भगवान दत्तात्रेय
सामान्य तौर पर मैं अपनी आध्यात्मिक प्रवृत्तियों के सार्वजनिक उल्लेख से बचता हूं बिलकुल व्यक्तिगत कारणों से। जैसे कि व्यक्तिगत जीवन भी अधिकांश गोपन ही रहता पर कभी मुखर होना भी आनंदित करता। जैसे कि कुछ देवी देवता अलग-अलग कारणों से मुझे बहुत प्रिय हैं। दुर्गा दत्तात्रेय कार्तिकेय और परशुराम। अन्यान्य भी हैं।
इनमें से आज दत्तात्रेय भगवान की जयंती है।
गुजराती में और मराठी में इन पर विपुल साहित्य उपलब्ध हैं। आज भी रोज लिखा जा रहा है पढ़ा जा रहा है, नये अनुभव रोज हो रहे हैं, परंतु अधिकांश उत्तर भारत खासतौर से युवा वर्ग इनसे लगभग अपरिचित है।
आज मन हुआ कि इन पर हिंदी में कुछ संक्षिप्त और प्रमाणिक लिखा जाए। वैसे भी दत्तात्रेय स्मृति-गामी देवता हैं, स्मरण मात्र से उपस्थित हो जाने वाले ऐसे कृपालु दयालु देवता से अधिक अपरिचय तो ठीक नहीं ही है।
दत्तात्रेय की प्रतिष्ठा इसी बात से समझी जा सकती है कि शैवों और वैष्णवों में बहुत लंबे समय तक ठनी रही कि वह शिव के अवतार है या विष्णु के अवतार हैं। नाथ सम्प्रदाय उन्हें आदिगुरु मानता है। सिख संप्रदाय के दशमेश ग्रंथ में गुरु गोविंद सिंह साहब उन्हें सर्वोच्च यौगिक शक्ति मानते हुए दत्त मुनि के नाम से उनके पूरे चरित का उल्लेख करते हैं। शाक्तों के प्रमुख ग्रंथ 'त्रिपुरा रहस्य ' के तो वह स्वयं उद्गाता ही हैं।
औदुम्बरप्रिय मायामुक्तावधूत श्रीमायायुक्तावधूत योगराजराजेश्वर भगवान दत्तात्रेय को साधारणतया हम लोग अनुसूया के पातिव्रत माहात्म्य वाली कथा से जानते हैं। वह जन्म प्रकरण अद्भुत रहस्यातिरहस्य है। वह माया का खेला है, ब्रह्म का गर्भ है, जीवोत्सर्ग है।
दूसरी कथा जिनसे हम सबका परिचय है। वह है इक अवधूत के चौबीस गुरु। इस कथा का आश्रय लेकर न जाने कितने मूर्ख गुरु पर गुरु बदलते रहते हैं। न जाने कितने भण्ड मनुष्य देह में गुरु की आवश्यकता और प्रतिष्ठा से निषेध करते हैं। पर जिन भाग्यवंतों का परिचय दत्तात्रेय उपनिषद से है, वह यह जानते हैं कि सविता के चौबीस अक्षरों को ऋषियों ने दत्तात्रेय अवधूत के चौबीस गुरूओं के माध्यम से अद्भुत अनुपमेय रूपक का प्रयोग किया था।
यह दत्तात्रेय उपनिषद के प्रारम्भ में उन्हें महा-विष्णु के रूप में चित्रित किया गया और बाद में प्रणव शिव पंचाक्षर से, इस तरह यह उपनिषद समाप्त होता है। शिव भी हैं, विष्णु भी हैं और सर्जना शक्ति भी धारण करते हैं।
दत्तात्रेय का संपूर्ण चरित्र वास्तव में सर्वतंत्र स्वतंत्र है, सबके हैं और किसी के भी नहीं हैं। सर्व समावेशी हैं, सभी आध्यात्मिक परंपराओं का समन्वय हैं, सार्वभौमिक हैं और सबसे विलग रसेश्वर भी हैं। सर्वत्र हैं, गंधमादन से गिरनार तक, हिमालय से नीलगिरी तक उनके पदचिन्ह हैं। स्मरण मात्र से संतुष्ट होने वाले हैं, और इनका रहस्य अज्ञेय भी है।
पुराण पुरुष इतिहास पुरुष दत्तात्रेय का जो स्वरूप है वह बड़ा अद्भुत है अलग-अलग काल में अनेकों अवतारों अनेकों ऋषियों जोगियों के समक्ष वह अलग-अलग स्वरूपों में प्रकट हुए हैं।
अनेकों अनेकों रूप हैं। परशुराम को अलग रूप से, गोरख और मत्स्येंद्रनाथ को अलग रूप में, महाराज यदु को अलग रूप में, मदालसा को अलग रूप, कार्तवीर्य अर्जुन को अलग रूप और प्रह्लाद को अलग रूप और कीनाराम को अलग ढंग से मिलते हैं।
कम शिष्य बनाए, कुछ ब्राह्मण कुछ क्षत्रिय कुछ असुर।
परशुराम के समक्ष वह जिस रूप में प्रस्तुत हुए वह बड़ा लोमहर्षक प्रसंग है। देवी के आदेश पर कि तुम्हारा गुरु पर्वत पर मिलेगा परशुराम जाते हैं महा-पर्वत की यात्रा कर रहे हैं और तभी रास्ते में देखते हैं कि एक उन्मत्त महा पियक्कड़ एक हाथ में चषक लिए हुए, एक हाथ से नवयौवना सर्वांग सुन्दरी का आलिंगन करते ब्रह्मचारी , सामने बलि-प्रसाद भुना हुआ रखा हुआ है।
