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Friday, 12 December 2025

कुंडली में भूत-प्रेत आने (ग्रसित होने) का योग।

॥ॐ॥

कुंडली में भूत-प्रेत आने का का योग अगर आपकी कुंडली में यह योग है तो हो जाइए सावधान!

भूतप्रेत और आत्माएं अचानक ही किसी के जीवन में दखल नहीं देती बल्कि आपकी कुंडली के योग उन्हें आपकी ओर आकर्षित करते हैं। कुंडली के अनुसार ही भूत प्रेत आपको कष्ट देते हैं और चले भी जाते हैं। 

अगर आपको भूतों से डर लगता है तो जल्द से जल्द अपनी कुडंली किसी अच्छे जानकार को दिखाएं और भूत प्रेत बाधा निवारण के उपाए करें।

 कुंडली में बने योग के ही आत्माओं के प्रकार के प्रहार को भी निर्धारित करते हैं। जानिए कुडंली के योग जो आपके शरीर में भूतों की आहट का संकेत देती हैं।

पहला योग ..
कुण्डली के पहले भाव में चन्द्र के साथ राहु हो और पांचवे और नौवें भाव में क्रूर ग्रह स्थित हो इस योग के होने पर जातक या जातिका पर भूत-प्रेत, पिशाच या गन्दी आत्माओं का प्रकोप शीघ्र होता है। यदि गोचर में भी यही स्थिति हो तो अवश्य ऊपरी बाधाएं तंग करती है।

दूसरा योग...
यदि किसी कुण्डली में शनि, राहु केतु या मंगल में से कोई भी ग्रह सप्तम भाव में हो तो ऐसे लोग भी भूत-प्रेत बाधा या पिशाच या ऊपरी हवा आदि से परेशान रहते हैं।

तीसरा योग...
यदि किसी की कुण्डली में शनि-मंगल-राहु की युति हो तो उसे भी ऊपरी बाधा, प्रेत, पिशाच या भूत बाधा तंग करती है। उक्त योगों में दशा- अन्तदशा में भी ये यह आते हो और गोवर में भी इन योगों की उपस्थिति हो तो समझ लें कि जातक या जातिका इस कष्ट से अवश्य. परेशान है।

ज्योतिष के अनुसार राहु की महादशा में चंद्र की अंतर्दशा हो और चंद्र दशापति राहु से भाव 6, 8 या 12 में बलहीन हो, तो व्यक्ति पिशाच दोष से ग्रस्त होता है। वास्तुशास्त्र में भी उल्लेख है

 कि पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद, ज्येष्ठा, अनुराधा, स्वाति या भरणी नक्षत्र में शनि के स्थित होने पर शनिवार को गृह निर्माण आरंभ नहीं करना चाहिए, अन्यथा वह घर राक्षसों, भूतों और पिशाचों से ग्रस्त हो जाएगा।

आपकी कुंडली में आपकी परेशानी का कारण भूत प्रेत श्राप तो नहीं है: कुंडली में कई तरह के योग बताए गए हैं। उन्हीं में से एक योग है- 'प्रेत श्राप योग।' कहते हैं कि, जिस भी जातक की जन्म पत्रिका में शनि-राहु या शनि- केतु की युति होती है तो, इस युति को प्रेत शाप योग कहते हैं। 

दूसरा यह कि राहु अथवा केतु का चतुर्थ या दूसरे (कुटुम्ब स्थान) से संबंध होने पर या लग्न के अंश के समीप होने पर भी ये योग बनता है। यह योग या तो स्थायी होता है या फिर अस्थायी। गोचर और अंतरदशा अंतर्गत भी ये योग बनता है। जहां तक सवाल शनि-राहु या

शनि-केतु की युति से बनने वाले योग की बात किसी संतान में है तो, उसके जन्म लेने के बाद है तो, यह युति जिस भी भाव में होती है, यह उस भाव के फल को बिगाड़ देती है या नष्ट कर देती है। ऐसे में व्यक्ति को हर कदम पर संघर्ष करना होता है 

और उसके जीवन में अचानक ही कोई घटना घट जाती है। ऐसी घटना जिसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता या अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। इस योग के कारण एक के बाद एक कठिनाइयां सामने खड़ी होने लगती हैं।

यदि शनि या राहू में से किसी भी ग्रह की दशा चल रही हो या आयुकाल चल रहा हो यानी उम्र के 7 से 12 या 36 से लेकर 47 वर्ष तक का समय हो तो मुसीबतों का दौर थमता नहीं है। 

ऐसा भी देखा गया है कि इस उम्र के दौरान यदि किसी शुभ या योगकारी ग्रह की दशा काल हो और शनि राहु की युति हो तो, इस योग के कारण उक्त ग्रहों की दृष्टि का दुष्प्रभाव उस ग्रह पर हो जाने से शुभ फल नष्ट हो जाता है।

 अधिकतर ज्योतिषाचार्य इसे पितृदोष नहीं मानते हैं लेकिन यह माना जाता है कि, यह पूर्व जन्म के दोषों में से शनि ग्रह से निर्मित पितृदोष है। यदि यह दोष अलग-अलग होता है।

उपाय ...
ही किसी पंडित से निवारण करवा लेना चाहिए। कहते हैं कि इससे जमीन-जायदाद संबंधी विवाद भी पैदा होते हैं, प्रॉपर्टी बिक जाती है, कारखाना या दुकान हो तो बंद हो जाते हैं, पिता पर कर्ज इतना चढ़ जाता है कि उसे चुकाना मुश्किल हो जाता है।

 नौकरी हो तो छूट जाती है। यह भी कहा जाता है कि ऐसे योग के कारण या ऐसे योग वाले के घर में जगह-जगह दरारें पड़ जाती हैं। सफाई के बावजूद बदबू आती रहती है। घर से जहरीले जीव-जंतु निकलना भी इसकी निशानी है। मतलब यह कि इस घर में प्रेत योग का असर हो रहा है। 

यदि यह युति सप्तम भाव पर प्रभाव डाले तो विवाह टूट जाता है। अष्टम पर डाले तो जातक पर जादू-टोने जैसा अजीब-सा प्रभाव रहता रहता है और हो सकता है कि उसकी दर्दनाक मौत हो जाए।

 नवम भाव में हो तो भाग्य साथ छोड़ देता है। एकादश भाव में हो तो मुसीबतों से लड़ते-लड़ते इंसान हारकर बैठ जाता है। इसी तरह कुंडली के हर भाव में इसका प्रभाव

1. पितरों का अच्छे से श्राद्ध कर्म करना चाहिए। 2. यदि कन्या हो तो गाय का दान और कन्या दान करना चाहिए। 3. शनि, राहु और केतु के उपाय करना चाहिए। 4. दोनों कान छिदवाकर उसमें सोना पहने। 5. छाया दान करें।

 6. अंधों को भोजन करवाना चाहिए। 8. कुत्तों को प्रतिदिन रोटी खिलाना चाहिए। 9. शराब पीना और मांस खाना छोड़ देना चाहिए। 10. ब्याज का धंधा करना और पराई स्त्री से संबध छोड़ देना चाहिए। 11. शनि की शांति के लिए महामृत्युजय मंत्र का जप भी कर सकते हैं।

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                     II ज्योतिष गुरु ओम II
                     II 9685226701 II


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