भारतीय तंत्र-योग की गहन साधना में एक बात बार-बार सामने आती है कि बाहरी शिवलिंग जो हम मंदिरों में देखते हैं, वह वास्तव में हमारे अपने शरीर के भीतर छिपे हुए परम शिवलिंग का ही प्रतीक है। बाहर का लिंग मात्र पत्थर का चिह्न है, पर भीतर का लिंग साक्षात् चैतन्य स्वरूप परमात्मा है। और उस परमात्मा का मूल निवास स्थान है – मूलाधार चक्र।
मूलाधार वह प्रथम चक्र है जहाँ से कुण्डलिनी नाम की महाशक्ति सर्पिणी-रूप में तीन-आधी कुण्डली मारकर सोई रहती है। शास्त्र कहते हैं :
“गुदा के ऊपर और लिंगमूल के नीचे सुषुम्ना के आरम्भ में रक्तवर्ण का चतुर्दल कमल है। उसकी कर्णिका अधोमुख है। उन दलों से स्वर्णिम आभा निकल रही है और उन पर व, श, ष, स – ये चार वर्ण अंकित हैं।”
इस चतुर्दल कमल के चारों ओर पीतवर्ण का अष्टकोणीय पृथ्वी-मण्डल है, जिसके मध्य में पृथ्वी बीज “लं” स्थित है। यही वह स्थान है जहाँ पृथ्वी तत्त्व का संपूर्ण साम्राज्य है।
पर इस पृथ्वी-मण्डल के ठीक मध्य में, बज्रा नाड़ी के मुख पर, एक उल्टा त्रिकोण है – जिसे तंत्र में “त्रिपुरसुंदरी का कामरूप पीठ” कहा जाता है। यह त्रिकोण विद्युत की तरह चमकचौंध करता हुआ, अत्यन्त कोमल और काममय है। इसी त्रिकोण के मध्य में “कंदर्प” नाम का प्राणवायु व्याप्त है – जो सम्पूर्ण काम-शक्ति का स्वामी है।
और इसी त्रिकोण के ठीक मध्य में स्थित है – स्वयम्भू शिवलिंग।
यह कोई पत्थर का लिंग नहीं, यह साक्षात् परब्रह्म का स्वयं-प्रकाशित चिन्मय लिंग है। इसके चारों ओर तीन-आधी कुण्डली मारकर कुण्डलिनी शक्ति सर्पिणी-रूप में लिपटी हुई है। उसका मुख स्वयम्भू लिंग के ऊपर बंद है और वह निद्रा में है। जब तक वह सोई रहती है, तब तक जीव संसार में भटकता है। जिस क्षण साधक की साधना से वह जागती है और अपना मुख खोलकर उस स्वयम्भू लिंग का चुम्बन करती है – उसी क्षण कुण्डलिनी-जागरण होता है और साधक को अपने भीतर ही परम शिव का दर्शन होता है।
तंत्र का महावाक्य है :
“आकाशरूपं लिंगं, पृथ्वीरूपिणी योनिः।
लिंग-योन्योः संयोगात् विश्वमिदं प्रसूतम्॥”
अर्थात् लिंग आकाश स्वरूप है (शिव) और योनि पृथ्वी स्वरूप है (शक्ति)। इन दोनों के संयोग से ही यह समस्त विश्व उत्पन्न, पालित और लय होता है। इसलिए लिंग और अर्घा (योनि-पीठ) दोनों मिलकर अर्धनारीश्वर शिव का स्वरूप हैं। बाहरी शिवलिंग में जो गोलाकार योनि-पीठ होता है, वह भी इसी त्रिकोण योनि का प्रतीक है जो मूलाधार में विद्यमान है।
इसलिए कहा गया है कि जब साधक कुण्डलिनी को जागृत करके मूलाधार के स्वयम्भू लिंग का साक्षात्कार करता है, तब उसे समझ आता है कि “शिवोऽहं” – मैं स्वयं शिव हूँ। बाहर मंदिर में फूल चढ़ाने या जल चढ़ाने से जितना पुण्य नहीं, उससे सहस्र गुना पुण्य अपने भीतर के शिवलिंग की एक झलक मात्र से हो जाता है।
शास्त्र का अंतिम निष्कर्ष यह है :
“मनुष्य शरीर ही सबसे बड़ा तीर्थ है, सबसे बड़ा यज्ञ है, सबसे बड़ा देवालय है।
इससे बड़ा कोई देवता नहीं।
इसलिए कहा – देवो भूत्वा देवं यजेत।
पहले स्वयं को देवता बना लो, फिर उसी अपने भीतर के परमदेव की पूजा करो।”
जब तक हम बाहर के पत्थर के लिंग को पूजते रहेंगे, तब तक हम शिव के दास बने रहेंगे।
जिस दिन हम अपने मूलाधार के स्वयम्भू लिंग में शिव को देख लेंगे, उस दिन हम स्वयं शिव हो जाएँगे।
इसी रहस्य को जानकर आदि शंकराचार्य ने कहा था :
“शिवलिंगं जगत् गुरुः
सर्वं शिवमयं जगत्।”
बाहर का शिवलिंग केवल एक सूचक है।
असली शिवलिंग तो तुम्हारे अपने शरीर के मूलाधार में विराजमान है।
उसे जगा लो – वही कुण्डलिनी जागरण है, वही शिव-दर्शन है, वही मुक्ति है।
ॐ नमः शिवाय।
शिवोऽहं शिवोऽहं।
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