"योग व रोगी की अवस्था को सावधानीपूर्वक देखकर अनेक कालों में वैद्य रोगियों को औषधि सेवन कराते हैं। आचार्य सुश्रुत ने औषधि सेवन हेतु 10 काल/समय निर्धारित कर लिए हैं जिनका विवरण नीचे प्रस्तुत है
अपाने विगुणे पूर्व, समाने मध्यभोजनम् ।
व्यानेतु प्रातरशितमुदाने भोजनोत्तरम् ॥
वायाँ प्राणे प्रदुष्टे तु ग्रासयासान्तरिष्यते ।
श्वासकासपिपासासु त्ववचार्य मुहुर्मुहुः ॥
सामुद्गं हिक्किने देयं लघुनाऽन्नेन संयुतम् ।
सम्भोज्यं त्वौषधं भोज्यैर्विचित्रैररुचौ हितम् ॥ - च.चि.30/299-301
आयुर्वेद में औषध सेवन के काल
1. अभक्तम् (खाली पेट / Empty stomach);
2. सभक्तम् (भरे पेट / Full stomach / With meals / Just after meals);
3. अधःभक्तम् (About 15 minutes after meals);
4. उत्तरभक्तम् (About half an after meals);
5. अन्तर्भक्तम् (Between two meals);
6. सामुद्गम् (Within meals);
7. मुहुर्मुहुः (Frequently);
8. निशि (At bed time);
9. सग्रासम् (With every morsel); व
10. ग्रासान्तरम् (After every morsel)।
प्रत्येक औषध-सेवन काल का अपना-अपना विशेष महत्व है। फिर भी, इनका मुख्य उद्देश्य यह है कि सेवन की गई _औषधियाँ निरापद रूप से अपना अधिकतम लाभ दे सकें (The administered drugs bring about their optimal benefits without any adverse effects)_।
अनुभव बताता है कि वर्तमान काल में कुछेक औषधियों को छोड़, अधिकांश औषधियों व औषध-योगों को खाली पेट (Empty stomach) के बजाय भरे पेट (Full stomach) ही देना चाहिए।
निश्चित रूप से इससे औषधियों के अवशोषण (Absorption) में किञ्चित् कमी आती है परन्तु इसका सब से बड़ा लाभ यह है कि रोगी अधिकांश औषधियों से होने वाले आमाशयिक क्षोभ (Gastric irritation) व तज्जन्य कष्टों से बच जाता है तथा आयुर्वेद चिकित्सक को भी कई प्रकार की क्लेशकारी स्थितियों का सामना नहीं करना पड़ता।
यह ध्यान देने योग्य है कि आजकल आयुर्वेद चिकित्सा के लिए पधारने वाले अधिकांश रोगियों को ऐलोपैथिक दवाओं व मिथ्या-आहार-विहार से अव्यक्त-आमाशय-शोथ (Sub-clinical gastritis) पहले से ही रहती है।
ऐसे में रिक्त-आमाशय (Empty stomach) होने पर मुख से सेवित अधिकांश औषधियों (Drugs taken orally) से आमाशयिक-क्षोभ (Gastric irritation) की सम्भावना बढ़ जाती है।
ऐसा होने पर रोगी को आमाशय-गौरव (Heaviness in epigastrium), अरुचि (Lack of appetite), हृल्लास (Nausea), छर्दि (Vomiting), दौर्बल्य (Debility), भ्रम (Dizziness), शिरःशूल / शिरो-गौरव (Headache), आलस्य (Lassitude) इत्यादि कष्ट होने लगते हैं।
इससे रोगी व रोगी के परिचारकों (Attendants) को लगता है कि -
● दी जाने वाली आयुर्वैदिक औषध 'गर्म' लग रही है;
● दी जाने वाली आयुर्वैदिक औषध कुप्रभाव (Side-effects) पैदा कर रही है;
● आयुर्वैदिक डाॅक्टर (वैद्य) ने दवा ग़लत दे दी है; इत्यादि।
#परिणाम फिर आमतौर पर इसके निम्न परिणाम होते हैं -
1. आयुर्वेद चिकित्सक द्वारा दी गई आयुर्वैदिक औषधि तत्काल बन्द कर दी जाती है,
