संध्या-वन्दन का फल क्या है? जो द्विज प्रतिदिन संध्या करता है वह पाप रहित होकर सनातन ब्रह्मलोक में जाता है, जितने भी इस पृथ्वी पर विकर्मस्थ द्विज हैं, उनके पवित्र करने के लिए स्वयंभू ब्रह्मदेव ने संध्या का निर्माण किया है, रात्रि में तथा दिन में जो भी अज्ञान अर्थात् पाप किया गया हो वह तीनों काल की संध्या-वन्दन से नष्ट हो जाता है।
संध्या न करने का दोष क्या है? जिसने संध्या को नहीँ जाना तथा उपासना भी नहीं की वह जिवित शुद्र है, और संध्या न करने पर कुत्ते की योनी में जन्मता है, संध्या न करने वाला सदा अपवित्र है, सभी कार्यों के अयोग्य है, दूसरा भी यदि कोई काम करता है तो उसका फल नहीं मिलता।
संध्या की व्याखा क्या है? सूर्य नक्षत्र से वजित अहोरात्र की जो संधि है, तत्त्वदर्शी हमारे पूर्वज ऋषि-मुनियों ने उसी को संध्या कहा है।
संध्या-वन्दन का काल अर्थात् समय कब होना चाहिये? संध्या का समय सूर्योदय से पूर्व ब्राह्मण के लिए दो मुहूर्त है, क्षत्रिय के लिए इससे आधा और उससे आधा वैश्य के लिए, ताराओं से युक्त समय अति उत्तम समय है, ताराओं के लुप्त हो जाने पर मध्यम, सूर्य सहित अधम, इस प्रकार प्रातः संध्या तीन प्रकार की है।
तीनों काल की संध्या का नाम क्या है? प्रभात काल की संध्या का नाम- गायत्री, मध्याह्न काल की संध्या का नाम- सावित्री और सायं काल की संध्या का नाम- सरस्वति है, ऐसा तत्त्वज्ञ ऋषियों का वचन है।
त्रैकालिक संध्या के वर्ण कौन-कौन से हैं? प्रभात काल की संध्या- गायत्री का, वर्ण- लाल है, मध्याह्न काल की संध्या- सावित्री का, वर्ण- शुक्लवर्ण और सायं काल की संध्या का वण- कृष्णवर्ण है, उपासनार्थियों की उपासना के लिए है
त्रैकालिक संध्या का रूप क्या है? प्रातःकाल की संध्या- गायत्री और ब्रह्मरूपा, मध्याह्न संध्या- सावित्री और रुद्ररूपा तथा सायं काल की संध्या- सरस्वती और विष्णुरूपा है।
त्रैकालिक संध्या का गोत्र क्या-क्या है?
प्रातः काल की संध्या- गायत्री का गोत्र हैं सांङ्ख्यायन, मध्याह्न काल की संध्या- सावित्री का गोत्र हैं कात्यायन एवं सायं काल की संध्या- सावित्री का गोत्र बाहुल्य है।
त्रैकालिक संध्या में कौन-कौन धातु पात्र का प्रयोग करना चाहिये? भग्न तथा टूटे पात्र से संध्या करना निन्दिन है, उसी प्रकार धारा से टूटे हुए जल संध्या करना मना है, नदी में, तीर्थ में, ह्रद में, मिट्टी के पात्र से, उदुम्बर के पात्र से, सुवर्ण-रजत या ताम्र एवं लकडी के पात्र से संध्या करनी चाहिये।
त्रैकालिक संध्या-वन्दन में कौन-कौन से पात्र अपवित्र है? काँसा, लौह, शीशा, पीतल के पात्रों से आचमन करने वाला कभी शुद्ध नही हो सकता, अतः इन धातुओं के बने पात्र अपवित्र हैं, इन्हें संध्या-वन्दन मेँ प्रयोग नहीं लेना चाहिये।
किन-किन स्थानों पर संध्या-वन्दन करना विशेष फलप्रद है?
