"सीता पशवः सिकता कवध्यम् ।'
(अथर्ववेद १६ । ३ । १२)
【सीताः पशवः सिकताः ऊ बध्यम्।】
इस पञ्चपदी मन्त्र का आकार छोटा है, पर भाव बहुत बड़ा है। इसका अर्थ निकालने के पूर्व में पुनः सत्य को प्रणाम करता हूँ ।
सीता: = मरीचयः रश्मयः किरणाः =उज्ज्वल / श्वेत किरणें।
पशवः = नक्षत्राः राशयः = नक्षत्रगण / रशि समुदाय दृशिर् प्रेक्षणे + कुः= पशुः । अविशेषेण सर्वं पश्यतीति पशुः । पश्य ज्ञाने पंश्यते अनेन पशुः वा । नक्षत्र पशु हैं ये सबको देखते हैं। राशियाँ भी पशु हैं। नक्षत्र/राशियों के ज्ञान से जो लोग भविष्य को देखते हैं, वे भी पशु हैं जो अपनी बुद्धि से सृष्टि को देखते हैं, वे भी पशु हैं। पशु = ज्ञानी वा ऋषि । परमात्मा पशुपति है, त्रिकालदर्शी ।
सिकताः = रेत कण, शब्द-पद समूह।
(i) सिच् (सेचने) + अतच् + टाप्= सिकता जिसे सींचा/ तर किया जाता है, परस्पर एक करने के लिये। अर्थात् बालुई मिट्टी / रेती ।
(ii) सि (बाँधना सिनोति-सिनुते, सिनाति सिनीते) + कित (ज्ञाने चिकेति) + क्विप् + टाप = सिकता- ज्ञान को बाँधने एकत्रित करने का साधन अर्थात् शब्द जितने शब्द पद अथवा वर्ण/अल हैं, उनके द्वारा ज्ञान विचार को बाँध कर रखा जाता है।
आर्थवाक्य वेद मन्त्रादि सिकता हैं।
ऊ = बेङ् (तन्तुसन्ताने वयति ने बुनना, बटना) क्विप् बुनने योग्य यह आश्चर्य जनक अव्यय भी है।
बध्यम् = बध (चुरा. उभ, बाध्यति ते नियंत्रित करना बाँधना) + यत् । बाँधने योग्य ।
मन्त्रार्थ... नक्षत्र पशु हैं। राशियों पशु हैं। नक्षत्र २७ हैं। ये ताराओं के समूह हैं। राशियाँ १२ हैं। ये नक्षत्रों की समूह हैं। तारे अलग-अलग हैं। नक्षत्र अलग-अलग हैं। रशियों अलग-अलग हैं। ये सब अलग-अलग होकर भी आपस में बंधे हैं। इनके बँधे होने को भचक्र कहते हैं। यह चक्र एक है तथा अचर अटल है। तारों से किरणें निकलती हैं। ये किरणें उज्ववल हैं और सीता कहलाती हैं ये किरणें भी अलग-अलग वा असंख्य होकर परस्पर बंधी हुई हैं। बालू/रेत के कण अलग-अलग हैं किन्तु भारी होने से परस्पर बंधे रहते हैं। स्वर और व्यञ्जन वर्ण अलग-अलग होकर भी शब्द रूप में बंधते हैं। शब्द आपस में बंधकर वाक्य का रूप धारण करते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि सब कुछ बध्य (नियंत्रित) है। कोई बन्धन से बाहर नहीं है। मूर्ख लोग, दुष्ट लोग बन्धन मुक्त होने की बात करते हैं। बन्धन से बाहर रहने का विचार वेद विरुद्ध है। पर बन्धन से बाहर रहने की बात ठीक है। आत्म बन्धन/परमात्म बन्धन/ दिव्य बन्धन अनिवार्य एवं कल्याणकारी है। काल के बन्धन में कौन नहीं है ? जो अपने बन्धन में है, वह काल है। काल ही आत्मा है, ज्ञान है, परमेष्ठी है, सर्वोपरि है, एक है, अभिन्न है, अनादि अनन्त है।
प्रकाश और प्रकाशक दो हैं। परस्पर बँधे हुए होने से एक हैं। इसी प्रकार प्रत्येक तारा / नक्षत्र / राशि एवं उनके प्रकाश परस्पर बंधे होने से एक है। सीता और राम संबद्ध होने से एक हैं। जहाँ सीता वहाँ राम, जहाँ राम वहाँ सीता। यही द्वैताद्वैत है, सत्य है। रशूमि सोता को नमस्कार है, रश्मिवान् राम को नमस्कार है। प्रकाश सीता है, प्रकाशक राम है। एक को नमस्कार करने से दूसरे को भी नमसकार मिल जाता है। व्यवहार में दोनों को एक साथ नमस्कार किया जाता है। यह संसार राममय है, सीतामय है। संसार रूप में दोनों एक हैं। इस एक को गोस्वामी तुलसी दास जी महाराज इस प्रकार नमन करते हैं...