2. होने वाले कष्टों के निवारण हेतु नज़दीकी ऐलोपैथिक डाॅक्टर से तत्काल ईलाज़ कराया जाता है, जो लाक्षणिक चिकित्सा (Symptomatic treatment) देने के साथ-साथ आयुर्वेद-विरोधी निम्न कुप्रचार (व ऐलोपैथी का सुप्रचार) भी कर देते हैं -
3. यह सब आयुर्वैदिक दवाई के इस्तेमाल करने से हुआ है;
4. आयुर्वैदिक दवाएँ अवैज्ञानिक (Unscientific) के साथ-साथ ज़हरीली (Toxic) भी होती हैं, तथा इनसे स्टॅमक (Stomach), लिवर, किडनीज़ जैसे वाइटल ऑरगेन्स (Vital organs) क्षतिग्रस्त होते हैं, इत्यादि;
5. आयुर्वैदिक डाॅक्टर नीम-हकीम (Quacks) होते हैं, तथा आज के विकसित (Advanced) युग में उनसे ईलाज कराना मूर्खता है; इत्यादि ।
#आयुर्वेद_में_औषधि_सेवन_के_दश_काल
1. #अभुक्त_काल
प्रातः समय शौच आदि दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होकर बिना कुछ खाये-पिये ही (निहार मुँह) ओषध सेवन करने को " अभुक्त काल" कहते हैं। इस प्रकार सेवन करने से औषध अधिक गुण प्रदान करती है तथा रोग को शीघ्र व निश्चित रूप से नष्ट करती है। परन्तु बालक, वृद्ध, स्त्री, सुकुमार प्रकृति वालों को कुछ खिला करके ही प्रातः समय ओषध सेवन कराना चाहिए अन्यथा ग्लानि व बल का भी क्षय होता है।
आयुर्वेदाचार्य शार्ङ्गधर का मत है कि पित्त व कफ की वृद्धि में विरेचन व वमन कराने के लिए तथा लेखन के लिए प्रातः काल बिना कुछ खाये ही ओषध सेवन करना चाहिए। प्रायः समस्त प्रकार के औषध विशेषकर कषाय/क्वाथ (काढ़ा) प्रातः काल ही सेवना करना चाहिए।
2. #प्राग्भुक्त_काल
रोगी को ओषध खिलाकर तुरन्त ऊपर से अन्न दिया जाये तो उसे "प्राग्भुक्त" कहते हैं। अन्न के पहले खाई हुई औषध शीघ्र ही हजम हो जाती है तथा बल हानि भी नहीं करती है। औषध अन्न के साथ मिल जाने पर वमन के साथ नहीं निकलती है। ऐसा आचार्य सुश्रुत का कहना है।
आचार्य वाग्भट्ट जी के अनुसार-अपानवायु के विकारों में नाभि के नीचे बल देने के लिए और उनके विकारों को शान्त करने के लिए तथा शरीर को पतला करने के लिए-“प्राग्भुक्त" ओषध देना चाहिए।
3. #अघोभुक्त_काल
अन्न खाकर तत्काल ही जो औषध सेवन की जाती है उसे "अधोभुक्त" कहते हैं। अन्न खाकर ऊपर से सेवन की हुई औषध नाभि से ऊपर होने वाले रोग को दूर करती है तथा उन अवयवों को बल देती है।
वाग्भट्टजी का इस सम्बन्ध में कहना है कि व्यान वायु के विकारों में प्रातः समय के भोजनोपरान्त, तथा उदान वायु के विकारों में सायंकाल के भोजनोपरान्त रोगी को औषधि देनी चाहिए। "अधोभुक्त" के समय में खायी हुई ओषध शरीर को स्थूल/मोटा बनाती है।
4. #मध्यभुक्त_काल
जो औषधि आधा (आधा भरपेट) भोजन करके सेवन की जाती है तथा औषधि सेवन करने के उपरान्त आधा भोजन ऊपर से किया जाता है, उसे 'मध्य मुक्त 'कहते हैं। भोजन के मध्य में ली गई ओषधि-कोष्ठ में होने वाले रोगों को दूर करती है। इस सम्बन्ध में आचार्य वाग्भट्ट जी कहते हैं कि 'समान वायु'-विकार, कोष्ठ के रोग, तथा पित्त के रोग-इनमें "मध्यभुक्त- (भोजन के मध्य में) औषधि सेवन करनी चाहिए।
5. #अन्तरा_भुक्त_काल
जो औषधि सुबह व शाम को भोजन के मध्य में ली जाती है अर्थात्-सुबह के भोजन जीर्ण होने पर ओषधि सेवन की जाये और वह ओषधि जीर्ण होने पर शाम को सेवन की जाये तो उसे " अन्तराभुक्त" कहते हैं। अन्तराभुक्त में दी हुई औषध हृदय व मन को बल देने वाली. दीपन और पथ्य होती है। अन्तराभुक्त ओषधि-दीप्ताग्नि और व्यान वायु के विकारों में रोगी को सेवन करायी जाती है।