अपने धर अर्थात् अपने निवास स्थान पर संध्या-वन्दन करना समान फल प्रदायक है, गायों के स्थान पर सौगुना, बगीचा तथा वन में हजार गुना, पर्वत्र पर दस हजार गुना, नदी के तट पर लाख गुना, देवालय में करोड़ गुना, भगवान् सदाशिव शङ्कर के सम्मुख बैठकर जप करना, संध्या करने से अनन्त गुना फल मिलता है।
धर के बाहर संध्या करने से झूठ बोलने से लगा पाप, मद्य सूँघने से लगा पाप, दिवा मैथुन करने से लगा पाप नष्ट होता है, अतः संध्या धर से वाहर पवित्र स्थान में करना सबसे लाभदायक है।
सन्ध्या-वन्दन करने का समय अगर निकल जाए तो क्या करना चाहिये? किसी कारण से संध्या का समय निकल जाये या विलम्ब हो जाये तो श्री सूर्यनारायण भगवान् को चौथा अर्घ देना चाहिये, इस अर्घ दान से कालातिक्रमणजन्य पाप नष्ट होता है।
संध्या-वन्दन करने के लिये कौन से आसन उपयुक्त है? कृष्णमृग चर्म पर बैठने से ज्ञान सिद्धि, व्याघ्रचर्म पर बैठने से मोक्ष प्राप्ति, दुःख नाश के कम्बल पर वैठना चाहिये, अभिचार कर्म करने के लिए नील वर्ण के आसन, वशीकरण के लिए रक्तवर्ण, शान्ति कर्म के लिए कम्बल का आसन, सभी प्रकार के सिद्धि के लिये कम्बल का आसन श्रेयस्कर है।
बांस पर बैठने दरिद्रता,पथ्थर पर बैठने से गुदा रोग, पृथ्वी पर बैठने से दुःख, बिधी हुई लकड़ी अर्थात् छेद किया हुआ {किल लगी हुई } पर बैठकर संध्यादि करने से दुर्भाग्य, घास पर बैठने से धन और यश की हानी, पत्तों पर बैठकर जप करने या संघ्या-वन्दन करने से चिन्ता तथा विभ्रम होता है।
काष्ठासन तथा वस्त्रासन का माप क्या होना चाहिए? काष्ठासन चौबीस अंगुल लम्बा तथा अट्ठारह अंगुल चोड़ा, चार या पांच अंगुल ऊँचा होना चाहिए, वस्त्रासन दो हाथ से ज्यादा लम्बा नहीं होना चाहिये तथा एक हाथ से ज्यादा चौड़ा न हो, तीन अंगुल से ज्यादा मोटा नहीं होना चाहिये।
लकड़ी की खड़ाऊँ कहाँ-कहाँ नहीं पहना चाहियें? आग्न्यागार में, गौशाला में, देवता तथा ब्राह्मण के सम्मुख, आहार के समय, जप के समय पादुका का त्याग कर देना चाहिये।
संध्या करते समय मुख किस दिशा में रखें? पवित्र होकर ब्राह्मण संध्योपासना करते समय पूर्व दिशा में मुख करके बैठे, तथा जप भी पूर्वाभिमुख करे, जहाँ कर्त्ता का अंग न उल्लेख हो वहाँ दक्षिण अंग समझना चाहिये, जप होमादि कर्मों में जहाँ का उल्लेख न हो वहाँ पूर्व ईशान ओर उत्तर दिशा समझें।
दैवकार्य रात्रि को सदा उत्तराभिमुख करना चाहिये, शिवार्चन भी उत्तराभिमुख करना चाहियें, जहाँ निरन्तर सूर्य उगता है वेदज्ञ उसी को प्राची पूर्व दिशा कहते हैँ, ईशानमुख या पूर्वाभिमुख होकर संध्या-वन्दन करें।
भस्म धारण कैसे करें? प्रातः जल मिलाकर, मध्याह्न चंदन मिलाकर तथा सायं केवल भस्म ही लगावें।
भस्म कौन सी लेनी चाहियें? श्रीगङ्गाजी के तीर पर उत्तम मिट्टी को जो ललाट पर लगाता है, वह तमोनाश हेतु भगवान् श्रीसूर्यदेव के तेज को लगाता है, गोमय को जलाकर की हुई भस्म ही त्रिपुण्ड्र के योग्य है, स्नानकर मिट्टी-भस्म तथा चंदन व जल से त्रिपुण्ड्र अवश्य करें, किन्तु जल में त्रिपुण्ड्र करें।