"सिया राम मय सब जग जानी।
करौं अनाम जोरि जुग पानी।”
( रामचरित मानस, बालकाण्ड )
【सीताराम का अर्थ है-ज्ञान और ज्ञानी ।】
प्रभा / ज्योति 'सीता' है। जिसने इस सत्य को जान लिया, वह शानी है, उसका जन्म सार्थक है तथा वह नित्य आदरणीय है। जिस ने सोता तत्व का साक्षात्कार नहीं किया, नहीं समझा ऐसे मूर्ख का जन्म वृथा है। ज्ञानी होने का दम्भ पालने वाले इन लोगों को मैं दूर से नमन करता हूं। इस सोता तत्व को वैदिकों/ ऋषियों ने जाना। हम सब इस ज्ञान के लिये उनके आभारी हैं। यह मन्त्र है...
"अर्वाची सुभगे भव, सीते वन्दामहे त्वा । यथा नः सुभगाससि यथा नः सुफलाससि ॥”
(ऋग्वेद, मण्डल ४, सूक्त ५, ७, मंत्र ६ ।)(तैत्तिरीय आरण्यक ६।६।२)
अन्वय-सुभगे सीते । अर्वाची भव ।
यथा नः सुभगा ससि यथा नः सुफला ससि (वयं) त्वा (म्) वन्दामहे ।
ससि = सस् अदा पर स्वप्ने (सोना) लट् म.पु. एक वचन ।
सस्ति ...सस्तः ...ससन्ति
ससि ...सस्मि... सस्थः
सस्मि... सस्वः... सस्मः
सुभगा= सु + भा (भाति दीप्तौ) + ड + गम् (गच्छति चलना) + ड + टाप् । = जो बहुत चमकती है तथा तीव्र गति से चलती है।
त सुफला = सु + फल् (फलति परिणाम युक्त होना, निष्पन्न होना तथा खण्ड-खण्ड करना, बलपूर्वक तोड़ना+अच्+टाप्।
= सुन्दर प्रचुर ज्ञान देने वाली तथा अन्धकार का विखण्डन करने वाली।
अर्वांची = (i) अर्वाचीन (अर्वाच् + ख) नवीन, प्राचीन विरोधी।
(ii) अथ + क्विन् + डीप् = अव्यय इस ओर सामने की ओर।
(iii) ऋ गतौ + वनिप् अर्वा (अर्वन्) + चि चिनोति चुनना मढ़ना जड़ना भरना खचित करना भरना + विवप् शीघ्रगामी होती हुई अन्तरतम को खचित करने, भरने वाली।
भव =भू सत्तायाम् लोट् मपु. एक वचन, होओ।
नः = अस्मभ्यम् हमारे लिये चतुर्थी बहु वचन अस्मद शब्द।
सुभगे = सुप्रकाशमयी गतिमती, सम्बोधन एक वचन ।
सीते =सूज्ज्वला सुधवला श्वेता, सम्बोधन एक वचन।
यथा = जैसे जिस प्रकार तुलनात्मक अव्यय ।
वन्दामहे = वंदु आत्मने पद लट् उ.पु. बहुवचन ।
=हम स्तुति करते हैं।
मन्त्रार्थ हे सुदीप्तिमती ज्योति । तू मेरे सम्मुख होओ, मेरे अन्तःकरण को जगमगा दो। जैसे व्यक्ति का सुन्दर भाग्य उसके करतल में ऊर्ध्वरेखा के रूप में लेटा पड़ा सोया रहता है तथा जैसे व्यक्ति के क्रियमाण कर्मों के फल (परिणाम) भविष्य में फल देने के लिये संस्कार रूप में सोये रहते हैं, वैसे ही तू मेरे मन बुद्धि चित्त में शयन करती पड़ी रह हे ज्योति । हम तुम्हारी स्तुति करते हैं।
अन्य मन्त्र इस प्रकार है...
