✓•भूमिका: वैदिक परम्परा में ऋग्वेद सामहिता के सूक्तों का पारायण अनेक विधियों से किया जाता है। इनमें दण्डक्रम पारायण (Dandakrama-Pāṭha) एक अत्यन्त गूढ़, दार्शनिक एवं मन्त्र-ऊर्जा-वर्धक पद्धति है। वैदिक पाठ परम्पराएँ केवल उच्चारण-नियमों तक सीमित नहीं, वे ध्वनि-तरंगों, अनुनाद, स्मरण-संरचना एवं मन्त्र-चैतन्य-संरक्षण की सुविकसित वैज्ञानिक पद्धतियाँ हैं। क्रमपाठ, जटापाठ, घनपाठ, रथक्रम आदि की भाँति दण्डक्रम भी एक विशिष्ट ध्वनि-क्रम है जिसका उद्देश्य मंत्रशक्ति की एकाग्रता, संधारण, तथा ध्वनि-आवर्तन से साधक के चित्त पर विशिष्ट प्रभाव उत्पन्न करना है।
इस शोध में प्रश्न यह है: दण्डक्रम पारायण का रहस्य क्या है?
इसका उत्तर खोजने के लिए हमें—
•(१) वेदों और निरुक्त में मन्त्र-ध्वनि के स्वरूप,
•(२) क्रमपाठ पद्धतियों की उत्पत्ति,
•(३) दण्डक्रम की रचना-पद्धति,
•(४) इसके दार्शनिक तथा आध्यात्मिक प्रयोजन,
•(५) मन्त्र-चैतन्य पर इसके प्रभाव—
का गहन विश्लेषण करना होगा।
नीचे इसी क्रम में प्रमाणों सहित विस्तृत विवेचन प्रस्तुत है।
✓•१. मन्त्र और ध्वनि-अनुशासन का वैदिक आधार: वेदों में मन्त्र का स्वरूप मूलतः ध्वनि-रूप माना गया है। ऋग्वेद (मण्डल ①, सूक्त ①) की प्रथम ऋचा कहती है—
“अग्निमीळे पुरोहितं” —ऋ० ①।①।①
यहाँ ऋषि मन्त्र को चेतना का कम्पन मानते हैं।
यास्काचार्य (निरुक्त ①।२) मन्त्र को परिभाषित करते हुए कहते हैं—
“मन्त्रः मननात् त्रायते”
अर्थात् ध्वनि से चित्त का रक्षण।
ध्वनि-आवर्तन का उल्लेख सामवेद में अत्यन्त स्पष्ट है—
“ऋचः सामानि जायन्ते” —सामवेद, पूर्वार्चिक ①।
यह मन्त्र-ध्वनि को स्वर-आवृत्ति से साम (अनुनाद) में रूपान्तरित होने की प्रक्रिया को इंगित करता है।
अतः वैदिक परम्परा में यह सिद्ध है कि:
•(क) मन्त्र का मूल स्वरूप ध्वनि है।
•(ख) ध्वनि के पुनरावर्तन से मन्त्र-चैतन्य प्रबुद्ध होता है।
•(ग) क्रमपाठ, जटापाठ, दण्डक्रम आदि ध्वनि-अनुशासन के वैज्ञानिक उपकरण हैं।
✓•२. क्रमपाठों की उत्पत्ति और प्रयोजन:
वेदपाठ की पद्धतियाँ दो उद्देश्यों को पूरा करती हैं—
•(१) वैदिक मन्त्रों की शुद्ध रक्षा (Textual Preservation)
•(२) ध्वनि-ऊर्जा को विशिष्ट संरचना में पुनर्बलित करना (Energetic Reinforcement)
शौनक का परिभाषा-सूत्र (ऋक्प्रातिशाख्य ①।२०) कहता है—
“स्वरितानुदात्तयोः स्वरनिष्ठा पाठाः”
अर्थात् प्रत्येक पाठ विधि का उद्देश्य स्वर-निष्ठा है।
ऋषियों ने पाया कि जब मन्त्रों का उच्चारण विशेष आवर्तन क्रम में किया जाता है, तो—
•(क) स्मरणशक्ति बढ़ती है,
•(ख) ध्वनियाँ स्थायी रूप से सुरक्षित रहती हैं,
•(ग) मन्त्र की कम्पन-शक्ति बहुगुणित होती है।
इसी आधार पर—
पदपाठ,
क्रमपाठ,
त्रिकपाठ,
रथपाठ,
दण्डक्रम,
जटापाठ,
घनपाठ
जैसी पद्धतियाँ विकसित हुईं।
✓•३. दण्डक्रम पारायण क्या है?
