कहते हैं वे विराट पुरुष के मुख से निस्सृत हुए
देवता उन्हें भूदेव कहते थे
प्रियदर्शी अशोक ने कहा
वे ब्राह्मण थे
वे हर पवित्र और अपवित्र के बीच
लकीर खींचना चाहते थे
उन्होंने अराजकता को वर्ण के अनुशासन में कसा
अग्नि में अपनी समिधाएं सौंपी
और नाद किया अहम् ब्रह्मास्मि! अहम् ब्रह्मास्मि!!
वे ब्राह्मण थे
यदि तर्क का सहारा लिया जाए तो
वह भी मनुष्य की तरह पैदा होते थे
उनके पास बड़ी-बड़ी गाथाएँ थीं
शाप देने की
संतान देने की
वरदान देने की
भिक्षा माँगने की
और मोक्ष की
वे व्यवस्था के शीर्ष पर घुटनों तक
और अपने दंभ में कंधों तक
वे डूबे होते थे
हाथ संकल्प का जल
और मुट्ठियों में कुश लिए
वे सम्राटों का भाग्य निर्धारण करते रहे
न! युद्ध के लिए नहीं
वे राज्य करने के लिए युद्ध नहीं लड़ते थे
वे सम्राटों को बनाते और मिटाते थे
वे चाणक्य और विद्यारण्य थे
वे ब्राह्मण थे
वे मध्य-एशिया के पठारों से आए
या यहीं की माटी से उपजे
यह बहस का विषय था, उनके अस्तित्व का नहीं
वे विलुप्त सरस्वती के किनारों पे उगे
वे हिमालय की धवल गुफाओं से उतरे
वे हिमयुग की परतों को चीरकर आए
या फिर भी वे इसी समाज के हिस्सों से आए
वे आए
क्योंकि वे आ सकते थे
वे ब्राह्मण थे
वे महत्त्वपूर्ण तो थे
लेकिन उनके पास दरिद्रता की स्मृतियाँ थीं
वे सुदामा की तरह जीते थे
और तंदुल चबाकर संतोष कर लेते थे
ज्ञान के लिए वे बेचैन थे
वे ब्राह्मण थे
यदि सच को सच की तरह कहा जा सकता है
तो सच को सच की तरह सुना जाना चाहिए
कि वे शास्त्र और शस्त्र के बीच ऐसे आवाजाही करते थे
कि भेद मिट जाता था
कि वे अग्नि को समिधा सौंपते पुरोहित थे
या फरसा लिए योद्धा
वे ब्राह्मण थे
वे न होते तो चाणक्य का अर्थशास्त्र न होता
शुंग न होते , गुप्त न होते , पेशवे ना होते
शून्य न होता, आर्यभट्ट न होता
त्रिपिटक न होते, उपनिषद न होते
संस्कृत का व्याकरण न होता
निराला की वह तोड़ती पत्थर न होती
मुक्तिबोध का ब्रह्मराक्षस ना होता
वे न होते तो तुलसी की चौपाई को गाने वाला कंठ न होता
वे न होते तो शंकर का अद्वैत न होता ,नागार्जुन का शून्यवाद ना होता
ब्राह्मण न होते तो 1857 का विद्रोह न होता
आजादी का संग्राम न होता
वे थे तो आजाद थे, वे थे तो तिलक थे
वे थे तो नेहरु थे , वे थे तो सावरकर थे
वे थे तो MN रॉय थे , वे थे तो बाजपेयी थे
वे ब्राह्मण थे
वे घाटों में थे , मंदिरों में थे , गुरुकुलों में थे
वे शालाओं में थे, वे नगरों में थे
वे गाँवों में थे
वे ब्राह्मण थे।
मगर उनके बच्चे अब शहर के फ्लैटो में हैं
वे सोचते हैं कि काश वे सरहद पार कर जाए
पश्चिम की किसी अनाम गली में
सुकून से बस जाएँ
वे सोचते हैं और सोचकर डरते हैं
आरक्षण की सूचियों को देखकर वे चुप होते है
वे चुप होते हैं और चुप होकर डरते हैं
वे जितना कलयुग के आने से डरते है
उतना ही समाज उच्छृखंल हो जाने से डरते हैं
अपने प्रभुसत्ता के जाने से डरते हैं
वे दलितों के उत्थान से नहीं डरते हैं
वे अपनी संतानों के पिछड़ने से डरते हैं
वे मंडल से डरते हैं , वे अपने ही थामे कमंडल से भी डरते हैं
वे अकड़ते हैं, लेकिन अंदर से डरते है,
कोट के अंदर दबा जनेऊ बाहर ना दिख जाए
वे अपने ब्राह्मण पहचान से डरते हैं
वे शोषक नहीं थे,
लेकिन इतिहास की अदालतों में
व्यवस्था की बहसों में
वे बलि का बकरा बनाए जाने से डरते हैं
सबके पापों का बोझ
अपने बच्चों के माथे पर मढ़े जाने से डरते हैं।
वे ब्राह्मण हैं।
वे ब्राह्मण थे
वे कथा कहते थे , वे कुंडली मिलाते थे
मगर
उनके मंत्रोच्चार की आवाजें
अब कम गूँजती हैं,
अब काशी उनका घर नहीं है
दान-पुण्य पर उनका हक नहीं है
गंगा का आचमन छूट गया है
वे इस महा परिवर्तन को महसूस करते हैं
और महसूस करने के बाद कहते हैं ….घोर कलियुग आ गया है
वे ब्राह्मण हैं
हर चुनाव से पहले देश की ज्यादातर राजनीति यह कहती है
कि ब्राह्मणों के कारण ही ऊँच-नीच है, भेदभाव है
वह निरन्तर ऐसी चर्चाओं को सुनते हैं ,
मगर इनमें फँसने के बजाए
वे आगे बढ़ना चाहते हैं
इन सब के चक्कर में
वे पीछे ना छूट जाए इस बात से डरते हैं
उनके बच्चे
कोचिंग की कतारों में लगे रहते हैं ,
उनकी स्त्रियाँ
उनके कंधों के बरक्स चला करती है।
वे ब्राह्मण हैं
वे ब्राह्मण हैं इसलिए
डूबते हुए जहाज के नाविकों की तरह
परंपराओं को भींचे रहते हैं ,
कुछ लोगों ने यह बहस चलाई थी कि
उन्हें कोसा जाए तो
किस सदी के लिए कोसा जाए
बहस यह थी
कि उन्हें नकारा जाए
तो किस आधार पर नकारा जाए
यह बहस अनवरत चलेगी
यह देवताओं को नकारने का विषय है
मगर जब यहाँ कुछ नहीं था
तब वे थे
जब तलक यहाँ सबकुछ है
तब तक वह रहेंगे
जब सबकुछ मिट जाएगा फिर भी वह रहेंगे
क्योंकि
वे ब्राह्मण हैं !
वे ब्राह्मण हैं !!
वे ब्राह्मण हैं !!!
✍️Sachin Mishra
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