"इन्द्रः सीतां नि गुणातु तां पूषानु यच्छतु।
सा नः पयस्वती दुहा मुतरामुत्तरां समाम् ॥"
(ऋग्वेद ४ ५७ ७, तथा - अथर्ववेद ३ । १७ । ४)
अन्वय- इन्द्रः सीताम् निगृह्णातु पूषा ताम् नु यच्छतु। पयस्वती सा उत्तराम् उत्तराम् समाम् दुहाम् नः [ददातु] |
ऋग्वेद का यह मन्त्र अथर्ववेद में ज्यों का त्यों नहीं है, अल्प परिवर्तन है जहाँ वेद में 'नु' है, वहाँ अथर्व में 'अभि' है तथा जहाँ 'यच्छतु' है, वहाँ 'रक्षतु' है।
इन्द्र: सीताम् निगृहणातु = सूर्य, दीप्ति को सतत धारण किये रहे, सदा चमकता रहे, मार्गदर्शन करता रहे, प्रकाश / ज्ञान विखेरता रहे। इन्द्रः =सूर्यः ।सीतां = ज्योत्स्नां ज्योति को ।निगृह्णातु = निदधातु, अच्छी तरह धारण किये रहे, पकड़े रहे।
पूषा ताम् नु यच्छतु =सूर्य, उस दीप्ति को हमें सदैव देता रहे प्रदान करता रहे। पूषा= सूर्यः । ताम् = सीताम् ज्योत्स्नाम्, पुष्टिकारक मंगलमयी ज्योत्स्ना को। नु= अवश्य। यच्छतु =यम् लोट् प्र.पु. एक व. देता रहे, देवे, ददातु।
पयस्वती सा = जलयुक्ता वह ज्योति, सामर्थ्यशालिनी वह प्रभा पा + असुन् पयस् [ जीवनीशक्ति] । पयस् + मतुप् =पयस्वत्→ पयस्वती (स्त्री) = जीवनदायिनी।
उत्तराम् उत्तराम् = क्रमशः शनैः शनैः उत्तरोत्तर धीरे-धीरे आगामी समय में, भविष्य में उद् + तरप् = उत्तर → उत्तर स्त्री + अम् = उत्तराम् =स्त्रियोचित रूप से, सौम्य होकर।
समाम् = सब सम्पूर्ण को सम + टाप् + अम्।
दुहाम् = अमृत को । दुह दोग्धि प्रपूरणे + अच् + टाप् + अम्।
यच्छतु = ददातु, देवे।
नः = अस्मान् हम सबको, अस्मभ्यम् हमारे लिये।
मन्त्रार्थ...सूर्य सदा ज्योतिर्मय रहे। सूर्य उस ज्योति को हमें सर्वदा दिया करे वह जीवनदायिनी सोवा क्रमशः सम्पूर्ण अमृत को बूंद-बूंद कर हमें पिलाने (जिससे हम अमरत्व को प्राप्त करे)।
ऋग्वेद के इन सीता मन्त्रों का अर्थ मैंने प्रणत बुद्धि से किया। मैं भक्त होकर अपने को दो समान भागों में बाँट कर मन्त्रार्थ करता हूँ। इसका भाव यह है कि मैं ही वक्ता/ लेखक तथा मैं ही श्रोता/पाठक बनता हूँ। ये दोनों भाग पूर्ण हैं। एक भाग है-व्यष्टि मन, अन्तर्बुद्धि। दूसरा भाग है-समष्टि मन, विश्व बुद्धि। इसी को भक्ति कहते हैं। यह भक्ति हो चक्र है। अपना सिर अपने पैर पर रखना चक्र है। कुण्डली इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। लग्न सिर स्थान है। द्वादश भाव चरण है। लग्न और द्वादश परस्पर सटे / मिले हुए हैं। अर्थात् आदि और अन्त का मेल है। बिना मेल के चक्र हो नहीं सकता। इस चक्र को देखने समझने में आनन्द है। मैं अपना सिर अपने चरण पर रखकर 'आत्मवत् सर्वभूतेष' के भाव में निमग्न होकर विश्वात्मा समस्तभूत समुदाय को प्रणाम करता हूँ। इस भाव की अनुभूति सीता तत्व को जाने बिना नहीं हो सकती। इसलिये जगन्माता सीता देवी की शरण ग्रहण करता हूँ।
ब्रह्म की माया शक्ति को सीता कहा जाता है। यह शक्ति ही जगत् का सृजन, पालन एवं संहार करती है। राम-बाल्मीकि मिलन के प्रसंग में यह कथन है...