भस्म धारण के प्रकार क्या हैं? भस्म से त्रिपुण्ड्र, मिट्टी से ऊर्ध्व, अभ्यंगोत्सवादि रात्रि में चंदन से दोनों करें, गृहस्थ को सदा जल मिश्रित ही भस्म लगाना चाहिये, यति को केवल भस्म ही लगाना चाहिये, दाहिने हाथ की मध्य की तीन अंगुलियों से विद्वान लोग त्रिपुण्ड्र धारण करें जो सब पापों को नाश करने वाला है, जो त्रिपुण्ड्र धारण नहीं करता उसके लिए सत्य, शौच, जप, होम, तीर्थ, देव-पूजन सभी व्यर्थ हैं।
भस्म कहाँ-कहाँ धारण करें? ललाट, हृदय, नाभी, कण्ठ, बाहुसंधि, पृष्टदेश और शिर इन स्थानों में भस्म लगावें।
त्रिपुण्ड्र कितना लम्बा होना चाहिये? ब्राह्मण के लिए आठ अंगुल लम्बा, क्षत्रिय के लिए चार अंगुल लम्बा, वैश्य के लिए दो अंगुल लम्बा, शेष शुद्रादि के लिए एक अंगुल लम्बा त्रिपुण्ड्र लगाना चाहिये।
त्रिपुण्ड्र किसे कहते हैं? भ्रुवों के मध्य से प्रारम्भ कर जब तक भ्रुवों का अन्त न हो, मध्यमानामिका अंगुलियों से मध्य में प्रतिलोम अंगुठे से जो रेखा की जाती है उसे त्रिपुण्ड्र कहते हैं।
करमाला किसे कहते हैं? मध्याङ्गुली के आदि के दो पर्वों को जप काल में छोड़ देना चाहिये, स्वयं श्रीब्रह्माजी का कथन है कि उसे मेरु मानना चाहिये।
मेरु लंघन ने क्या दोष लगता है? मेरुहीन तथा मेरु के लांघने वाली माला अशुद्ध होती है, तथा निष्फल भी है।
माला किस चीज़ की उत्तम होती है? अरिष्ट पत्र एवं बीज, शङ्ग पद, मणि, कुशग्रन्थी, रुद्राक्ष ये क्रमशः उत्तरोत्तर उत्तम है।
जप के लिए माला किसकी होनी चाहिये? प्रवाल, मुक्ता, स्फटिक, ये जप के लिए कोटी फलप्रद देने वाली भाला मानी गई है।
भस्म न धारण करने से क्या दोष लगता है? स्नान, दान, जप, होम, संध्या-वन्दन, स्वाध्यायादि कर्म ऊर्ध्व पुण्ड्र या त्रिपुण्ड्र विहिन के लिए निरर्थक है, अर्थात् इनका कोई भी फल नहीं मिलता, ललाट पर तिलक कर के ही संध्या-वन्दन करें, जो ऐसा नहीं करता उसका किया हुआ सब निरर्थक है, तुलसी की माला अक्षय फल दायक मानी गयी है।
माला का दाना किन-किन अंगुलियों से बदला जाये? अंगुठे और मध्यमा अंगुली से माला का दाना बदलना चाहिये, तर्जनी अर्थात् अंगुठे की बगल वाली अंगली से माला के मनके अर्थात् दाने का स्पर्श भी नहीं करना चाहिये, क्योंकि मध्यमा अंगुली आकर्षण करने वाली तथा सब प्रकार की सिद्धि प्रदायक होती है ।
कर्म विशेष में दर्भ का क्या प्रमाण है? ब्रह्मयज्ञ में गोकर्णमात्र दो दर्भा, तर्पण में हस्तप्रमाण तीन दर्भा।
गोकर्ण किसे कहते हैं? तर्जनी और अंगुठे को फैलाकर जो प्रादेश प्रमाण होता है, उसे ही गोकर्ण कहते हैं।
वितरित किसे कहते हैं? कनिष्टिका तथा अंगुठे के फैलाने पर वितरति होता है, जिसे विलांत या द्वादशाङ्गुल कहते हैं।
पवित्र कैसी दर्भा का होता है? अनन्त गर्भवति अग्रभाग सहित दो दलवाली प्रादेशमात्र कुश का पवित्र होता है, मार्कण्डेय पुराण के मत से ब्राह्मण को चार शाखा वाली दर्भा से, क्षत्रिय को तीन शाखा वाली दर्भा और वैश्य को दो शाखावाली दर्भा से पवित्र बनाना चाहिये।
सपवित्र हस्त से आचमन करना या नहीं करना चाहिये? सपवित्र हस्त से आचमन करने से वह पवित्र उचिष्ट नहीं होता है।
कौन-कौन से कर्म दोनों हाथों में दर्भा लेकर करना चाहिये?
