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Tuesday, 24 March 2026

हा.. सुप्त प्रायः हिन्दुओं ! तुम्हारा यह सर्वनाश किसने किया ?

॥ॐ॥

हा.. सुप्त प्रायः हिन्दुओं ! तुम्हारा यह सर्वनाश किसने किया ? तुम्हें अधोगति की चरम सीमा में किसने खींचकर डाल दिया? संसार मे तुम्हें इस प्रकार से किसने अमानुष बना दिया? इसका केवल एकमात्र उत्तर है अनार्षशास्त्र रूपी विष ने उपादेय अमृतोपम अन्न के साथ मिला कर उसे विषमिश्रित अन्न में परिणत कर दिया है अन्न मनुष्य के प्राणों की रक्षा करता है, विषमिश्रित अन्न से प्राणों का नाश होता है। हिन्दुओं ! तुम इस विषमिश्रित अन्न को बहुत दिनों से खाते आ रहे हो। इसलिए हे हिन्दुओं! तुम जीवित रहते भी आज मृतक हो।



हे भारत के हितेच्छुवर्ग ! तुम शिक्षा-विज्ञान का विस्तार करके हिन्दुओं को उठाने की चेष्टा करते हो, अच्छा है। परन्तु क्या इससे हिन्दू उठ खडे होंगे? शरीर का रक्त दूषित हो गया है, यदि उस पर दिन में दस बार साबुन मलें तो भी क्या उसका उपकार हो सकेंगा?
उपकार हो सकेगा ?
    तुम योरुपीय आदर्श और योरुपीय प्रणाली के अनुसार नगर-नगर में कल-कारखाना खोलने का उद्योग करते हो, परन्तु क्या इससे देश जाग उठेगा ? जिसके मस्तिष्क में विकार हो गया है क्या उसके हाथ में प्रचुर धन देने अथवा उसे कभी-कभी पुष्टिकर भोज्य पदार्थ खिलाने से उसका कल्याण कर सकोगे? क्या मैले कपड़े पर कभी रंग चढ़ सकता है? सच्ची बात तो यह है कि कर्मशुद्धि के बिना न तो जीवन के, न समाज के, न शिल्प, वाणिज्य, कृषि, राजनीति प्रभुति समाज के विभाग की कुछ भी उन्नति संभव हो सकती है। कर्मशद्धि के भाव से परिचालित न होकर यदि किसी आत्महितकर व लोकहितकार कार्य प्रभृत हुआ जायेगा तो वह कर्म यथावत् रूप से निर्वाहित हो सकेगा इसीलिए तुम शिल्प कला की उन्नति करने जाते हो तो अकृत कार्य रह जाते हों। जब वाणिज्य व्यापार की श्रीवृद्धि करने जाते हो तो भग्नोदम होकर लौट आते हो। राष्ट्रीय आंदोलन में प्रवृत होते हो तो व्यर्थ मनोरथ रह जाते हों। आजकल देश के प्रायः सभी प्रदेशों "समय-समय पर यह बात सुनने में आती है कि देश में मनुष्य नहीं है। वास्तव में किसी भी विभाग में कोई भी नेता नहीं है। बात को बिलकुल ठीक है। वस्तुतः देश में मनुष्यों का अभाव है। नेताओं का अभाव है।
इसका प्रधान कारण इस देश में प्रायः नेता, कथित धर्माचार्य अफसर न्यायाधीश लेखक और पत्रकार में कर्मशुद्धि का भाव पूर्ण रुप से वेद सम्मत नहीं हैं।
साभार - पंडिता अनीता
#वंदे_मातृसंस्कृतम्

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