परशुराम सोचते हैं कि वाह क्या गुरु मिला है।
दत्तात्रेय का जो स्वरूप है अधिकांश परंपराओं में उन्हें छ: भुजाओं और तीन मुखों वाला बताया जाता है और उनके मुखमंडल पर एक अलग शांति क्रांति विश्रांति प्रदर्शित की जाती है।
यह तीन मुख ब्रह्मा विष्णु महेश का प्रतिनिधित्व करते हैं और वास्तव में सत रज तम का भी। त्रिगुणात्मक प्रभु त्रिगुणातीत भी हैं यह समझा जा सकता है।
कालाग्निशामक योगिराज योगीजनवल्लभ दत्तात्रेय के एक हाथ में शंख है जो की वैष्णवी नारायणी नाद और स्वर का द्योतक है। वास्तव में यह वैष्णवी शैवी विभेद तो सम्प्रदाय भेद का विषय है। सब एक है, एक से ही उद्भूत है, एक में ही लय होते हैं।
शंख का ही उदाहरण देखें, ज्योतिषीय तांत्रिक परंपराओं के आलोक में कहें तो शंख शब्द दो बीजाक्षरों से मिलकर के बना है शं और खं । यहां पर शम् शनि का बीज मंत्र है और खं आकाश तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं और बृहस्पति से संबंधित है। शंख गुरु शनि युति बनाते हैं जो कि एक तरह का धर्म कर्माधिकारी योग है और शुभ दृष्टियों से युक्त हो तो प्रवज्या योग भी है। दत्त में यह दोनों तत्व प्रचुर। महाभोगी भी महायोगी भी।
दूसरे हाथ में चक्र है प्रभु के। यह चक्र कालचक्र का रूपक है। एक हाथ में गदा है यह जीव के अहंकार का प्रतीक है सूक्ष्म स्तर पर। गदा हमारे कुंडलिनी से भी संबंध रखता है। गदा जो है यह एक तरह से हमारे सेरेब्रो-स्पाइनल सिस्टम का इनवर्टेड स्वरूप भी है जो कि हमारे संस्कारों और प्रारब्ध के दहन तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है।
प्रभु के तीसरे हाथ में त्रिशूल है। योग मार्ग में त्रिशूल को इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना का संयुक्त रूप माना जाता है जिसे ब्रह्मा दंड से जोड़ा गया है। त्रिशूल की जो बाईं भुजा है वह इड़ा है यह भौतिक प्रवृत्तियों और उन पर अधिकार के लिए आवश्यक है, पिंगला जो दाहिनी भुजा है वह आध्यात्मिक अधिकार का प्रतीक है और बीच का जो सीधा हिस्सा है वह सुषुम्ना नाड़ी है जो दाहिने और बाएं दोनों का नियंत्रण करती है।
भगवान के एक हाथ में कमंडलु है साधारणतया हम इस जल पात्र समझते हैं लेकिन वास्तव में यह कमंडलु प्राणायाम से एकत्रित किया हुआ मोक्ष शक्ति का भंडार है।
भगवान के एक हाथ में भिक्षा पात्र है या खप्पर है यह भिक्षा पात्र वास्तव में उनके भक्तों के अहंकार बीमारियां कलुषआदि को छीन लेने के लिए है। दो हाथों में माला है जो मातृकावर्ण के प्रतीक हैं।
समर्थ गुरु दत्तात्रेय के चित्रों में हम उनके साथ चार कुत्ते अक्सर देखते हैं । यह चार श्वान चार वेदों के प्रतीक हैं, चार युगों के प्रतीक है और शब्द शक्ति की चार अवस्थाओं के भी प्रतीक हैं जिन्हें हम परा पश्यंति मध्यमा और वैखरी कहते हैं यह चार श्वान चार आश्रमों तथा अवस्थाओं के भी प्रतीक हैं।
और सूक्ष्म स्तर पर जाएं तो यह वासुदेव संकरण प्रद्युम्न अनिरुद्ध की चौकड़ी है, यह परम शिव सदाशिव ईश्वर और रुद्र की चौकड़ी है, यह पराशक्ति इच्छा शक्ति ज्ञान शक्ति क्रियाशक्ति की चौकड़ी भी है ।
परमेश्वर दत्तात्रेय के पास एक श्वेत गौ हैं ।यह सृष्टि का प्रतीक है , पृथ्वी का प्रतीक है , इंद्रियों और उन पर नियंत्रण का प्रतीक है।
इनके सोलह अवतार हैं। सोलह पूर्णता है। अवतारों पर फिर कभी। आज तो बस इतना कि -
सर्व अपराध नाशाय सर्व पाप हराय च ।
देव देवाय देवाय श्री दत्तात्रेय नमोस्तुते ॥ 🙏
साभार ✍️डॉ मधुसूदन पाराशर, लक्ष्मणपुरी
(दत्तात्रेय जयंती वि. सं. २०८०)
वयं राष्ट्रे जागृयाम
अंगिरा भवन - ढ़ेर के बालाजी
दत्तात्रेय जयंती
मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा विक्रम संवत् २०८२
दिनांक - 5 दिसंबर 2025 / 00:50
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