"श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीश, माया जानकी।
जो सृजति जग पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की।"
(अयोध्या काण्ड, रा.च.मा.। )
श्रुतिवाक्य है...
"उत्पत्तिस्थितिसंहारकारिणी सर्वदेहिनाम् । सा सीता भगवती ज्ञेया मूल प्रकृति संज्ञिता ।"
( रामोत्तरतापिन्युपषनिद् ।)
वह भगवती सीता सभी देहधारियों की उत्पत्ति स्थिति एवं संहार की कारक है ।उसे मूल प्रकृति नाम से जाना जाता है।
यह सीता तत्व सर्वत्र विविध रूपों में विद्यमान होता है। यह रावण के लिये कालरात्रि है। महर्षि बाल्मीकि कहते है...
'यां सीतेत्यभिजानासि येथे तिष्ठति ते गृहे । कालरात्रीति तां विद्धि सर्वलंकाविनाशिनीम् ॥"
(सुन्दरकाण्ड ५२ । ३४)
रावण की सभा में हनुमान् जी कहते हैं- हे रावण । जिसे तुम सोता समझते हो जो तुम्हारे घर में अवस्थित है, उसे तुम कालरात्रि जानो। वह कालरात्रि सीता सम्पूर्ण लंका का नाश करने वाली है।
इस चण्डी सीता को अष्टम भाव के भय से मुक्त होने के लिये मैं बारम्बार नमस्कार करता हूँ। सीता जिस हृदय में रहती है, वह अशोक वाटिका कहलाता है। सीता जिस वृक्ष के नीचे रहती है, वह अशोक तरु कहा जाता है। सीता के सान्निध्य से शोक ठहरता नहीं। जहाँ शोक नहीं, वहाँ सीता। जहाँ सीता, वहाँ शोक कहाँ ? अष्टम भाव शोक है। शोक का निवारण होता है, सीता से सीता रहती है वहाँ, जहाँ तप है। तप सूर्य में है। सूर्य राम है। तपस्वी ही राम है। शोक मिटाने के लिये सीता औषधि है। यह औषधि तपस्वी के पास होती है। तपस्वी अशोक होता है। तस्मै अशोकाय नमः ।
सकिरण सूर्य ही सीताराम है। रश्मिहीन सूर्य अकल्पनीय है। सूर्यहीन रश्मि असत् है। दोनों एक हैं। एकाय नमः ।
सीता तत्व राम से अभिन्न है। राम का अर्थ है-सुन्दर मनोहर मनोरम मनोज्ञ मनोभावन मनःप्रिय । जहाँ मन जाय, जिसमें मन रमण करे, जो मन को अच्छा लगे, वह राम वा सुन्दर है। राक्षस के लिये, चोर के लिये, मच्छर के लिये अन्धकार राम है। देवता के लिये, संत के लिये, वनस्पति के लिये प्रकाश राम है। संसार की हर वस्तु किसी न किसी को प्रिय है। जो जिसे प्रिय है, वह उसके लिये राम है। अतः सब कुछ राममय है, राम है। सृष्टि के अणु में परमाणु में पिण्ड में ब्राह्माण्ड में कण-कण में देह-देह में राम अपरोक्ष रूप से है तथा ये सब प्रत्यक्षतः राम है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं।【 रामाय नमः। अनेन रम्यते (कर्मणि) रामः । अस्मिन् (पिण्डे ब्राह्माण्डे वा) रमयति-ते ( णिचि) रामः अयम् (आत्मा सूर्य वा) रमति (कर्तरि) रामः । यः रिरंसते (सनि) स रामः। यः रंरम्यते (यङि). स रामः सूर्यः वा एषः (सूर्य) रंरन्तिरंरमीति (यङ्लुकि) स रामः ।】 जो क्रीडाशील है, जिसमें क्रीडा हो रही है, जो क्रीडा के लिये प्रेरित करता रहता है, जो बार-बार कोड़ा करता है, जिसमें क्रीडा की इच्छा है किन्तु क्रीड़ा नहीं करता, जो क्रीड़ा करते हुए कभी नहीं थकता, वह राम है। सूक्षम शरीर, स्थूल देह में क्रीडा करता है। कारण शरीर सूक्षमवपु के भीतर क्रीडा करता है। मन-बुद्धि-अहंकार सतत कारण शरीर में क्रीडारत रहते हैं। आत्मा (चेतन तत्व) सदैव मन-बुद्धि-अहंकार में क्रीडा करता है। आत्मा ही सूर्य है। इसमें सब लोग क्रीडा करते हैं। यह सब राम है। राम रम्य है। इसमें चित्त उपराम होता है, सबको आराम मिलता है। सृष्टि का विराम राम है।