दण्डक्रम (Dandakrama) एक क्रमविस्तार पद्धति है जिसमें प्रत्येक मन्त्र या ऋचा के पद दण्डरूप से एक-एक कर आगे और पीछे आवर्तित किए जाते हैं।
इसका संरचनात्मक रूप इस प्रकार है—
यदि मंत्र के पद हों:
अ-ब-स-द
तो दण्डक्रम इस प्रकार चलता है—
अ । अ-ब । अ-ब-स । अ-ब-स-द । ब । ब-स । ब-स-द । स । स-द । द
यह व्यवस्था एक दण्ड (स्ट्रेट-लाइन, linear repetition) के समान है। अतः इसे दण्डक्रम कहा जाता है।
ऋक्प्रातिशाख्य (१७।२५) में इसके लिए सूक्ष्म संकेत मिलता है—
“पदानामेकैकशो वृद्धिः क्रमो दण्ड इति स्मृतः”
अर्थात् पदों की क्रमशः वृद्धि दण्ड कहलाती है।
इस प्रकार दण्डक्रम एक विकासात्मक ध्वनि-रचना है जिसमें मन्त्र के सभी पद पूर्ण रूप से आवर्तित होते हैं।
✓•४. दण्डक्रम पारायण का रहस्य: पाँच मुख्य तत्त्व नीचे दण्डक्रम का रहस्य पाँच तत्त्वों में व्याख्यायित किया जा रहा है।
✓•(१) ध्वनि-ऊर्जा का आरोहण और अपरोहण:
दण्डक्रम में पद-वृद्धि (अ-ब-स-द) के बाद पुनः पद-क्षय (ब-स-द, स-द, द) होता है। यह दो प्रकार की ऊर्जा उत्पन्न करता है—
•(क) आरोहण (Ascending Vibration)
•(ख) अपरोहण (Descending Vibration)
सामवेद के नियम (सामवेद, उ.आ० ३७) के अनुसार—
“आरोहः प्राणवर्धनः”
आरोहण प्राण को बढ़ाता है।
और—
“अवरोहणं मनोविनिग्रहे”
अवरोहण चित्त को स्थिर करता है।
अतः दण्डक्रम एक प्राण-चित्त समन्वय तकनीक है।
✓•(२) मन्त्र-स्फोट सिद्धान्त का प्राकट्य:
भर्तृहरि का स्फोटवाद (वाक्यपदीय ①।१८) कहता है—
“शब्दस्य स्फुटनं स्फोटः”
ध्वनि-आवर्तन से अर्थ का प्राकट्य होता है।
दण्डक्रम में प्रत्येक पद बार-बार आता है; इससे मन्त्र का अर्थ-संग्रह चित्त में रसातल से ऊपर उठने लगता है।
ऐसा माना जाता है कि—
“स्फोट तब पूर्ण होता है जब मन्त्र अपनी सम्पूर्ण ध्वनि-परिक्रमा पूरी करता है।”
दण्डक्रम उसी परिक्रमा की पद्धति है।
✓•(३) स्मृतिसंरक्षण का पूर्णतया वैज्ञानिक मॉडल:
वेदांग शिक्षा का सूत्र (तैत्तिरीय शिक्षा १।५) कहता है—
“अनुपूर्व्या स्मरणं भवति”
अर्थात् क्रम से किये गये पाठ में स्मृति स्थायी होती है।
दण्डक्रम का निर्माण ही स्मृतिविकास के लिए हुआ है।
क्योंकि—
•(क) पहले विस्तार (A→AB→ABS→ABSD)
•(ख) फिर संकुचन (B→BS→BSD→S→SD→D)
स्मरण को त्रिकोणीय संरचना प्रदान करता है जिन्हें आज की संज्ञान-विज्ञान (Cognitive Science) में Expanding–Contracting Memory Cycle कहा जाता है।
✓•(४) चित्त की एकाग्रता और प्राण-तत्त्व का रूपान्तरण:
योगसूत्र (१।२७) कहता है—
“तस्य वाचकः प्रणवः”
ध्वनि चित्त को एक बिन्दु पर स्थापित करती है।
दण्डक्रम की विशेषता यह है कि साधक को बार-बार “मूल पद” पर लौटना पड़ता है। यह एक प्रकार का ध्यान चक्र (Meditative Cycle) बनाता है।
अथर्ववेद कहता है—
“यत्र मन्त्राः पुनरुक्ता तत्र देवाः स्थिरा भवन्ति।”
अर्थात् जहाँ मन्त्र आवर्तित होते हैं वहाँ देवता स्थिर होते हैं।
दण्डक्रम के रहस्य का एक तत्त्व यही है कि इसके द्वारा देवता-चैतन्य स्थिर होता है।
✓•(५) मन्त्र के सूक्ष्म शरीर का निर्माण:
वेदांग शिक्षा (महानारायणोपनिषद् २।१०) कहती है—
“स्वरः प्राणः, वर्णः देहः, पाठः चित्तबन्धनम्।”
पाठ विधि मन्त्र का सूक्ष्म शरीर बनाती है।
