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Wednesday, 10 December 2025

छूटे जो कहलाए मेरे, वे थे ही न संबंध।

छाया को जग मान गई, 
सत्य रहा अनदेख।
पाया समझा जो कभी, 
हाथ लगा न एक।
स्वप्न बसे थे नैनन में, 
नींद बनी परदेस।
जीवन जिनको जानती, 
आदत का था वेश।
जिससे मन घबराने लगे, 
उस बंधन न बंध।
छूटे जो कहलाए मेरे, 
वे थे ही न संबंध।
इंदु

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