सनातन दर्शन का एक अत्यंत उद्घोषक सिद्धांत है— "ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति" अर्थात वह परमात्मा हर जगह, हर जीव में रमे हैं। लेकिन जब हम इस परम सत्य को आज के व्यावहारिक धरातल पर देखते हैं, तो आधुनिक तार्किक बुद्धि कुछ असहज और तीखे प्रश्न खड़े करती है।
यदि ईश्वर सचमुच कण-कण में है, तो क्या वह नाली के बहते गंदे पानी में भी मौजूद है? क्या एक मासूम की जान लेने वाले क्रूर हत्यारे के भीतर भी उसी परमेश्वर का वास है? या समाज को अपनी कड़वाहट से दूषित करने वाले दुष्टों के भीतर भी वही ईश्वरीय चेतना धड़कती है?
हमारे ऋषि-मुनि अंधविश्वास के पक्षधर नहीं थे; वे अपने समय के सबसे बड़े वैज्ञानिक और तार्किक विचारक (सिग्मा हिंदू) थे, जो ग्रंथों में लिखी बात को भी बिना प्रमाण और लॉजिक के स्वीकार नहीं करते थे। आइए, वेदान्त के इसी सबसे गहरे और चमत्कारी सिद्धांत को आज के विज्ञान और तार्किकता के लेंस से नए रूप में समझते हैं।
1. अदृश्य होकर भी ईश्वर हर जगह है—इसका कॉस्मिक लॉजिक
चूंकि परमात्मा हमारी इन भौतिक आँखों से सीधे दिखाई नहीं देता, इसलिए हमारे पास कोई सीधा प्रयोगशाला साक्ष्य (Direct Physical Evidence) नहीं है। परंतु ऋषियों ने ब्रह्मांड के दो मूलभूत नियमों के आधार पर इसे गणितीय सटीकता से सिद्ध किया है:
अ) कॉस्मिक डिपेंडेंसी का नियम (The Law of Interconnected Existence)
सृष्टि की कोई भी वस्तु पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है; हर चीज अपने वजूद के लिए किसी न किसी दूसरी कड़ी पर टिकी है।
यदि आप नदी किनारे की रेत के एक कण को देखें, तो वह पत्थरों के घिसने से बना है। पत्थर पहाड़ों का हिस्सा थे, पहाड़ पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेटों के टकराने से बने और पृथ्वी सूर्य के गुरुत्वाकर्षण की डोर से बंधी है। सूर्य हमारी आकाशगंगा के केंद्र पर आश्रित है।
यदि आप निर्भरता की इस अनंत शृंखला (Chain) के अंतिम छोर को ढूंढने निकलेंगे, तो अंत में एक ऐसा 'परम स्वतंत्र बिंदु' (The Ultimate Independent Source) होना ही चाहिए, जो अपने अस्तित्व के लिए ब्रह्मांड में किसी और पर निर्भर न हो। वेदों ने इसी स्वयंभू, अनंत और परम स्वतंत्र चेतना को 'ब्रह्म' या ईश्वर कहा है। चूंकि वह अनंत है, इसलिए ब्रह्मांड की हर दृश्य-अदृश्य वस्तु उसी के भीतर और उसी के द्वारा प्रकट होती है।
ब) कारण-कार्य का तादात्म्य सिद्धांत (The Law of Cause and Effect)
विज्ञान का अकाट्य नियम है कि कोई भी 'कार्य' (Product) अपने 'कारण' (Source) के तत्वों से मुक्त नहीं हो सकता। सूती कपड़े के भीतर धागा और कपास हर जगह मौजूद होता है; मिट्टी के अनगिनत खिलौनों के भीतर मिट्टी अनिवार्य रूप से व्याप्त होती है।
श्रुति (वेद) कहती है कि इस दृश्यमान जगत का जो 'परम कारण' (Substratum) है, वह ब्रह्म ही है। इसलिए, ब्रह्मांड में जो कुछ भी निर्मित हुआ है, उसके मूल ताने-बाने में उसका कारण (परमात्मा) स्वतः ही अंतर्निहित और ओतप्रोत होगा।
2. यदि ईश्वर हर जगह है, तो क्या वह गंदगी और पाप से दूषित नहीं होता?
यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि परमात्मा नाली के कीचड़ या किसी दुष्ट इंसान के भीतर भी है, तो क्या उसकी पवित्रता खंडित नहीं होती? वेदान्त ने इसके लिए दो दिव्य विशेषण दिए हैं— 'असंग' और 'निर्लिप्त'। इसका अर्थ है कि वह परमात्मा इस संसार के भीतर पूरी तरह समाया हुआ है, फिर भी इसके विकारों और सीमाओं से अनंत गुना दूर और अछूता है।
इसे आज के विज्ञान की सबसे अद्भुत खोज— 'प्रकाश' (Light) के उदाहरण से समझते हैं:
क्वांटम उपमा: प्रकाश और दूषित जल का प्रयोग
कल्पना कीजिए कि आप एक पारदर्शी कांच के पात्र में गंदा और बदबूदार पानी भर देते हैं। अब यदि आप उस पात्र के आर-पार एक शक्तिशाली लेज़र लाइट या टॉर्च का प्रकाश डालते हैं, तो प्रकाश की किरणें उस मटमैले पानी के परमाणुओं के बीच से गुजरती हुई दूसरी तरफ निकल जाती हैं।
अब स्वयं से पूछिए—क्या वह प्रकाश उस गंदगी के भीतर से गुजरने के कारण खुद गंदा, मटमैला या बदबूदार हुआ? बिल्कुल नहीं! प्रकाश वहां उपस्थित था, लेकिन वह उस गंदगी से पूरी तरह 'असंग' (Unaffected) रहा।
जब हमारे इस भौतिक संसार का 'प्रकाश' मैली से मैली वस्तु के बीच रहकर भी अपनी शुद्धता अक्षुण्ण रख सकता है, तो ईश्वर तो कोई भौतिक तत्व (Physical Entity) हैं ही नहीं; वे तो परम चैतन्य हैं। वे संसार की प्रत्येक तरंग और परमाणु के भीतर स्पंदित हो रहे हैं, लेकिन उसके गुण-दोषों से सर्वथा परे हैं। यदि वे भौतिक रूप से लिप्त होते, तो पेड़ के कटने पर ईश्वर भी कट जाते या पानी के खौलने पर ईश्वर भी जल जाते, परंतु परमात्मा इन सभी भौतिक सीमाओं से मुक्त हैं।
3. परमात्मा भीतर रहकर भी बुरे लोगों को अपराध से क्यों नहीं रोकते?
यह जिज्ञासा सबसे अधिक व्याकुल करती है कि यदि ईश्वर साझी ऊर्जा के रूप में एक पापी के हृदय में भी बैठा है, तो वह उसकी बुद्धि को उसी क्षण बदलकर उसे पाप करने से रोक क्यों नहीं लेता? इसके पीछे सनातन ब्रह्मांड का परम निष्पक्ष और स्वचालित नियम कार्य करता है:
क) ईश्वर 'कर्म-ऊर्जा' के तटस्थ प्रदाता हैं (The Neutral Powerhouse)
परमात्मा ब्रह्मांड के सबसे बड़े अनबायस्ड (निष्पक्ष) जज हैं; वे न तो किसी के व्यक्तिगत मित्र हैं और न ही शत्रु। उन्होंने मनुष्य को रोबोट नहीं बनाया, बल्कि उसे 'फ्री विल' (कर्म चुनने की स्वतंत्रता) दी है। उन्होंने एक स्वचालित 'कर्म नियम' (Law of Karma) स्थापित कर दिया है, जो कर्मों का लेखा-जोखा रखता है—अच्छे का अच्छा और बुरे का बुरा परिणाम।
सूर्य की तटस्थता का उदाहरण: सूर्य देव बिना किसी भेदभाव के अपनी जीवनदायिनी किरणें पूरी धरती पर समान रूप से बिखेरते हैं। उनकी धूप पाकर एक तरफ अमृत तुल्य औषधियां और सुगंधित फूल भी खिलते हैं, तो दूसरी तरफ किसी विषैले पौधे को भी उतनी ही ऊर्जा मिलती है। सूर्य कभी यह सोचकर विषैले पौधे पर धूप डालना बंद नहीं करते कि यह संसार के लिए हानिकारक है। परमात्मा की स्थिति भी इसी पावरहाउस की तरह है।
