आर्यसमाजीयों का काल्पनिक
" निराकार ईश्वर "
सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम संस्करण में स्वामी दयानन्द ‘निराकार’ का विग्रह करते हैं – “निर्गत आकारो यस्मात्”… किन्तु इस विग्रह से परमात्मा साकार सिद्ध हो जाता है, क्योंकि उसमें पहले आकार था, इसीलिए तो निकल गया। यदि उसमें कोई आकार नहीं था, तो निकल क्या गया???
तब स्वामी दयानन्द लज्जित हुए कि मेरा तो सिद्धान्त ही भंग हो गया। इसलिए सत्यार्थ प्रकाश के दूसरे संस्करण में इसे बदलकर, पहले के बहुव्रीहि-विग्रह को बदलकर तत्पुरुष समास का विग्रह स्वामी जी ने कर दिया – “निर्गत आकारात् स निराकारः”।
किन्तु इस विग्रह में भी परमात्मा की साकारता ऐसी की ऐसी सिद्ध रही। यह तो वह स्थिति हो गई कि “भक्षितेऽपि लशुने न शान्तो व्याधिः” – अर्थात् स्वामी जी ने बीमारी दूर करने के लिए निषिद्ध लहसुन खा लिया और बीमारी भी गई नहीं, ऐसी की ऐसी बनी रही।
बल्कि इस विग्रह में त्रुटि भी हो जाती है। वह यह कि द्रव्य से तो गुण होता है, पर गुण से द्रव्य नहीं होता। परमात्मा यहाँ द्रव्य है और आकार गुण। तब परमात्मा से तो आकार निकल सकता है, लेकिन गुण-आकार से द्रव्यरूप परमात्मा कैसे निकले? यह बात दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश में स्वयं स्वीकार की है। तेरहवें समुल्लास में वे लिखते हैं कि “गुण से द्रव्य कभी नहीं बन सकता”।अतः ‘निराकार’ शब्द से भी परमात्मा का आकार सिद्ध हो रहा है।
स्वामी दयानन्द ने परमात्मा के लिए लिखा है कि “जब वह (परमात्मा) प्रकृति से भी सूक्ष्म और उसमें व्यापक है” (सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास ८)। यहाँ स्वामी जी ने परमात्मा को प्रकृति की अपेक्षा सूक्ष्म बताकर उसका सूक्ष्मतम आकार स्वयं सिद्ध कर दिया।
इसी प्रकार सातवें समुल्लास में भी स्वामी जी ने कहा – “जीव का स्वरूप … सूक्ष्म है और परमेश्वर अतीव सूक्ष्मात् सूक्ष्मतर स्वरूप है।” यहाँ भी स्वामी जी ने परमात्मा के स्वरूप को आत्मा के आकार की अपेक्षा सूक्ष्मतर माना है, तब परमात्मा साकार सिद्ध हो गया।
अतः अत्यन्त सूक्ष्म आकार वाले होने के कारण परमात्मा ‘निराकार’ कहे जाते हैं, न कि आकार के अभाव से। जब परमात्मा को निराकार कहा जाता है, तो यहाँ “आकार का सर्वथा निषेध” इष्ट नहीं होता। न ही किसी शास्त्र में ऐसा कहा गया है। यदि परमात्मा में आकार का सर्वथा निषेध मान लिया जाए, तो उसमें शून्यता की प्राप्ति होगी। जब कि हमारे यहाँ ईश्वर को कही भी शून्य नहीं कहा गया, पूर्ण कहा गया हैं।
अतः “निराकार” शब्द का अर्थ “अनिर्वचनीय आकार वाला” ही ग्रहण किया जाना चाहिए। जैसे वेदों में “नेति-नेति” कहा गया है, वहाँ परमात्मा का निषेध तात्पर्य नहीं है, बल्कि उसकी अनिर्वचनीयता तात्पर्य है। इसी प्रकार परमात्मा के परिप्रेक्ष्य में “निराकार” शब्द में “निर्” उपसर्ग आकार के निषेध का बोधक नहीं है, बल्कि उसके आकार की अनिर्वचनीयता को दर्शाता है। जैसे “अनुदरा कन्या” का अर्थ “पेट से रहित लड़की” नहीं होता, बल्कि “सूक्ष्म पेट वाली लड़की” होता है। इसी प्रकार “निराकार” शब्द में “निर्” उपसर्ग परमात्मा के आकार का सर्वथा निषेधक नहीं है, बल्कि यह ब्रह्म की उस स्थिति को दर्शाता है जो सभी भौतिक रूपों से परे है और हमारी ज्ञानेन्द्रियों एवं मन की सीमाओं से परे है।
सदैव सनातन धर्म और वेद के विपरीत चलने वाले स्वामी दयानन्द के चेलों ने “निराकार” शब्द का अर्थ यह मानकर कि “कोई आकार है ही नहीं”, एक शून्यतापत्ति वाले काल्पनिक ईश्वर को मान रखा है। आर्यसमाजियों को सबसे पहले तो यह जानना चाहिए कि जिन चार वेदों को ही परम प्रमाण मानने का दावा वे करते हैं, उन चारों वेदों में तो ‘निराकार’ शब्द है ही नहीं। यह शब्द तो पुराण आदि ग्रन्थों में ही आता है और वहीं पर इसकी व्याख्या है – अनिर्वचनीय आकार वाला। अतः इन्हें तो यह शब्द ही “अवैदिक” मानना चाहिए, जैसे कि वेद में न होने से “हिन्दू” आदि शब्दों को ये अवैदिक कहकर उनसे घृणा करते हैं।
✍️ शचींद्र शर्मा
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वयं राष्ट्रे जागृयाम
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