स्नान, दान, होम, जप, स्वाध्याय, पितृकर्म तथा संध्या-वन्दन दोनों हाथ में दर्भा लेकर करें।
पवित्र किसे कहते हैँ? दो अंगुल जिसका मूल भाग हो, एक आंगुल की ग्रन्थी हो और चार अंगुल जिसका अग्रभाग हो उसे पवित्र कहते हैं।
ब्रह्मग्रन्थी और वर्तुल ग्रन्थी कहाँ-कहाँ लगाना चाहिये? ब्रह्मयज्ञ में, जप में, पहने जाने वाले पवित्र में ब्रह्मग्रन्थी लगावें।
ब्रह्मग्रन्थी तथा वर्तुल ग्रन्थी में क्या भेद हैं? ब्रह्मग्रन्थी तथा वर्तुल ग्रन्थी परस्पर विपरीत क्रम से हैं।
कुशा तथा दूर्वा की पवित्री में अधिक उत्तम कौन हैं? कुशा तथा दूर्वा की पवित्री से भी उत्तम सुवर्ण की पवित्री है।
कुशा के अभाव में क्या-क्या लेना चाहिये?
कुशा के अभाव में काश, क्योंकि कुश काश के समान हैं, काश के अभाव में अन्यदर्भा भी उचित है, दर्भा के अभाव में स्वर्ण, रोप्य, ताभ्र भी ग्रहण किया जाता है।
दश दर्भायें कौन-कौन से होते हैं? कुश, काश, शर, दुर्वा, यव, गोयुम, बलबज, सुवर्ण, रजत और ताम्र ये दश दर्भा कहलाती हैं।
यदि दोनों हाथो के लिए पवित्री न हो तो क्या करें? यदि दोनों हाथो के लिए पवित्री न हो तो दाहिने हाथ के लिए तो पवित्री अत्यावस्यक है।
सुवर्ण पवित्री कितने वजन की हो? सुवर्ण पवित्री सोलह माशे के ऊपर वजन की बनानी चाहिये, इससे कम वजन की नहीं हो।
शिखा बंधन मंत्र से करें या वैसे ही? अमन्त्रक शिखा बंधन करने से जप होमादि सभी कर्म वृथा हो जाते हैं।
सदा यज्ञोपवीत और शिखा बाँधे क्यों रखना चाहिये? बिना यज्ञोपवीत तथा बिना शिखा बाँधे रहने वाले व्यक्ति का किया हुआ सभी कर्म निरर्थक हो जाता है, उसका कोई फल नही प्राप्त होता।
शिखा बंधन सहित कौन-कौन कार्य करें? शौच, दान, जप, होम, संध्या, देवपूजादि कार्य शिखा बाँध कर ही करना चाहिये।
शिखा कहाँ-कहाँ खुली रखें? शयन, स्त्रीसंग, भोजन तथा दन्तधावन करते समय शिखा खुली रखनी चाहिये।
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