रोमन साम्राज्य में इसे “ब्रेड एंड सर्कस” कहा जाता था। जनता को मनोरंजन और दुश्मन दो, वह टैक्स भूल जाएगी। भारत में इसका देसी संस्करण निकला “मंदिर और मीडिया”।
बेरोजगारी बढ़ रही है, लेकिन टीवी पर बहस होगी किसने किसको क्या कहा। पेट्रोल 100 पार कर गया, लेकिन जनता का ध्यान कहीं और मोड़ दो। क्योंकि अगर जनता 6 महीने लगातार सिर्फ रोजगार और महंगाई पर सोचने लगे, तो आधी राजनीति ICU में पहुंच जाएगी।
तुम्हें गुस्सा अर्थव्यवस्था पर नहीं, पड़ोसी की थाली पर दिलाया गया।
फिर सरकार ने सीधे टैक्स कम और “छुपे टैक्स” ज्यादा लगाए। गरीब आदमी Income Tax नहीं देता, लेकिन पेट्रोल पर टैक्स देता है, गैस पर टैक्स देता है, दूध, साबुन, टूथपेस्ट, मोबाइल रिचार्ज, हर चीज पर GST देता है। मतलब रिक्शा वाला और अरबपति दोनों टूथपेस्ट पर लगभग समान टैक्स देते हैं।
इसे कहते हैं “Indirect Tax Trap”। सरकार ने अमीरों पर सीधा टैक्स बढ़ाने की बजाय आम आदमी की रोजमर्रा की सांसों पर टैक्स लगा दिया। और कमाल यह कि आदमी को लगा “मैं टैक्स नहीं देता”। अरे भाई, तुम तो चाय की प्याली से टैक्स दे रहे हो।
फर्क इतना है कि पहले जेब काटते समय आवाज आती थी, अब डिजिटल मशीन से कटती है इसलिए दर्द कम महसूस होता है।
फिर तीसरा काम तुम्हें “नागरिक” से “समर्थक” बनाया गया। नागरिक सवाल पूछता है। समर्थक बचाव करता है। पहले जनता सरकार से पूछती थी “रोजगार कहां है?” अब जनता खुद दूसरे लोगों से लड़ती है “देश खतरे में है सवाल मत पूछो।” यह लोकतंत्र का सबसे बड़ा सॉफ्टवेयर अपडेट था।
जनता को ऐसा भावनात्मक सैनिक बना दो कि वह अपनी ही तकलीफ को राष्ट्रभक्ति समझने लगे। गैस महंगी? देशहित। पेट्रोल महंगा? देशहित। नौकरी नहीं? आत्मनिर्भर बनो। अस्पताल महंगे? योग करो। मतलब हर समस्या का समाधान जनता खुद बने। सरकार सिर्फ इवेंट मैनेजमेंट करे।
चुनाव से पहले सड़कें चमकेंगी, योजनाएं बरसेंगी, विज्ञापन ऐसे चलेंगे जैसे देश दुबई को खरीदने वाला हो। लेकिन चुनाव खत्म होते ही टैक्स, दाम, कटौती। क्यों? क्योंकि चुनाव आज विचारधारा से नहीं, “Narrative Investment” से लड़े जाते हैं।
हजारों करोड़ विज्ञापन, प्रचार, सोशल मीडिया, रैलियां, आईटी सेल, डेटा मैनेजमेंट में जाते हैं। फिर वह पैसा कहीं से निकलेगा। और सबसे आसान एटीएम कौन है? जनता। इसलिए चुनाव के बाद अक्सर महंगाई का इंजेक्शन लगता है।
जनता भूल जाती है कि चुनावी मुफ्तखोरी का बिल आखिर भर कौन रहा है। वही आदमी जो लाइन में सिलेंडर खरीद रहा है।
बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत उसकी राजनीति नहीं, “ध्यान नियंत्रित करने की कला” है। अगर देश में बेरोजगारी बढ़े और जनता रोज उसी पर चर्चा करे, तो सरकार मुश्किल में पड़ जाएगी। लेकिन अगर जनता दिनभर धर्म, पाकिस्तान, इतिहास, फिल्म, कपड़े, खानपान, यूट्यूबर और बहिष्कार में उलझी रहे, तो अर्थव्यवस्था बैकग्राउंड में चली जाती है।
यह बिल्कुल वैसा है जैसे जेबकतरा पहले सड़क पर तमाशा करवाता है, फिर जेब काटता है। जनता तमाशा देखती रहती है। जेब बाद में टटोलती है।
अगर देश सच में इतना मजबूत और आत्मनिर्भर हो गया है, तो फिर हर कुछ महीने में जनता से “त्याग” क्यों मांगा जाता है? कभी पेट्रोल कम जलाओ। कभी बिजली बचाओ। कभी खर्च कम करो। कभी घर पर रहो। कभी कम खरीदो।
अरे भाई, 12 साल से लगातार सत्ता में बैठी सरकार अगर आज भी जनता से कह रही है कि “कठिन समय है”, तो फिर वह सुनहरे दिन गए कहां? टीवी पर? ड्रोन शो में? विज्ञापनों में?
नेहरू के समय देश सचमुच गरीब था, टूटा हुआ था, भूखा था। फिर भी सरकार कहती थी “हम फैक्ट्री बनाएंगे, IIT बनाएंगे, बांध बनाएंगे, वैज्ञानिक संस्थाएं बनाएंगे।” आज देश खुद को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बताता है, लेकिन जनता से कहा जाता है “कम खर्च करो, त्याग करो, सहन करो।”
यही सबसे बड़ा विरोधाभास है। गरीब देश उम्मीद दे रहा था। अमीर बनने का दावा करने वाला देश डर बेच रहा है।
तुम्हें यह यकीन दिला दिया गया कि सरकार की आलोचना करना देश की आलोचना है। बस यहीं लोकतंत्र आधा मर जाता है।
क्योंकि जिस दिन जनता सवाल पूछने से डरने लगे, उस दिन नेता राजा बन जाता है और नागरिक भक्त। फिर महंगाई भी प्रसाद लगती है और बेरोजगारी भी राष्ट्रसेवा।
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साभार - Pankaj Kumar Jat ( फेसबुक पोस्ट )
वयं राष्ट्रे जागृयाम
18/5/2026
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