंकारनादसंयुक्तां रक्षां कुर्यात् दिगन्तरे ।
भूतप्रेतपिशाचनाशां सीतां वन्दे महाबलाम् ॥ २२ ॥
अर्थ
‘हूं’ बीज (रक्षा और तेज) का उच्चारण करने वाली, जो चारों दिशाओं में सुरक्षा प्रदान करती हैं और सूक्ष्म नकारात्मक शक्तियों (भूत-प्रेत आदि) का नाश करती हैं—ऐसी महाबली सीता को मैं प्रणाम करता हूँ।
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फट्काररूपिणीं देवीं दुष्टसंहारकारिणीम् ।
छिनत्ति सर्वविघ्नानि सीतां वन्दे महेश्वरीम् ॥ २३ ॥
अर्थ
‘फट्’ बीज (विघ्न-विनाशक) की अधिष्ठात्री, जो दुष्ट शक्तियों का संहार करती हैं और सभी विघ्नों को काट देती हैं—ऐसी महेश्वरी सीता को मैं प्रणाम करता हूँ।
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स्वाहाकारस्वरूपां तां यज्ञरूपां सनातनीम् ।
कर्मफलप्रदां देवीं सीतां वन्दे हविर्भुजाम् ॥ २४ ॥
अर्थ
‘स्वाहा’ स्वरूपा, यज्ञ की अधिष्ठात्री, सनातन देवी—जो सभी कर्मों का फल प्रदान करती हैं और आहुति को स्वीकार करती हैं—ऐसी सीता को मैं प्रणाम करता हूँ।
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ह्ल्रींकारगूढरूपां तां महामायां सनातनीम् ।
त्रिगुणात्मिकशक्तिं तां सीतां वन्दे परात्पराम् ॥ २५ ॥
अर्थ
‘ह्ल्रीं’ (गूढ़ माया और स्तम्भन शक्ति) का रहस्य रूप धारण करने वाली, जो त्रिगुणों को नियंत्रित करती हैं—ऐसी परम परात्पर महामाया सीता को मैं प्रणाम करता हूँ।
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सौंकारपरमं बीजं चिदानन्दरसं परम् ।
सहस्रारस्थितां देवीं सीतां वन्दे पराशक्तिम् ॥ २६ ॥
अर्थ
‘सौं’ बीज (परम चैतन्य) स्वरूपा, जो सहस्रार चक्र में स्थित होकर परम आनंद (चिदानंद) का अनुभव कराती हैं—ऐसी पराशक्ति सीता को मैं प्रणाम करता हूँ।
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यः श्रद्धया भक्तियुतः पठेदिदं
सीताचण्डीस्तवमुत्तमं नरः ।
तस्याशु नश्यन्ति समस्तदोषाः
लभेत् सुखं श्रीं विजयां च मोक्षम् ॥
अर्थ
जो साधक श्रद्धा, शुद्धता और भक्ति के साथ इस स्तोत्र का पाठ करता है—
उसके सभी दोष, भय, बाधाएँ नष्ट हो जाती हैं।
उसे सुख, धन, समृद्धि, विजय प्राप्त होती है और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
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🌷देवी सीता ने क्यों किया था कुंभकर्ण पुत्र मूलकासुर का वध ?🌷
माता सीता देवी द्वारा भी शक्ति रूप धारण कर विभिन्न
राक्षसों की वध की कथाएं विभिन्न ग्रंथों में दी गई है
🍁१.जैसे अद्भुत रामायण में माता सीता द्वारा महाकाली रूप धारण कर पुष्कर द्वीप में रहने वाले सहस्त्र मुखी रावण का वध करने की कथा है
🍁२..दूसरे एक ग्रंथ" हनुमान चरित्र" में मां सीता द्वारा दूसरे ग्रह पर रहने वाले शतानन रावण का वध भद्रकाली का रूप धारण कर वध करने का प्रसंग है।।
🍁३.इसी तरह आनंद रामायण में कुंभकर्ण के बेटे मूलकासुर
का वध मां सीता द्वारा उग्रचंडी रूप धारण कर वध करने की कथा है।
नीचे हम मां सीता द्वारा मूलकासुर राक्षस के वध की
संक्षिप्त कथा दे रहे हैं।👇
🍁देवी सीता ने क्यों किया था कुंभकर्ण के पुत्र का वध ?🍁
विभीषण का आगमन
