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Tuesday, 2 December 2025

भारत व्यवस्थित-अव्यवस्था पश्चिम अव्यवस्थित-व्यवस्था

भारत में एक व्यवस्थित अव्यवस्था है। पश्चिम में एक अव्यवस्थित व्यवस्था है। यह दोनों चिंतन में मूल भेद है। एक कनाडा का ब्लॉगर आकर कह रहा था कि भारत में सब बहुत केआटिक (अस्त व्यस्त) दिखता है लेकिन बावजूद इसके यहाँ पर आपके साथ कुछ भी बहुत अनप्रेडिक्टेबल (अप्रत्याशित) घटित नहीं होता। उसका जो कहने का आशय मुझे समझ आया वह ये था कि गाड़ियाँ अस्त व्यस्त चल तो रही हैं लेकिन न वो आपस में लड़ भीड़ रही हैं और न लोग एक दूसरे से लड़ भीड़ रहे हैं। एक दूसरे को हॉर्न तो दे रहे हैं लेकिन अंततः कोई एक तुरंत समझौता कर ले रहा है कि ठीक है तुम मुझसे तेज निकले, इसलिए तुम आगे जाओ। प्रतियोगिता तो हर चौराहे चल रही है कि किसी तरह मेरी गाड़ी पहले मुड़ जाये और दूसरा वाला भाड़ में जाये लेकिन जैसे एक ज़्यादा चालाक निकलता है, दूसरा तुरंत उसे स्वीकार कर लेता है। चौराहे पर बीस आदमी दुकान लगाकर बैठे हैं, सब आपको आकर्षित करने के प्रयास में शोर मचा रहे हैं लेकिन जब आप किसी के यहाँ चले जाते हैं तो बाक़ी शांत हो जाते हैं। यहाँ इतनी भारी भीड़ है लेकिन कोई अचानक से आप पर हमला नहीं कर सकता। कोई अचानक आपको विदेशी बताकर सड़क पर प्रताड़ित नहीं कर सकता। और यदि आप किसी व्यक्ति से सहायता मांगे तो वह भले आनाकानी कर दे लेकिन समाज से सहायता माँगेंगे तो उसे सहायता करना मजबूरी है क्योंकि इस अव्यस्थित से दिखने वाले समाज के मूल में एक धार्मिक (सबको धारण करने वाली मानसिक वृत्ति) व्यवस्था मौजूद है। ब्लॉगर कहता है कि मैं वैनकुअर में रहता हूँ। वहाँ लोग सड़कों पर पड़े हैं, कोई ड्रग लेकर पड़ा है, कोई भीख मांगने वाला पड़ा है। हालांकि भारत की तुलना में वह बहुत व्यवस्थित शहर है लेकिन वहाँ कोई अचानक आपके सामने खड़ा हो सकता है और आपके साथ गाली गलौज कर सकता है। कोई अचानक खड़ा होकर आप पर हमला कर सकता है। आप बस में बैठे हैं तो कोई अचानक पागलपन के साथ खड़ा होकर आपको आपके रेस के लिए आपको गाली दे सकता है, दुर्व्यवहार कर सकता है लेकिन यह भारत में लगभग असंभव है कि कोई इस तरह का हमला, गाली गलौज आपके साथ कम से कम समाज के बीच में करने की हिम्मत करे। व्यक्तिगत रूप से ग़लत लोग हर जगह मिल जाएँगे लेकिन समाज में अथवा समाज के रूप में किसी की ऐसी हिम्मत नहीं। 
मूलतः पश्चिम में जो समाज धीरे धीरे बना है वह एक “भौतिक रूप से व्यवस्थित किंतु घोर व्यक्तिवादी, एक दूसरे से अपरिचित, एक दूसरे से अलग थलग” व्यक्तियों का निर्माण करता है जबकि भारत में जो समाज पुराने समय से है वह एक “भौतिक रूप से अव्यवस्थित किंतु सर्व मंगल की कामना करने वाले, एक दूसरे को अपना मानने वाले” व्यक्तियों का निर्माण करता है। 
हमारा केवल एक उद्देश्य होना चाहिए कि हम इसके आंतरिक स्वरूप से छेड़छाड़ न करें अर्थात् हमारे संस्कृति के भीतर जो एकात्मता और सर्वकल्याण की भावना है उसका पूर्ण संरक्षण करते हुए इसे वाह्य रूप से भी व्यवस्थित बनाने का जरा सा प्रयास करें और यहाँ व्यवस्थित बनाने का मतलब “एकरूपता” नहीं है बल्कि इसका स्पष्ट मतलब है “सौंदर्यबोध” अर्थात् आंतरिक रूप से जिस तरह से हम एक संतोष की अनुभूति करते हैं उसी तरह से बाह्य रूप से भी हमें इस समाज को देखकर संतोष का भाव आए, न इससे कम, न इससे अधिक।
साभार - भूपेंद्र सिंह 
वयं राष्ट्रे जागृयाम 

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