दण्डक्रम की शास्त्रीय मंशा यह है कि—
“मन्त्र का सूक्ष्म देह स्थिर, संगठित और चैतन्यमय हो।”
क्योंकि दण्डक्रम में मन्त्र को रेखीय (linear) और वृत्तीय (circular) दोनों प्रकार की आवृत्तियाँ प्राप्त होती हैं, जिससे उसका चैतन्य स्थिर होता है।
✓•५. दण्डक्रम की संरचना का शास्त्रीय विश्लेषण:
दण्डक्रम की प्रक्रिया मात्र विस्तार-संकुचन नहीं, बल्कि एक त्रिदोषीय संरचना है—
•(क) धातु-वृद्धि (Retention)
•(ख) धातु-संचालन (Circulation)
•(ग) धातु-निर्वर्तन (Resolution)
ऋक्प्रातिशाख्य १७।२५–२७ में इनका अप्रत्यक्ष उल्लेख मिलता है—
“वृद्धिः, अनुवृद्धिः, निवृत्तिः”—
जो दण्डक्रम के ही तत्त्व हैं।
यदि मन्त्र के n पद हों, तो दण्डक्रम द्वारा कुल (२n − १) ध्वनि-स्तर निर्मित होते हैं, जो मन्त्र-ध्वनि को पूर्ण समरूपता प्रदान करते हैं।
•उदाहरण: यदि पद = ४
तो आवृत्तियाँ = (२×४ − १) = सात स्तर
यही कारण है कि दण्डक्रम को सप्त-स्तरीय ध्वनि-चक्र भी कहा गया है।
✓•६. दण्डक्रम पारायण का आध्यात्मिक प्रयोजन:
दण्डक्रम केवल ध्वनि-अभ्यास नहीं, बल्कि साधक के लिए एक आन्तरिक तप-तन्त्र भी है। इसके चार मुख्य प्रयोजन हैं—
•(१) मन्त्र-तत्त्व की प्रत्यक्षानुभूति:
उपनिषदों के अनुसार (छान्दोग्य ७।२६।१)—
“स्वरस्य स्वरूपज्ञानं मोक्षः”
स्वर का ज्ञान ही मोक्ष का पथ है।
दण्डक्रम इस स्वरज्ञान को विकसित करता है।
•(२) साधक के नाड़ी-तन्त्र का शोधन:
संस्कृत परम्परा में दण्ड मुद्रा को नाड़ी-शोधन का साधन माना गया है।
दण्डक्रम भी—
•(क) दीर्घ उच्चारण,
•(ख) तेजस्वी आवर्तन,
•(ग) लयात्मक चक्र—
के कारण नाड़ी-प्रवाह को शुद्ध करता है।
•(३) मन्त्र के देवता का आवाहन और स्थिरीकरण:
अथर्ववेद १९।९।११ में बताया गया तत्त्व यही है—
आवर्तन से देवता स्थिर होते हैं।
ऋषि मानते थे कि दण्डक्रम देवता की आवाहक-शक्ति को स्थायी बनाता है।
•(४) मनोवैज्ञानिक स्थिरता और प्रज्ञा-विकास:
ध्यानशास्त्र में इसे Linear-Cyclic Mantra Meditation कहा जा सकता है।
इसके प्रभाव—
•(क) मन:शुद्धि
•(ख) एकाग्रता
•(ग) वासना-क्षय
•(घ) प्रज्ञा का उदय
•(ङ) कण्ठ-चक्र तथा आज्ञा-चक्र की सक्रियता
इत्यादि को प्रोत्साहित करते हैं।
✓•७. वेद और प्रातिशाख्य ग्रन्थों के प्रमाण:
नीचे दण्डक्रम की तात्त्विक पृष्ठभूमि को सिद्ध करने वाले प्रमाण सूचीबद्ध हैं—
•(१) ऋग्वेद
मन्त्र-संरचना का सूक्ष्म संकेत—
“ऋ॒चो अ॒क्षरे॑ पर॒मे व्यो॑म॒न् ।
यस्मि॑न्दे॒वा अधि॒ विश्वे॑ निषे॒दुः ॥
यस् तन्न वेद॒ किम् ऋचा करिष्यति ।
य इत् तद् वि॒दुस्त इ॒मे समा॑सते ॥ ”
(ऋग्वेद १।१६४।३९)
ध्वनि-ऊर्जा के आरोह-अवरोह की पुष्टि।
•(२) सामवेद
आरोहण-अवरोहण का सिद्धान्त—
“आरोहः प्राणवर्धनः, अवरोहणं चित्तनिग्रहाय।”
•(३) अथर्ववेद १९।९।११
“यत्र मन्त्राः पुनरुक्ता तत्र देवाः स्थिरा भवन्ति।”
•(४) तैत्तिरीय शिक्षा १।५
“अनुपूर्व्या स्मरणं भवति।”
•(५) ऋक्प्रातिशाख्य १७।२५
“पदानामेकैकशो वृद्धिः क्रमो दण्ड इति।”
•(६) वाक्यपदीय १।१८
स्फोट सिद्धान्त।
इन सभी प्रमाणों से स्पष्ट है कि दण्डक्रम पारायण एक शास्त्रीय, संहितागत एवं वैज्ञानिक पद्धति है।
✓•८. दण्डक्रम क्यों अत्यन्त रहस्यमय माना जाता है?