विद्युत (Electricity) का उदाहरण: पावर ग्रिड से आने वाली बिजली पूरे शहर में समान रूप से बहती है। अब उस बिजली से आप किसी अस्पताल में जीवन बचाने वाला वेंटिलेटर चलाएं या किसी को नुकसान पहुंचाने वाला उपकरण, यह पूरी तरह उपभोक्ता की चॉइस पर निर्भर करता है। बिजली का काम केवल शुद्ध शक्ति (Power) देना है, उसका उपयोग नहीं।
ख) हमारा दृष्टिकोण क्षणिक है, ईश्वर का विज़न अनंत है
हम किसी भी व्यक्ति को केवल उसके वर्तमान जीवन की कुछ भूलों या बुरे कृत्यों के आधार पर 'परम दुष्ट' मान लेते हैं। हमारा अनुभव केवल कुछ वर्षों का है। जैसे—समाज की नजर में जो व्यक्ति अत्यंत क्रूर या कठोर है, वह अपनी वृद्धा माँ या अपने नन्हे बच्चे के सामने पूरी तरह पिघल जाता है, क्योंकि माँ ने उसकी आत्मा के दूसरे पहलुओं को भी देखा है।
परमात्मा ने हमें केवल इस एक जन्म के कुछ दृश्यों में नहीं, बल्कि अनंत जन्मों की यात्रा (जन्मांतरों) में देखा है। वे जानते हैं कि कोई आत्मा किस गहरे अज्ञान, अतीत के संस्कारों या कार्मिक ऋण के वशीभूत होकर इस समय अंधकार का आचरण कर रही है। इसलिए ईश्वर हमें तात्कालिक रूप से जज नहीं करते, बल्कि एक विकासशील चेतना (Evolutionary Soul) के रूप में देखते हैं।
ग) कर्म की भट्टी ही अंततः चेतना का शोधन करती है
ईश्वर मनुष्य की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करके सीधे उसका हाथ नहीं मरोड़ते। जब कोई जीव अपनी अज्ञानता व अहंकार में आकर प्रकृति के शाश्वत नियमों का उल्लंघन करता है और घोर पाप करता है, तो कर्म की यही अचूक न्याय व्यवस्था उसे अंततः कठोर दुखों, आत्मग्लानि और संघर्षों की भट्टी में झोंक देती है।
कई जन्मों की ठोकरें खाने और उस दंड को भुगतने के बाद ही आत्मा का मैल साफ होता है। यही दुखों की भट्टी अंततः जीव को सुधरने पर विवश करती है और वह विकारों को पार कर वापस उसी परम प्रकाश (परमात्मा) में लीन होने की राह पर अग्रसर होता है।
महा-निष्कर्ष (The Ultimate Takeaway)
परमात्मा की उपस्थिति इस संसार में बिल्कुल निराकार 'आकाश' या 'प्रकाश' की तरह है। वह पावन मंदिर के दीये की लौ में भी उतनी ही शुद्धता से मौजूद है, जितनी शुद्धता से किसी श्मशान की राख या अपवित्र नाली में। वह एक परम दानी संत के विचारों में भी ऊर्जा भर रहा है और एक अज्ञानी अपराधी की धड़कनों में भी।
वह हमें जीवन की ऊर्जा और कर्मों की पूरी स्वतंत्रता देता है, लेकिन हमारे कर्मों के कीचड़ से कभी खुद सराबोर नहीं होता। जब मनुष्य अपनी सीमित अपेक्षाओं को छोड़कर इस विराट कॉस्मिक न्याय व्यवस्था को समझ लेता है, तब वह संसार में किसी से घृणा नहीं करता, बल्कि स्वयं के भीतर के प्रकाश को पहचानकर ईश्वरत्व की ओर बढ़ जाता है।
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