एक दिन श्रीराम अपने परिवार के साथ राजसभा में बैठे थे। उसी समय विभीषण अपनी पत्नी और मंत्रियों के साथ दौड़े-दौड़े श्रीराम के पास पहुंचे। और उनसे मदद की गुहार करने लगे।तब प्रभु श्रीराम ने विभीषण से परेशानी का कारण पूछा। विभीषण ने बाताया कि कुंभकर्ण का एक पुत्र है।जिसका नाम मूलकासुर है। मूलकासुर का जन्म मूल नक्षत्र में हुआ था। इस कारण कुंभकर्ण उसे जन्म के बाद नवजात शिशु को लंका से बाहर जंगल में छोड़ आया था।
जंगल में मूलकासुर का मधुमक्खियों ने पालन-पोषण किया।लेकिन जब मूलकासुर को यह मालूम हुआ की उसके पिता कुम्भकरण आपके साथ युद्ध में मारे गए। और अब मैं लंका का राजा हूँ तो उसने प्रण लिया कि वह पहले मेरा वध करेगा।और बाद में अपने पिता के हत्यारे यानि श्रीराम का वध करेगा। विभीषण ने श्रीराम से कहा हे प्रभु मूलकासुर ने आपको मारने की ठान ली है। और वह इसके लिए तैयारी भी कर रहा है।
युद्ध की तैयारी
विभीषण के इतना कहते ही श्रीराम ने भाइयों सहित वानर सेना को युद्ध का आदेश दिया।और पुष्पक विमान पर बैठकर लंका की ओर चल पड़े।उधर जब मूलकासुर को इस बात की पता चली तो वह युद्ध करने के लिए लंका के बाहर पहुंच गया।दोनों सेनाओं में करीब 7 दिनों तक भयंकर युद्ध चलता रहा. लेकिन कोई परिणाम नहीं आया।युद्ध ख़त्म न होता देख ब्रह्मा जी प्रकट हुए।
उन्होंने श्रीरम से कहा कि मूलकासुर किसी भी पुरुष के हाथों नहीं मर सकता। क्योंकि मैंने ही इसे स्त्री के हाथों मृत्यु प्राप्त करने का वरदान दिया है। इसलिए मूलकासुर को एक स्त्री ही मार सकता है।
ऋषि का श्राप
आगे ब्रह्मा जी ने भगवान राम से कहा कि एक बार मूलकासुर ऋषि-मुनियों से अपने पिता की मृत्यु का शोक व्यक्त करते हुए कह रहा था- की सीता के कारण मेरे कुल का विनाश हुआ। इस पर एक ऋषि ने क्रोधित होकर मूलकासुर को श्राप से दिया की जिस सीता को तू चंडी कह रहा है। उसी के हाथ से तेरा अंत होगा। मुनी के ये कहने पर मूलकासुर उन्हें निगल गया। इसलिए मूलकासुर को देवी सीता ही परास्त कर सकती है।
सीता का आगमन
ब्रह्मा के कहे अनुसार श्री राम ने हनुमान को गरुड़ के साथ सीता को लाने के लिए भेजा। जैसे ही हनुमान जी और गरुड़, माता सीता के पास श्रीराम का संदेश लेकर पहुंचे। उसी समय देवी सीता उनके साथ चल पड़ी।और भगवान राम के पास पहुंची। तब श्री राम ने उन्हें मूलकासुर के पराक्रम और उसे मिले वरदान के विषय में बताया।
चंडी अवतार
यह सब सुनते ही माता सीता क्रोधित हो गईं। उनकी आवाज चारों दिशाओं में गूंजने लगी। माता सीता की देह से चंडी रूपी छाया निकलकर मूलकासुर का वध करने के लिए आगे बढ़ने लगीं। छाया को अपने पास आता देख मूलकासुर ने कहा हे देवी तुम यहाँ से चली जाओ। क्योंकि मैं स्त्रियों पर अपना पराक्रम नहीं दर्शाता। इसपर चंडी छाया ने मूलकासुर से कहा -मैं तेरी मृत्यु चंडी हूं। तूने ऋषि मुनियों का वध किया है इसलिए तेरा अंत निश्चित है।
इतना कहकर सीता के रूप में चंडी ने मूलकासुर पर पांच बाण चलाएं। दोनों ओर से बाणों की बौछार की जाने लगी।फिर भी मूलकासुर परास्त नहीं हो पा रहा था।
मूलकासुर का वध
तब चंडी सीता ने चंडिकास्त्र से मूलकासुर का सिर धार से अलग कर दिया। जो सीधा लंका के दरवाजे पर जा गिरा। यह देखकर राक्षस भाग खड़े हुए और सीता की छाया पुन: देह में समा गई। इस तरह सीता माता के हाथों कुंभकर्ण के पुत्र मूलकासुर का वध संभव हुआ.
जय सियाराम जी
साभार - ✍️ज्योतिष और आध्यात्म
वयं राष्ट्रे जागृयाम
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