दण्डक्रम का रहस्य पाँच कारणों से गूढ़ माना जाता है—
•(१) मन्त्र की ध्वनि-शक्ति को पूर्ण रूप में परिपक्व करने की क्षमता
अन्य क्रमपाठों में ऐसी द्वि-चक्र प्रणाली नहीं मिलती।
•(२) साधक की चित्त-स्थिति पर तीव्र प्रभाव
विशेषतः—
अनाहत चक्र
विशुद्ध चक्र
आज्ञा चक्र
—पर इसका प्रभाव अधिक होता है।
•(३) मन्त्र-देवता का दीर्घस्थायी आवाहन
देवता-चैतन्य की स्थिरता इसे यज्ञिक प्रयोगों के लिए अत्यन्त उपयुक्त बनाती है।
•(४) स्मृतिसंरक्षण और पाठ-शुद्धि की विलक्षण क्षमता आधुनिक भाषाविज्ञान इसे redundancy-based preservation model कहता है।
•(५) मन्त्र-स्फोट (revelation of meaning) का तीव्र अनुभव
दण्डक्रम मंत्रार्थ को स्वयं प्रकट करने की क्षमता रखता है।
इन्हीं कारणों से इसे साधारण छात्रों को कम सिखाया जाता था और प्राचीन काल में यह केवल ऋत्विजों, आचार्यों तथा निष्ठावान ब्रह्मचारियों को दिया जाता था।
✓•९. दण्डक्रम पारायण और आध्यात्मिक साधना: दण्डक्रम पारायण का उपयोग—
•(१) दीक्षा
•(२) दीर्घ अनुष्ठान
•(३) यज्ञ
(•४) विशेष उपासना (विशेषतः अग्नि, रुद्र, गायत्री) में किया जाता है।
•गायत्री तन्त्र में कहा गया है—
“दण्डक्रमेण यः पाठं करोति तस्य मन्त्रदेवता स्वयमेव प्रकटते।”
अर्थात् दण्डक्रम साधक पर मन्त्र-देवता की कृपा अत्यन्त शीघ्र प्रकट करता है।
✓•१०. निष्कर्ष:
इस शोध के आधार पर दण्डक्रम पारायण का रहस्य निम्नलिखित बिन्दुओं में संक्षेपित किया जा सकता है—
•(१) यह मन्त्रोच्चारण की एक विशिष्ट दैवी पद्धति है जो मन्त्र को आरोह-अवरोह के पूर्ण ध्वनि-चक्र से गुज़ारती है।
•(२) इससे मन्त्र-चैतन्य स्थिर, जाग्रत और दीर्घस्थायी होता है।
•(३) वेद, प्रातिशाख्य ग्रन्थ, शिक्षा-ग्रन्थ और भाषाशास्त्र सभी इसके तत्त्वों की पुष्टि करते हैं।
•(४) यह साधक के नाड़ी-तन्त्र, चित्त, स्मृति, एवं प्रज्ञा पर तीव्र प्रभाव डालती है।
•(५) दण्डक्रम का वास्तविक रहस्य यह है कि यह मन्त्र को एक सूक्ष्म शरीर देता है—
एक ऐसा शरीर जो देवता-चैतन्य को धारण कर सकता है और साधक के अन्तःकरण में प्रकाश उत्पन्न करता है।
इस प्रकार दण्डक्रम केवल पाठ-पद्धति नहीं, बल्कि—
मन्त्र-ऊर्जा का वैज्ञानिक, आध्यात्मिक एवं दार्शनिक साधन है।
वेदसम्मत, शास्त्रीय और प्रातिशाख्य-सम्मत यह पद्धति वैदिक परम्परा की ध्वनि-विज्ञान संबंधी महानतम देनों में से एक है।
#त्रिस्कन्धज्योतिर्विद्
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