ऐसा समझाकर वे कयाधु को अपने आश्रम में ले आए ,उसे अभय दिया ,उसके पुत्र प्रह्लाद को भगवद दीक्षा दी बाल्यकाल में ही । नारद जी ने भक्तराज प्रह्लाद जी के बाल मन में भगवान श्रीहरि विष्णु की भक्ति का ऐसा बीजारोपण कर दिया कि शीघ्र ही वह विशाल वृक्ष बन गया ।उनके आश्रम में उपस्थित अन्य ढेरों ऋषियों ने उस वृक्ष को और पुष्पित पल्लवित कर दिया ।
हिरण्यकश्यप जब वापिस लौटा लगभग अमरता का वरदान पाकर तब उसे सम्पूर्ण घटनाक्रम का पता चला तो उसने नारद ऋषि के प्रति अपना आभार व्यक्त किया और अपनी पत्नी और बच्चे को लेकर अपनी राजधानी लौट आया ।
उसके बाद उसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य के पुत्रों की सहायता से अथाह प्रयास किया कि प्रह्लाद की हरिभक्ति वाली विचारधारा बदला जाए और दैत्यराज हिरण्यकश्यप को ही सर्वशक्तिमान ईश्वर मान ले किन्तु ऐसा हो न सका ।
आगे की कथा सभी को पता है ,कैसे भगवान ने अपन भक्त की रक्षा के लिए नरसिंह अवतार धारण किया और हिरण्यकश्यप का वध कर दिया ।
यदि पूछा जाए कि हिरण्यकश्यप का वध किसने किया तो 90 प्रतिशत लोग यही कहेंगे कि भगवान नरसिंह ने किया किन्तु वास्तव में इस वध की सम्पूर्ण योजना के मुख्य सूत्रधार ब्रह्मर्षि नारद थे जिन्होंने दैत्यराज हिरण्यकश्यप के घर में उसके पुत्र को ही अपनी विचारधारा के प्रति इतना आग्रही बना दिया जन्म से ही बल्कि गर्भावस्था से ही (शास्त्रों के अनुसार)
कि एक बालक की आयु में ही उसने अपने पिता द्वारा किये गए दमन और शुक्राचार्य के पुत्रों द्वारा किए जाने वाले ब्रेनवाश का प्रतिकार किया और सबसे बड़े हरिभक्त बन गए ,अधर्मी दैत्यराज हिरण्यकश्यप के पापपूर्ण साम्राज्य का अंत करवा दिया । उससे बड़े चार भाई और थे किन्तु उन्हें नारद जी का सानिध्य नहीं मिला तो वे सभी अपनी पिता की ही तरह अधर्मी दैत्य ही बने रहे । केवल प्रह्लाद अपने सद्गुरु की कृपा से सही मार्ग पर चले !
प्रह्लाद दैत्य कुल में जन्मे थे किन्तु जेन जी तो फिर भी हमारे ही हिन्दू भाइयों की संताने है !! विचार कीजिए क्यों हम या हमारी ध्वजवाहक संस्थाएं इन तक इनके बाल्यकाल में ही नारद जी के समान की सद्गुरु नहीं उपलब्ध करवा पाए ?
कैसे ये बच्चे हमारी संताने होकर भी दैत्यगुरु शुक्राचार्य के अनुगामी असुरों का सा व्यवहार करने लग गए है ??
निश्चित रूप से ये हमारी भी कमी है ,सामुहिक जिम्मेदारी है,सामूहिक फेल्योर है ।बच्चों में संस्कारों की कमी रही उस कालखंड में जब यह सबसे ज्यादा प्रभावी और आवश्यक था , तब जब ये बीजारोपण का श्रेष्ठ समय था किन्तु सांस्कृतिक प्रदूषण के संक्रमण कालखंड में हमारी सरकार /संगठन भी आर्थिक विवशताओं में दबे हुए ये अधर्म होते देखते रहे और आज उसका परिणाम भुगतने को अभिशप्त है ।
आज भी करोड़ो जेन अल्फा , बीटा उसी दौर से गुजर रहे है ,प्रयास करे तो आज भी धर्मानुसार सदाचार के संस्कारों का बीजारोपण किया जा सकता है ताकि उस आने वाली पीढ़ी तक स्थितियों को पुनः नियंत्रण में लिया जा सके ।अभी तो सरकार भी हमारी है ,तंत्र भी और संगठन आदि भी ।
आज गुरु पूर्णिमा के पावन दिवस पर समस्त सनातन से आग्रह करूंगा कि इस अत्यंत आवश्यक कार्य को त्वरित प्राथमिकता के साथ संपूर्ण करें , ये हम सबका सामूहिक दायित्व है,हमारा धर्म है ! केवल सरकार , संस्थाओं , संगठनों या तंत्र के भरोसे न छोड़े , स्वयं लगे ।
ब्रह्मर्षि नारद के नाम पर सरकार को तत्काल ही नैतिक शिक्षा ,सदाचार का एक संस्कार सौरभ पाठ्यक्रम में जोड़ना चाहिए ,नारद जी के समान ही समर्थ एवं सक्षम गुरुओं को ये दायित्व सौंपा जाए कि वे देश में करोड़ों धर्मनिष्ठ संस्कारी प्रह्लाद चरित्रों का निर्माण करें।
नारद जी द्वारा सर्वथा विपरीत विचारों वाले शक्तिशाली दैत्य के राज्य में हरिभक्ति का अंकुर प्रस्फुटन किया जा सकता है तो आज तो हमारी सरकार और हमारा ही तंत्र है पिछले 12 वर्षों से और अगले 3 वर्षों तक तो पक्का ।
देर किस बात की ? शुभस्य शीघ्रम !!
सभी को गुरुपूर्णिमा की बहुत बहुत शुभकामनाएं !
भगवान वेदव्यास की जय ,ब्रह्मर्षि नारद जी की जय
भक्तराज प्रह्लाद की जय , भक्तवत्सल भगवान श्रीहरि की जय ।।
#पुरोहितजी_कहिन
✍️गोविंद जी
बुधवार दिनांक 29 जुलाई 2026 ईस्वी
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