१. राम और दशरथ का अभिन्न संबंध है। शरीर में १० इन्द्रियां दशरथ हैं। मन राम है। मन के बिना इन्द्रियाँ मृत हैं- राम के बिना दशरथ मृत। ब्रह्माण्ड में १० दिशाएँ दशरथ हैं। इन दिशाओं को आलोकित करने वाला सूर्य राम है। सूर्य के बिना अन्धकारमयता के कारण दिशा का ज्ञान असम्भव है। अर्थात् सूर्य विहीन दिशाएँ मृत है- राम के अभाव में दशरथ मृत। इस सत्य को जो जानता पहिचानता है, वह ब्राह्मण है। ब्राह्मणाय नमः। दाशरथिरामाय नमः ।
२. राम और सीता का अनन्य संबंध है।
सो (दिवा. पर स्यति, प्रे. साययति ते, इच्छा, सिषासति, कर्म वा सीयते, वधे नाशे वा) + क्त = सित- अग्नि, नाशक, हन्ता। सित+ टाप्= सिता =सीता-मारने वाली, वध करने वाली पीडाकारी, विनाशकारी। सूर्य की रश्मिय अन्धकार का विनाश करती हैं, अपनी उष्णता से कोमल प्राणियों को पीड़ा पहुँचाती हैं। सूर्य की किरणें श्वेत होती हैं, सुन्दर होती हैं। अतएव, सोता = सूर्य रश्मि ज्योत्स्ना आभा प्रभा विभा गौरवर्णा अग्निवर्णा दाहिका सुन्दरी सूर्य दाहक है तो उसकी रश्मियाँ दाहिका । मानव देह में उसकी प्रज्ञा ही सोता है। पिण्ड में, सीता = प्रज्ञा, बुद्धि मति शेमुखी श्री ब्राह्माण्ड में, सीता रश्मि = किरण उष्मा ज्वाला दर्शना पिण्ड की सीता का स्वामी आत्मा है तो ब्राह्माण्ड की सीता का पति सूर्य है। सीतापतये नमः ।
३. राम और रावण का घनिष्ठ संबंध है।
रू (रौति अदा.पर. दहाड़ना चिल्लाना) + युच् = रवण-शब्द करने वाला, मेघ, बादल। बादल गरजते दहाड़ते चिल्लाते हैं, इसलिये ये रवण हैं। रवण र व कर्ता = मेघ।
रवण + अण् = रावण- अन्धकार ।आकाश में मेघों की गहन घटा अन्धकार को उत्पन्न करती . है। इसलिये रवण गोत्र होने से रावण अंधकार है। अन्धकार का गोत्र मेघ है। मेघ काला है। अन्धकार भी काला है। सूर्य राम है। सूर्य की किरण सोता है। अन्धकार, सूर्य रश्मि / प्रकाश का अवरोधन / अपहरण करता है। अतः ज्योति = सीता। इसका अपहर्ता अन्धकार =रावण। किरणमाली सूर्य= सीतापति राम । सूर्य के सम्मुख मेघ अधिक देर तक नहीं टिक पाते। मेघ नष्ट/ विच्छिन्न होते हैं, अन्धकार का निरसन होता है। यही राम द्वारा रावण का वध होना कहा गया है। इसमें हेतु है, सीता = उष्ण रविरश्मि यह बाहरी घटना है। इस पिण्ड के अन्दर सीता = ज्ञान, रावण= अविवेक अज्ञान, राम = आत्मा/प्रबुद्धमन/विवेक । राम-रावण का युद्ध बाहर और भीतर सतत चलता रहता है। सीता का अपहरण होता रहता है। राम मरता है। सीता पुनः राम को मिलती है। पुनः लोक कल्याण के लिये सीता-राम वियोग-सीता का परित्याग होता है। ज्ञान का उदय और अस्त पुनः पुनः होता है। यही राम कथा है, सूर्योपाख्यान है। हर पिण्ड में आजीवन यह कथा होती रहती है। इस कथा को जो भली भाँति जानता है, वह ब्राह्मण है। रावणारि रामाय नमः ।