6. #सभुक्त_काल
जो औषधि-रोगी को अन्न के साथ दी जाये अथवा पकाये हुए अन्न में मिलाकर सेवन करायी जाये उसको "सभुक्त" ओषध-काल कहते हैं। सभुक्तः औषध-दुर्बल स्त्री, बालक, सुकुमार, वृद्ध तथा ओषध लेना पसन्द करने वाले, अरुचि तथा सर्वाङ्गत रोग में देनी चाहिए।
7. #सामुद्ग_काल
जो पाचन, अवलेह, चूर्ण आदि औषध, लघु और अल्प अन्न के आदि और अन्त में दिया जाये-उसको “सामुद्ग" कहते हैं। सामुद्ग ओषध "हिक्का, कम्प और आक्षेप में तथा जब दोष अधोमार्ग और उर्ध्व मार्ग दोनों में फैले हों-तब रोगी को देना चाहिए।
8. #मुहर्मह_काल
अन्न के साथ अथवा खाली पेट (भूखे ही) में जो औषध-रोगी को बारम्बार सेवन करायी जाये उसको–“मुहुर्मुहु" औषध- काल कहते हैं। बढ़ी हुई साँस खाँसी, हिचको, वमन, तृषा और विष विकारों में बारम्बर औषधि दी जाती है।
9. #सग्रास_काल
जो औषधि प्रत्येक ग्रास/ कौर में अथवा कुछ ग्रासों में मिलाकर रोगी को दो जाती है उसको–"सग्रास" कहते हैं। मन्दारिन वाले रोगी को-जठराग्नि प्रदीप्त करने के लिए-चूर्ण, अवलेह, गुटिका आदि का तथा बाजीकर ओषधि-संग्रास (यानी, ग्रास ग्रास या कौर-कौर) में मिलाकर देनी चाहिए।
10. #ग्रासान्तर_काल
यदि ओषधि-2 ग्रासों के बीच/मध्य में दी जाये तो उसे "ग्रासान्तर" ओषध काल कहते हैं। वमन कराने वाले धूम तथा श्वास-कास आदि में प्रसिद्ध गुण वाले अवलेह ग्रासों के बीच में देनी चाहिए।
आचार्य वाग्भट्ट जी द्र०गु०वि० में लिखते हैं कि प्राण वायु के विकारों में सग्रास और ग्रासान्तर में ओषध देनी चाहिए।
#आयुर्वेदिक_औषधि_क्या_है ?
आयुर्वेदिक औषधि की प्रभावशीलता एक प्रामाणिक तथ्य है, लेकिन आधुनिक युग में इस प्रणाली की औषधि के प्रति चिंता जताई जाती है। जैसा हम सभी जानते हैं कि महर्षि चरक और आचार्य शुश्रुत द्वारा रचित ग्रंथ आयुर्वेद के नींव है और वे भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि जीविका के लिए आहार आवश्यक है।
महर्षि चरक ने ६ पहलू स्पष्ट किये हैं जिससे यह तय किया जा सके कि किस परिस्थिति में क्या खाने योग्य है अथवा नहीं। वे कहते हैं कि भोजन को पथ्य (खाने योग्य, स्वास्थ्य) और अपथ्य (खाने योग्य नहीं, हानिकारक) बनाने के लिए निम्न कारक प्रमुख है:
1) मात्रा (भोजन की)
2) समय (कब उसे पकाया गया और कब उसे खाया गया)
3) प्रक्रिया (उसे बनाने की)
4) जगह या स्थान जहां उसके कच्चे पदार्थ उगाए गए हैं (भूमि, मौसम और आसपास का वातावरण इत्यादि)
5) उसकी रचना या बनावट (रासायनिक, जैविक, गुण इत्यादि)
6)उसके विकार (सूक्ष्म और सकल विकार और अप्राकृतिक प्रभाव और अशुद्ध दोष, यदि कोई है तो)
आचार्य शुश्रुत चिकित्सा के दृष्टिकोण से विभिन्न प्रकार के आहार को उसके सकल मूल गुण से उसका अंतर बताते हैं, और किस को किस परिस्थिति में क्या ग्रहण करना चाहिए बताते हैं।
(1) #शीत (ठंडा)
इस किस्म के भोजन में ठंडा करने की प्रकृति होती है और यह उन के लिए अच्छा होता है जो पित्त, गर्मी और हानिकारक रक्त वृद्धि से पीड़ित है। आत्यादिक यौन भोग या विषाक्त प्रभाव से कमजोर व्यक्तियों को इसकी सलाह दी जाती है।