एक बार ज्ञानवान् होने पर व्यक्ति का सदैव ज्ञानी बनकर जीवन जीना व्यावहारिक नहीं है। ज्ञानी को अज्ञानी बन कर संसार में रहना चाहिये। उसे ज्ञानियों के बीच में ज्ञानी तथा मूर्खों के बीच में मूर्खो जैसी बात करना चाहिये। मूखों में भी ज्ञान होता है, किन्तु उनका ज्ञान निम्न स्तर का होता है। जीवन में इस स्तर के ज्ञान की आवश्यकता ज्ञानी को भी पड़ती है। विशुद्ध ज्ञानी, समाज के लिये अनुपयोगी है। अतः उसका जीवन व्यर्थ है। जैसे शुद्ध सोने से कोई आभूषण नहीं बन सकता। आभूषण के लिये उसमें मिलावट आवश्यक है। संसार का ऐसा स्वरूप ही है। सत्यानृत/ ज्ञानाज्ञान / प्रकाशान्धकार का युग्म ही संसार है, व्यवहार है।
ज्ञान कभी नष्ट नहीं होता। वैसे ही जैसे सूर्य कभी प्रकाशहीन नहीं होता। कभी दिन में (बादलों के कारण वा ग्रहण लगने पर) अन्धकार छा जाता है तथा कभी (बादलों के हटने वा ग्रहण समाप्त होने पर) सूर्य प्रकट हो जाता है। ऐसे ही सुसंग से ज्ञान बढ़ता तथा कुसंग से ज्ञान क्षीण होता है। बढ़ना = उत्पन्न होना, क्षीण होना = नष्ट होना। गोस्वामी जी कहते है...
"कबहुँ दिवस महें निविड़ तम, कबहुँक प्रगट पंतग ।
बिनसइ उपजड़ ज्ञान जिमि पाइ कुसंग सुसंग ॥"
( किष्किंधाकाण्ड, रा.च.मा. ।)
सत्संग से ज्ञान उत्पन्न होता है, बढ़ता है, फूलता- फलता है। इसलिये सत्संग प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये। दुष्ट संग से ज्ञान का लोप होता है। अतः प्रयत्नपूर्वक दुस्संग से बचना चाहिये।
अष्टम भाव ज्ञान का निकष है। अभयपद प्राप्त करना ज्ञान है। अष्टम भाव मृत्यु / हर प्रकार का भय है। भय उपस्थित होने पर ही अभयतत्व की परीक्षा होती है। ज्ञानी सर्वथा अभय होता है। जब तक भय है, तब तक शांति नहीं। ज्ञानी शान्त होता है। मृत्यु सम्मुख होने पर जो विचलित न हो उद्विग्न न हो हलचलहीन हो प्रशान्त हो, वह ज्ञानी है। अभय वही है जो अभय का स्मरण करते हुए अभयस्वरूप होवे । राम अभय है। जीव अभयपद पर प्रतिष्ठित होकर अष्टम भाव की अशांति को पार कर जाता है, केवल राम नाम की दिव्य नौका से दशरथ पुत्र राम मनुष्य नहीं है, वह अज अजित निर्गुण ब्रह्म है। गोस्वामी जी का वाक्य है...
"तात राम कहुँ नर जनि मानहु ।
निर्गुन ब्रह्म अजित अज जानहु ।"
( किष्किन्धाकाण्ड, रा.च.मा. । )
यम दूतों के भय से अभय होने के लिये राम नाम पर्याप्त है। राम नाम जिहा की शोभा है। 'राम नाम बिनु गिरा न सोहा । "( किष्किन्धाकाण्ड) राम का भजन करने से जीव का कल्याण होता है।
१. 'भजेहुँ राम शोभा सुख सागर ।'
२. भजेहुँ राम होइहि कल्याना'
( लंकाकाण्ड )
३. 'भ्रम तजि भजहु भगत भयहारी। (सुन्दरकाण्ड )
४. मोह मूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान ।
भजहु राम रघुनायक, कृपासिंधु भगवान ॥"
( सुन्दरकाण्ड )
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