(2) #उष्ण (गर्म)
जो लोग वात और कफ दोष के रोगों और समस्याओं से पीड़ित है उन्हें इसकी सलाह दी जाती है। पूरा पेट साफ होने के बाद और उपवास इत्यादि के बाद आहार ग्रहण करने की मात्र कम होनी चाहिए।
(3) #स्निग्ध (कोमल और स्वाभाविक रूप से तैलाक्त)
उचित मात्रा में इस किस्म के भोजन को ग्रहण करने से वात दोष को दबाया जा सकता है। शुष्क त्वचा, कमजोर या दुबला और अत्यधिक दुबलेपन से पीड़ित लोगों के द्वारा इसका उपयोग लाभकारी होता है।
(4) #रुक्स (ऊबड और शुष्क)
कफ दोष को नियंत्रित करने में सहयक है। जिन्हें मोटेपन की प्रवृति होती है और जिनकी तेलयुक्त त्वचा होती है उन्हें ऐसा भोजन आवश्यक है।
(5) #द्रव्य (तरल या जल)
यह आहार उन लोगों के लिए हैं जो शरीर के भीतर रूखेपन से पीड़ित है ( जिससे फोंडे, पेप्टिक अल्सर और अस्थि बंधन इत्यादि जैसे विकार हो सकते हैं) उन्हें इस प्रकार के आहार को काफी मात्र में ग्रहण करना चाहिये।
(6) #शुष्क (सूखा)
जो लोग कुष्ठ रोग, मधुमेह ( मूत्र से शुक्राणु या महत्वपूर्ण हार्मोन का निकास ), विसर्प (तीव्र त्वचा रोग ) या घावों से पीड़ित है उन्हें सूखा आहार देना चाहिये।
(7) #वत्ति_प्रयोजक (स्वाभाविक रूप से सुखदायक)
स्वस्थ लोगों के लिए पोषक आहार वह है जो महत्वपूर्ण तत्वों और आतंरिक शक्ति को मजबूत और स्थिर रख सके और जिससे रोगों के प्रति प्रतिरोध बढ़ जाए।
(8) #प्रशमनकारक (त्रिदोष का संतुलन)
स्वस्थ और बीमार लोगों में भोजन का चुनाव मौसम और दोष के स्तर के अनुसार होना चाहिये। जैसे गर्म और खट्टा और मीठा भोजन बारिश के मौसम में वात दोष को दबाने में सहायक है।
(9) #मात्राहीन (प्रकाश)
जिन लोगों को यकृत की समस्या होती है, जो किसी अन्य रोग के कारण ज्वर या भूख की कमी से पीड़ित है ने हल्का और आसानी से पचने वाला भोजन ग्रहण करना चाहिये। (यह सूखा या तरल, गर्म और ठंडा प्रकार, रोग की प्रकृति के अनुसार और त्रिदोष की स्वाभाविक प्रवृति के अनुसार होना चाहिये।
(10) #एक_कालिक (एक समय)
जो लोग भूख की कमी या कमजोर पाचन तंत्र से पीड़ित हैं उन्हें भूख और उपापचयी विकारों को सामान्य होने के लिए एक बार भोजन लेना चाहिये।
(11) #द्विकालिक (दो बार)
सामान्यतः स्वस्थ लोगों ने उचित भोजन दिन में दो बार लेना चाहिये।
(12) #औषधियुक्त (चिकित्सायुक्त भोजन)
जो लोग मुंह से दवाई नहीं ले सकते उन्हें उचित भोजन में मिला कर दिया जा सकता है। कभी कभी चिकित्सक वनस्पति या जड़ी बूटी विशिष्ठ रोगों में आवश्यक आहार के रूप लेने की भी सलाह देते हैं।
दोनों महर्षि चरक और आचार्य सुश्रुत हमें अच्छा स्वास्थ्य बनाने और उसे स्थिर रखने की सलाह देते हैं और इससे भी सचेत करते हैं कि कोई क्या खाता है और उसे कैसे खाता है, वह रोग होने का प्रमुख कारण बन सकता है और वे हमें इस बात से भी सजग करते हैं कि वह दूषित भी हो सकता है। हमें इन पहलुओं को ध्यान में रखकर स्वास्थ्यप्रद भोजन करना चाहिये और स्वस्थ रहना चाहिये।
वैद्य पंडित पुष्पराज त्रिपाठी
No comments:
Post a Comment